बाप-दादा की ढहती विरासत को यूपी चुनाव में कितना बचा पायेंगे जयंत चौधरी ?
लखनऊ, 10 नवंबर: राष्ट्रीय लोकदल के चीफ चौधरी जयंत के लिए 2022 का विधानसभा चुनाव कई मायनो में अहम साबित होने वाला है। पिछले कई चुनावों से हार का सामना कर रहे जयंत के सामने अपने पिता और दादा की विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है। हाल ही में जयंत को खाप पंचायतों के एक कार्यक्रम में पगड़ी रश्म के दौरान चौधरी की उपाधि दी गई थी। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो 2022 का विधानसभा चुनाव इस बात का फैसला करेगा कि क्या जयंत अपने पिता अजित सिंह और दादा चौधरी चरण सिंह की विरासत को आगे बढ़ा पाएंगे और रालोद को एक बार फिर संजीवनी मिलेगी। यदि यह चुनाव भी रालोद के लिए निराशाजनक साबित होता है तो आने वाले समय में रालोद को खड़ा करना जयंत के लिए एक तरह से टेढ़ी खीर हो जाएगी खास तौर से ऐसे समय में जब बीजेपी ने रालोद के कोर वोट बैंक जाटों में सेंध लगा दी है।

जयंत चौधरी अभी सीखने की प्रक्रिया में हैं
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई स्थानीय नेताओं का कहना है कि चौधरी चरण सिंह के पोते और अजीत सिंह के बेटे होने के नाते राजनीति का ककहरा जयंत चौधरी काफ़ी पहले ही जानते थे लेकिन सीख अब रहे हैं। उसका तर्क वो इस तरह देते हैं कि 2009 में मात्र 30 साल की उम्र में वो 'बिना किसी संघर्ष के' संसद ज़रूर पहुँच गए थे लेकिन लगातार दो लोकसभा चुनावों (2014 और 2019) की हार ने उन्हें संघर्ष के लिए ज़मीन पर उतरने को 'मजबूर' कर दिया है।

आरएलडी का पारंपरिक वोट बीजेपी के पास चला गया
'मजबूरी' शब्द को वो इस तरह से परिभाषित करते हैं कि 2013 में ही आरएलडी का पारंपरिक वोटर 'जाट' बीजेपी में शिफ़्ट हो गया था जिसके बिना आरएलडी की राजनीति हो ही नहीं सकती है. उसको वापस लाने की जद्दोजहद में जयंत चौधरी लगातार मैदान में बने हुए हैं। सभी राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर सहमत ज़रूर हैं कि किसानों के प्रदर्शन ने पश्चिमी यूपी में लगभग समाप्ति की ओर बढ़ चुके आरएलडी को एक 'पॉलिटिकल माइलेज' दिया है।

पश्चिमी यूपी की 142 सीटों पर आरएलडी नजर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विधानसभा की तक़रीबन 142 सीटें हैं जिनमें से 23 सीटें ऐसी हैं जहां पर जाट समुदाय की आबादी 60 से 90 हज़ार तक है और वो जीत-हार तय कर सकता है. लेकिन भारतीय राजनीति में केवल एक तबक़े के वोट से ही जीत-हार सुनिश्चित नहीं हो जाती है। इसी की काट निकालने के लिए आरएलडी हमेशा से जाटों के साथ-साथ मुसलमानों को भी साथ लेकर चलती रही है. 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद जहां जाट आरएलडी से रूठ चुका था वहीं मुसलमान भी 2009 में बीजेपी के साथ गठबंधन में लोकसभा चुनाव लड़ने के बाद उससे दूरी बनाने लगे थे. रही सही कसर दंगों के बाद पूरी हो गई जब मुसलमानों ने आरएलडी पर भरोसा करना छोड़ दिया था।

आरएलडी से कितनी अलग है जयंत चौधरी की राजनीति
पारंपरिक तरीक़े से राजनीति करने के साथ-साथ जयंत चौधरी ने एक अलग राह भी पकड़ी है। पिछले कुछ महीनों में जयंत चौधरी ने जनसंपर्क के जो तरीक़े अपनाए हैं वो अपने आप में ज़रा हट के हैं। अगस्त महीने से ही न्याय यात्रा, आशीर्वाद यात्रा और लोक संकल्प यात्रा आरएलडी के कार्यकर्ता निकाल रहे हैं। 'न्याय यात्रा' के तहत पार्टी कार्यकर्ता उन-उन जगहों पर गए हैं जहां-जहां दलितों पर अत्याचार हुए हैं। एक तरह से इसे दलित समाज के बीच पार्टी को स्थापित करने के तौर पर देखा जा रहा है। आरएलडी में दलित नेता रहे हैं लेकिन हमेशा से ऐसा माना जाता रहा है कि जाट बहुल पार्टी में सिर्फ़ रिज़र्व सीट से चुनाव लड़ाने के लिए ही दलित नेता रखे गए थे।

जयंत के सामने क्या हैं चुनौतियां
चौधरी अजीत सिंह के समय ही आरएलडी सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी थी। उससे उसका पारंपरिक जाट और मुस्लिम वोट बैंक छिटक चुका था और जयंत चौधरी को एक तरह से बिना जनाधार का संगठन विरासत में मिला है। जयंत चौधरी के 'पॉलिटिकल स्किल' का अब तक कोई इम्तिहान नहीं हुआ है। स्थानीय लोग ज़रूर उनकी क़द-काठी और आभा की चौधरी चरण सिंह से तुलना कर देते हैं लेकिन यही चुनाव जिताने के लिए काफ़ी नहीं है। एक राजनीतिक विश्लेषक कुमार पंकज ने कहा कि, "जयंत चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पढ़े हुए हैं, वो बिना लाग-लपेट के बात करने में ईमानदार लगते हैं, उनकी छवि बेदाग है लेकिन जो राजनीति संघर्ष करके सीखी जाती है वो उन्होंने अब तक नहीं सीखी थी।"
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