यूपी के मुख्यमंत्री होते जयंत चौधरी के पिता अजीत सिंह, मुलायम सीएम की कुर्सी छीनकर कैसे बने कद्दावर?
लखनऊ, 3 दिसंबर। 1989 में उत्तर प्रदेश में जो चुनाव हुआ था वह मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक करियर के लिए अहम साबित हुआ था। इस चुनाव में जनता दल को 425 सीटों वाली विधानसभा में 208 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। वह दौर जनता दल में वीपी सिंह और चंद्रशेखर का था। इसी जनता दल में मुलायम सिंह यादव और अजीत सिंह भी थे। अजीत सिंह पूर्व प्रधानमंत्री और यूपी के दो बार मुख्यमंत्री रहे कद्दावर किसान नेता चौधरी चरण सिंह के बेटे थे। चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद उनकी विरासत को चौधरी अजीत सिंह ने संभाला था। जनता दल में वीपी सिंह को काउंटर करने के लिए चौधरी अजीत सिंह को चंद्रशेखर ने खड़ा किया था। चंद्रशेखर की मदद से अजीत सिंह जनता दल के अध्यक्ष बन गए थे। लेकिन बाद में अजीत सिंह वीपी सिंह के वफादार बन गए थे। जब 1989 में जनता दल 208 सीट लेकर आई थी तो उस समय सीएम उम्मीदवार अजीत सिंह ही थे। मुलायम सिंह यादव को उप मुख्यमंत्री बनाया जाना था। लेकिन आखिरी मौके पर मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री पद की दावेदारी कर दी और अजीत सिंह के लिए यूपी का मुख्यमंत्री बनने का सपना, सपना ही रह गया।

मुलायम सिंह यादव ले उड़े सीएम पद, अजीत सिंह छूटे पीछे
जन मोर्चा, लोक दल (बी) और लोक दल (ए) को मिलाकर जनता दल बना था। 1989 में 200 से ज्यादा सीटें जीतने वाले जनता दल में अजीत सिंह को मुख्यमंत्री बनाने पर सहमति बन गई थी। वीपी सिंह भी अजीत सिंह के ही पक्ष में थे। मुलायम सिंह यादव को उप मुख्यमंत्री पद दिया जाना था। लेकिन मुलायम सीएम बनना चाहते थे और उन्होंने इसके लिए पार्टी के सामने दावा कर दिया। जनता दल के अंदर जन मोर्चा के कई विधायक मुलायम के समर्थन में थे। सीएम पद को लेकर जनता दल में घमासान मचा। आखिरकार तय हुआ कि विधानसभा के सेंट्रल हॉल में जनता दल के विधायक गुप्त मतदान करेंगे। मुलायम या अजीत, जिनके पक्ष में ज्यादा वोट जाएंगे उनको मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा। मतदान हुआ और मुलायम सिंह यादव को अजीत सिंह से पांच वोट ज्यादा मिले। कहा जाता है कि मुलायम ने अजीत सिंह के कुछ समर्थक विधायकों को अपने पक्ष में कर लिया था और इसके लिए बाहुबली डीपी यादव की मदद ली थी।

यूपी में इस दांव से मुलायम बन गए कद्दावर
1989 में जनता दल की सरकार में मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह यादव को भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया था। सीएम की रेस में अजीत सिंह को पछाड़ने के बाद मुलायम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और यूपी की राजनीति में वो काफी आगे निकल गए। चौधरी चरण सिंह की विरासत को संभालने आए बेटे अजीत सिंह काफी पीछे छूट गए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और मुसलमानों के बीच ही अजीत सिंह की पैठ रह गई थी। जबकि मुलायम सिंह यादव ने प्रदेशभर में अपना जनाधार खड़ा किया। अजीत सिंह जनता दल से निकलकर कांग्रेस में गए और इसके बाद उन्होंने 1999 में राष्ट्रीय लोक दल बना लिया। अवसरवादी नेता कहे जाने वाले अजीत सिंह केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बनते रहे लेकिन उनका जनाधार समय के साथ सिमटता चला गया। यूपी चुनाव 2002 में रालोद को 14 सीट, 2007 के चुनाव में 10, 2012 के चुनाव में 3 और 2017 के चुनाव में 1 सीट हासिल हुई। फिलहाल राष्ट्रीय लोक दल का नेतृत्व उनके बेटे जयंत चौधरी कर रहे हैं। मुलायम सिंह यादव ने 1992 में समाजवादी पार्टी बनाई और बहुजन समाज पार्टी के साथ मिलकर 1993 का चुनाव लड़ा। बसपा के समर्थन से मुलायम फिर मुख्यमंत्री बने थे। समाजवादी पार्टी ने 2012 में पूर्ण बहुमत के साथ यूपी में सरकार बनाई थी।. मुलायम के बेटे अखिलेश मुख्यमंत्री बने थे। आज अखिलेश ही समाजवादी पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं और 2022 चुनाव में भाजपा को टक्कर देने की तैयारी कर रहे हैं।

मुलायम-अजीत के बेटे अखिलेश-जयंत 2022 चुनाव में साथ
2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट और मुसलमान को अलग कर दिया। इन दोनों की एकता ही राष्ट्रीय लोक दल की ताकत थी। उस समय अखिलेश यादव की सपा सरकार थी। इस दंगे से मुलायम और अजीत सिंह दोनों की पार्टियों का नुकसान हुआ। 2017 के विधानसभा चुनाव में रालोद महज एक सीट जीत पाई थी। सपा 47 सीटों पर सिमट गई थी। लोकसभा चुनाव 2019 में रालोद, सपा-बसपा गठबंधन में शामिल थी। चुनाव में रालोद को एक भी सीट नहीं मिली, अजीत सिंह और जयंत चौधरी दोनों चुनाव हारे। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हो रहे किसान आंदोलन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और मुसलमान फिर साथ दिख रहे हैं। इस आंदोलन ने रालोद में नई जान भर दी है। जयंत चौधरी और अखिलेश यादव के बीच गठबंधन हो चुका है। 1989 में जिस भाजपा के समर्थन से मुलायम और अजीत सिंह की पार्टी की सरकार बनी थी, 2022 में मुलायम और अजीत सिंह की नई पीढ़ी उसी भाजपा को टक्कर देने की तैयारी कर रही है।












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