10 रुपए में मुल्जिमों को दो वक्त का खाना, आखिर कैसे देगा यूपी का थाना?

1989 में पुलिस थानों में मुल्जिमों को खाना देने के लिए 10 रुपए का प्रावधान किया गया था। खाने का यही बजट आज तक चल रहा है जिससे थानों को मैनेज करने में परेशानी होती है।

रायबरेली। चाय की कीमत पर एक वक्त का खाना। ऐसी महंगाई में यह बात अजीब लगती है लेकिन प्रदेश के थानों में हिरासत में लिए गए मुल्जिमों को इसी दर पर खाना देने का प्रावधान है। 'दस रुपए में दो वक्त का खाना' यह सुनकर तो थानेदार सिर पकड़ लेते हैं। क्या करें, शासन ने यही प्रावधान किया है, पिछले 27 साल से इस बजट में बढ़ोतरी नहीं हो सकी है। पुलिस अंग्रेजों के बनाए गए कानून पर काम करने के साथ ही इसे भी झेल रही है।

थाना कैसे करे 10 रुपए में खाने का इंतजाम?

थाना कैसे करे 10 रुपए में खाने का इंतजाम?

महंगाई आसमान छू रही है। इन दिनों स्पेशल चाय की कीमत भी दस रुपए है। अच्छे होटल में यही कीमत बढ़कर 15 से 20 रुपए हो जाती है। एक वक्त के भोजन की थाली भी 50 रुपए से कम नहीं है। ऐसे में थाना पुलिस, हवालात में बंद किसी मुल्जिम को दो वक्त का खाना (चिक खुराक) दस रुपए में कैसे खिला पाएगी?

1989 का बजट चल रहा अब तक

1989 का बजट चल रहा अब तक

वर्ष 1989 में हुए शासनादेश पर नजर डालें तो हवालात में बंद मुल्जिम को दो वक्त के भोजन का बजट दस रुपए स्वीकृत हुआ था। उस दौर में तो यह बजट मुनासिब था लेकिन वर्तमान में यह सिर्फ मजाक लगता है। यानी सरकार के हिसाब से पिछले 27 साल में मंहगाई नहीं बढ़ी। ऐसे में कैसे किसी को पेट भर भोजन कराया जा सकता है?

फिलहाल तो थानों में बंद होने वाले अधिकतर अभियुक्तों को उनके परिजन स्वयं भोजन लाकर कराते हैं। जिसकी व्यवस्था नहीं हो पाती उसके लिए पुलिस इंतजाम करती है। फिर भी ढ़ाई दशक से भी पुराने इस आदेश पर नजर जाती है तो पुलिस और आम आदमी दोनों को हंसी छूट जाती है।

पिछले 27 साल से इस बजट में नहीं हो सकी बढ़ोतरी

पिछले 27 साल से इस बजट में नहीं हो सकी बढ़ोतरी

प्रदेशभर के थानों की तरह रायबरेली जनपद के सभी थानों में भी इसी बजट में मुल्जिमों को भोजन देने का प्रावधान है। जिले की पुलिस चौकियों, थाने और कोतवाली में पूछताछ के लिए लाए गए मुल्जिमों को 24 घंटे में न्यायालय में पेश करने की व्यवस्था है। इस अवधि में मुल्जिमों को दो बार भोजन (चिक खुराक) उपलब्ध कराने की व्यवस्था थाना पुलिस कराती है। वर्ष 1989 में भोजन के मद में बजट स्वीकृत किया गया था। तब से लेकर आज तक बजट में कोई संशोधन नहीं किया गया।

दस रुपए में भोजन कराना असंभव

दस रुपए में भोजन कराना असंभव

किसी मुल्जिम को दस रुपए में दो वक्त का खाना खिलाना संभव नहीं है। इसीलिए पुलिस कर्मी जिस मुल्जिम को पकड़कर लाते हैं, भोजन की व्यवस्था भी उसी से कराई जाती है। अगर व्यवस्था नहीं हुई तो किसी और पर जिम्मेदारी थोप दी जाती है। पुलिसकर्मी भी मानते हैं कि इस बजट में भोजन कराना संभव नहीं है लेकिन मुल्जिम को भूखा भी तो नहीं रखा जा सकता। इसीलिए कहीं और से व्यवस्था कराई जाती है।

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