Flashback 2022: Shivpal- Akhilesh के सम्बंधों में उतार चढ़ाव के लिए याद किया जाएगा ये साल
उत्तर प्रदेश में अखिलेश-शिवपाल के बीच रिश्तों में आई दरार से पूरे यादव कुनबे का नकसान हो रहा था लेकिन मुलायम के निधन के बाद दोनों के रिश्तों में दूरियां कम हुईं और दोनों ने एकजुट होकर मैनपुरी का उपचुनाव लड़ा और जीता भी।

Flashback 2022: साल 2022 धीरे धीरे गुजरता जा रहा है। अब इसमें महज कुछ दिन ही रह गए हैं। नए साल की आहट साफतौर पर सुनाई देने लगी है। इस बीच कुछ चीजें ऐसी हैं जो अतीत में झांकने को मजबूर कर देती हैं। बात करते हैं समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के चीफ अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) और उनके चाचा और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के प्रमुख शिवपाल यादव (Shivpal Yadav) की। इन दोनों के रिश्तों पर जमी बर्फ इस साल पूरी तरह से पिघलती हुई दिखाई दे रही है। दरअसल चाचा-भतीजे के बीच रिश्तों में कड़वाहट 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ही आ गई थी लेकिन कहते हैं न कि वक्त किसी भी घाव का सबसे बड़ा मरहम होता है। इसलिए वक्त ने पलटी खाई और अब चाचा-भतीजे के बीच नया साल खुशियां लेकर आएगा ऐसी उम्मीद की जा रही है।

साल 2022 के विधानसभा चुनाव में Shivpal- Akhilesh बढ़ी खटास
उत्तर प्रदेश में साल 2017 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहेल अखिलेश-शिवपाल के बीच परिवार में जो विवाद खड़ा हुआ था उससे दोनों के साथ ही पार्टी का भी काफी नुकसान हुआ। 2017 के बाद दोनों की राहें अलग हो गई लेकिन पांच साल बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर दोनों को करीब आने का मौका मिला। इस मौके का फायदा हालांकि न तो चाचा उठा पाए और न ही अखिलेश। चुनाव में अखिलेश ने चाचा शिवपाल के साथ गठबंधन तो कर लिया लेकिन शिवपाल की नाराजगी पूरी तरह से दूर नहीं हुई थी।

केवल एक सीट मिलने से नाराज थे शिवपाल यादव
सपा को करीब से जानने वाले बताते हैं कि दरअसल सीटों के बंटवारे को लेकर अखिलेश और शिवपाल के बीच सबकुछ ठीक नहीं चला। अखिलेश ने चाचा शिवपाल को केवल एक सीट जसवंतनगर की दी। इसके अलावा उनके कहने पर एक भी सीट उनके समर्थकों को नहीं दी जिससे शिवपाल नाराज हो गए। नाराजगी का आलम ये था कि एक तरफ अखिलेश ने अपनी यात्रा निकाली तो दूसरी ओर शिवपाल ने भी यात्रा निकालने का ऐलान कर दिया। इससे समर्थकों में काफी असहज स्थिति पैदा हो गई थी।

शिवपाल ने अखिलेश से कई बार की बगावत
चुनाव के दौरन शिवपाल बार बार अपनी नाराजगी व्यक्त करते रहे लेकिन अखिलेश ने उनकी एक नहीं सुनी। चुनाव जैसे तैसे बीत गया। शिवपाल जसवंत नगर सीट जीतने में कामयाब हो गए और सपा की सीटें 49 से 111 तक पहुंच गईं। इसके बाद शिवपाल ने अपना पाला बदल लिया और वह योगी के करीब आ गए। इसका फायदा बीजेपी ने उठाया और राष्ट्रपति चुनाव में शिवपाल ने अपना वोट बीजेपी के उम्मीदवार को दिलाने के साथ ही सपा में क्रास वोटिंग भी करवायी। इससे नाराज अखिलेश ने शिवपाल को गठबंधन से बाहर जाने के लिए स्वतंत्र कर दिया।

मुलायम के निधन के बाद आया रिश्तों में सुधार
इस बीच समय धीरे धीरे बीतता गया। सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव की तबीयत अचानक खराब हुई और उन्हें गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई और दस अक्टूबर को मेदांता में उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद मैनपुरी लोकसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा हुई। इस उपचुनाव ने ही अखिलेश-शिवपाल को साथ आने का मौका दे दिया। मुलायम के अंतिम संस्कार में शिवपाल ने पूरी तरह से एक संरक्षक का फर्ज निभाया और हमेशा अखिलेश के साथ नजर आए। इसका राजनीतिक रूप से भी एक अच्छा संदेश गया।

मैनपुरी उपचुनाव ने चाचा-भतीजे में कम की दूरियां
मैनपुरी उपचुनाव चूंकि मुलायम के निधन के बाद इस परिवार के लिए नाक का सवाल था। पूरे यूपी ही नहीं देश की निगाहें इस उपचुनाव पर टिकी हुईं थीं। चुनाव के दौरान अचानक ही अखिलेश यादव अपनी पत्नी और मैनपुरी से सपा की उम्मीदवार डिंपल यादव को लेकर उनसे मिलने उनके घर पहुंच गए। मुलाकात के बाद शिवपाल ने कहा कि डिंपल का फोन आया था उसके बाद ही उन्होंने सपा को समर्थन देने का फैसला किया। लेकिन शिवपाल जैसे ही अखिलेश के करीब आए उधर रिवर फ्रंट घोटाले की फाइल खुल गई जिससे उनकी मुश्किलें और बढ़ गईं। लेकिन इस चुनाव ने अखिलेश और शिवपाल के बीच रिश्तों पर जमी बर्फ को पूरी तरह से पिघलने का मौका दे दिया। इसीलिए अब शिवपाल ये कहते नजर आ रहे हैं कि अब मरते दम तक वो सपा के साथ ही रहेंगे। लेकिन उनकी चुनौतियां अभी शुरू होंगी। जैसे जैसे रिवर फ्रंट की फाइल खुलेगी वैसे वैसे उनकी परेशानियों में इजाफा होगा और आना वाला नया साल उनके लिए कई मुसीबतें भी लेकर आ सकता है।
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