बड़ी जीत के बाद मायावती ने मुलायम पर कसा था तंज- मरे हुए को क्यों मारें, अगले चुनाव में अखिलेश ने लिया बदला!
लखनऊ, 19 नवंबर। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावी इतिहास में 1991 से 2007 के बीच का समय बहुत उथल-पुथल भरा रहा था। इस अवधि में जनता ने किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया था। उत्तर प्रदेश में जोड़-तोड़ की राजनीति हावी हो रही थी और कोई भी मुख्यमंत्री ज्यादा दिन तक टिक नहीं पा रहा था। कभी सपा और बसपा ने मिलकर सरकार बनाई तो कभी भाजपा और बसपा ने सत्ता की खिचड़ी पकाई। इस अवधि में पार्टियों में टूट-फूट और विधायकों का दल-बदल भी खूब हुआ था। सरकार के नहीं टिकने की वजह से राष्ट्रपति शासन भी बार-बार लगे और कई महीनों के लिए लगते रहे थे। 1991 के चुनाव में राम लहर पर सवार होकर भाजपा ने बहुमत हासिल कर सरकार तो बना ली थी लेकिन बाबरी विध्वंस के बाद उसे बर्खास्त कर दिया गया था। 1993 के चुनाव से सपा और बसपा दो ताकतवर क्षेत्रीय पार्टियों ने उत्तर प्रदेश में उभरना शुरू किया था। मुलायम और मायावती की ताकत बढ़ती चली गई, भाजपा कमजोर होती गई। 2007 के चुनाव में सपा और बसपा के बीच कड़ी टक्कर हुई। इसमें मायावती ने मुलायम को मात देते हुए 206 सीटें जीत ली। यूपी की जनता ने बहुत सालों बाद एक स्थायी सरकार बनाने के लिए मत दिया था। जीत के ठीक बाद मायावती ने मुलायम सिंह यादव पर ऐसा बयान दिया था जो 2012 के चुनाव में बसपा पर भारी पड़ गया।

मायावती ने मुलायम को कहा था- मरे हुए को क्या मारना
2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा को 206, सपा को 97, भाजपा को 51 और कांग्रेस को 22 सीटें मिली थीं। बसपा को मिली निर्णायक और भारी जीत के बाद सुप्रीमो मायावती ने इसे पार्टी की विचारधारा की जीत कहा था। कहा था कि पिछले 14 सालों में कोई भी पार्टी अकेले अपने बूते सरकार नहीं बना पाई। लंबे अंतराल के बाद सिंगल पार्टी को इतना बड़ा बहुमत जनता ने दिया है। मायावती ने ब्राह्मणों को बसपा के पक्ष में वोट करने के लिए धन्यवाद दिया, यह भी दावा किया कि मुस्लिम समुदाय ने भी भारी संख्या में पार्टी को मत दिया। जब उनसे प्रतिद्वंद्वी मुलायम सिंह यादव के खिलाफ एक्शन लेने पर सवाल पूछे गए तो मायावती ने सीधे-सीधे कहा था कि मरे हुए को हम क्यों मारें? लेकिन मायावती का यह बयान 2012 के चुनाव में उन पर भारी पड़ गया। दरअसल मुलायम सिंह यादव यूपी की राजनीति में 'मरे हुए' नहीं थे जैसा कि मायावती ने कहा था। 2012 के चुनाव में मुलायम ने बेटे अखिलेश को आगे बढ़ाया और सपा ने परिणामों में बसपा की सत्ता पलट दी।

2012 के चुनाव में सपा ने ले लिया बदला
2007 के चुनाव से पहले मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। चुनाव के बाद मायावती ने मुलायम को करारी मात दी थी। पांच साल बाद 2012 में जब यूपी में विधानसभा चुनाव हुए तो मुलायम ने मायावती से अपना बदला ले लिया था। समाजवादी पार्टी ने इस चुनाव में 403 में से 224 सीटों पर भारी जीत हासिल की थी। बसपा जिसने कि 2007 में 206 सीटें झटकी थीं, उसके पास 2012 में 47 सीटें रह गईं। भाजपा के पास भी इतनी ही सीटें आईं। कुर्सी मायावती के हाथ से खिसककर मुलायम की पार्टी के पास चली गई थी। लेकिन इस बार मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव नहीं बने। उन्होंने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया। इस चुनाव में मुलायम ने बेटे अखिलेश की लॉन्चिंग यूपी की राजनीति में जोरदार ढंग से की थी। दरअसल, मायावती ने जब मुलायम को मरा हुआ कह दिया था तब उनको यह अंदाजा नहीं था कि इस यादव क्षत्रप की जमीनी जड़ें उस समय कितनी मजबूत थीं।

अखिलेश ने सपा का चेहरा बदल दिया
मुलायम की सरकार घोटालों, खराब कानून व्यवस्था और धीमे विकास की वजह से बदनाम हुई थी। 1995 में सपा विधायकों ने गेस्ट हाउस में मायावती पर हमले की घटना को अंजाम दिया था। इन वजहों से भी पार्टी ने अपना जनाधार खोया था। सपा कार्यकर्ताओं को सपाई गुंडा कहा जाने लगा था। इन सब वजहों से 2007 के चुनाव में पार्टी को बसपा के हाथों करारी हार मिली थी। मायावती के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था पर तो सरकार की प्रशंसा हुई थी लेकिन इस सरकार की छवि भी मूर्तियों को स्थापित करने की योजनाओं और घोटालों की वजह से खराब हुई थी। 2012 के चुनाव में मुलायम ने बेटे अखिलेश के चेहरे को चुनाव में उतारा। अखिलेश ने समाजावादी पार्टी के गुंडे वाली छवि को बदला था और चुनाव नतीजों को अपने पक्ष में करने में सफलता पाई थी। अखिलेश ने डीपी यादव जैसे आपराधिक छवि के नेताओं को पार्टी से दूर किया था। चुनाव में बहुत सोच-समझकर चुने हुए लोगों को टिकट दिया था। सपा ने यह चुनाव जीतकर दिखा दिया था कि पार्टी और मुलायम दोनों यूपी की राजनीति में जिंदा थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रचंड बहुमत से जीती थी। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच माना जा रहा है।












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