महाश्मशान पर जलती चिताओं के बीच खेली गई भस्म की होली
रंगभरी एकादशी पर बाबा के गौने में शामिल न होने औघड़, भूत-पिशाच के साथ बाबा दिगंबर ने गुरुवार को जलती चिताओं के बीच होली खेली।
वाराणसी। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की खुमारी खत्म होने के बाद अब होली का खुमार लोगों के सिर चढने लगा है। हर शहर की होली का अपना रंग होता है। पर बाबा भोले की नगरी काशी की होली का अपना अलग ही अंदाज है। रंगभरी एकादशी पर बाबा विश्वनाथ की रजत पालकी पर निकली शोभायात्रा में अबीर-गुलाल उड़ाकर काशीवासियों ने रंगोत्सव की शुरुआत कर दी। बुधवार को बाबा के साथ भक्तों ने होली खेली तो गुरुवार को उनके गणों ने महाश्मशान में चिता भस्म की होली खेली।

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बाबा भोले की नगरी में चहुंओर रंग पर्व होली की खुमारी चढ़ने लगी है। मंदिर से सड़कों तक, घरों से लेकर अब श्मशान तक अबीर-गुलाल उड़ने लगे हैं। रंगभरी एकादशी पर बाबा के गौने में शामिल न होने औघड़, भूत-पिशाच के साथ बाबा दिगंबर ने गुरुवार को जलती चिताओं के बीच होली खेली। घाट पर शवदाह करने के लिए आए लोगों के लिए यह दृश्य हैरान करने वाला रहा। यह काशी ही है, जहां जीवन के साथ मौत को भी उत्सव की तरह मनाया जाता है। कभी ठंडी न पड़ने वाली मणिकर्णिका घाट की चिता के सामने कभी बालाएं ठुमके लगाती है तो कभी जमकर अबीर-गुलाल उड़ाया जाता है।
बाबा मसाननाथ (महा श्मशान) मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने बताया कि ऐसी मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ माता पार्वती का गौना कराकर अपने धाम पहुंचते हैं, जिसमें सभी लोग हर्षोल्लास के साथ शामिल होते हैं लेकिन बाबा के प्रिय भक्त भूत, प्रेत, पिशाच, दृश्य, अदृश्य जीवात्माए आदि उस खुशी में शामिल नहीं हो पाते हैं, इसलिए बाबा विश्वनाथ रंगभरी एकादशी के ठीक दूसरे दिन अपने उन अनन्य भक्तों को व अपने अराध्य "राम" के नाम से प्रीत के वशीभूत होकर महामशान मणिकर्णिका घाट पर आकर चीता भस्म से होली खेलते हैं।
गुरुवार को मध्याह्न साढ़े 12.30 बजे महा श्मशान नाथ की आरती उतारी गई। इस दौरान बाबा को भक्तों ने अबीर- गुलाल, भस्म अर्पित किया। यह आयोजन मंदिर समिति के बैनर तले आयोजित किया गया। इस परंपरा का निर्वहन करते हुए औघड़ों ने अन्य भक्तों के साथ जमकर जलती चिताओं के बीच चिता भस्म से होली खेली।












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