यादवों को जाति से तोड़कर राष्ट्रवाद की तरफ मोड़ने की कवायद, क्या है इसके पीछे की बीजेपी की गणित

लखनऊ, 23 अक्टूबर: उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले जहां अखिलेश यादव गैर यादव ओबीसी मतों को सहेजने पर फोकस कर रहे हैं वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) गैर यादव ओबीसी के साथ ही यादवों को भी साधने में जुटी हुई है। बीजेपी की कोशिश है कि यादव समुदाय को जाति के खांचे से बाहर निकालकर इस समाज में राष्ट्रवाद के बहाने पैठ बनाई जाए। इसलिए शुक्रवार को लखनऊ में हुए यादव सम्मेलन में बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत दिखाई और प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने भी कहा कि यादव समाज को राष्ट्रवाद के केंद्र में रखकर साधने की कोशिश की।

बीजेपी

यादवों पर एक पार्टी विशेष का ठप्पा
आगामी विधानसभा चुनाव 2022 के चुनाव से पहले राजधानी लखनऊ में सामाजिक प्रतिनिधि सम्मेलन के तहत 'यादवों' का अधिवेशन आयोजित किया गया। बीजेपी के इस सम्मेलन में प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह समेत बीजेपी के यादव नेता शामिल हुए। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि भाजपा सरकार सबका साथ, सबका विकास के मंत्र पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि भाजपा न किसी व्यक्ति विशेष की पार्टी है और न ही किसी ट्रस्ट की। यह उन सभी लोगों की पार्टी है जो बीजेपी में काम कर रहे हैं। भाजपा में हर व्यक्ति अपनी योग्यता के दम पर संगठन और सरकार के शीर्ष पद तक पहुंच सकता है। इस मौके पर मंत्री गिरीश यादव ने कहा कि यादवों पर एक पार्टी का ठप्पा लगा दिया गया है।

पिछले चुनाव से ही यादवों को साधने में जुटी है बीजेपी
दरअसल, बीजेपी 2017 से यादव वोट को साधने में जुटी हुई है। भाजपा ने जौनपुर से जीते गिरीश यादव को योगी सरकार में मंत्री बनाया, जबकि इटावा के हरनाथ यादव को राज्यसभा सदस्य बनाया गया। सुभाष यदुवंश को पहले भाजपा युवा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया और अब उन्हें राज्य संगठन में जगह दी गई है। हाल ही में हुए जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में यादव भाजपा के टिकट पर समाज के तीन अध्यक्ष बनाने में सफल रहे थे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुलायम सिंह और शिवपाल यादव जमीनी नेता थे, जिससे उन पर यादवों का भरोसा बना था, लेकिन दूसरी तरफ सपा पर यादव हारे हुए होने का भी आरोप लगा रहे हैं।

बीजेपी

50 विधानसभा सीटों पर यादव वोटरों की अहम भूमिका
अन्य पिछड़ी जातियों का वोट बैंक बीजेपी की तरफ शिफ्ट हो गया। अब बीजेपी भी यादव वोट बैंक को हिलाने की कोशिश कर रही है। उत्तर प्रदेश के इटावा, एटा, फर्रुखाबाद, मैनपुरी, फिरोजाबाद, कन्नौज, बदायूं, आजमगढ़, फैजाबाद, बलिया, संत कबीर नगर, जौनपुर और कुशीनगर जिले यादव बहुल माने जाते हैं। इन जिलों में करीब 50 विधानसभा सीटें हैं, जहां यादव वोटर अहम भूमिका में हैं. सपा का यादव वोट बैंक फिसला तो सपा के लिए मुश्किल होगी।

दिनेश लाल

आजमगढ़ से दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ ने अखिलेश को दी थी टक्कर
भोजपुरी फिल्म हस्ती दिनेश लाल यादव उर्फ ​​निरहुआ ने लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ सीट से समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के चुनाव लड़ा था। निरहुआ को अखिलेश के खिलाफ चुनाव लड़ाना बीजेपी की एक रणनीति का हिस्सा ही था। बीजेपी इससे एक तीर से कई निशाना साधना चाहती थी। निरहुआ के लड़ने से आजमगढ़ में यादव समुदाय का एक वर्ग जो निरहुआ के प्रशंसक थे उन्होंने बीजेपी के लिए वोट किया। इससे यादवों के एक वर्ग का झुकाव बीजेपी के पक्ष हुआ।

स्वतंत्रदेव

बीजेपी का ओबीसी सम्मेलन भी चुनावी रणनीति का हिस्सा
भाजपा के ओबीसी सम्मेलनों पर सवाल उठाते हुए, सपा नेता और एमएलसी सुनील सिंह यादव ने कहा कि भाजपा ने 2017 के चुनाव के दौरान एक पिछड़े मुख्यमंत्री सहित कई वादे किए थे, लेकिन वह किसी भी चिंता को दूर करने में विफल रही। शिक्षकों की भर्ती में ओबीसी आरक्षण को भी हटा दिया गया और बीजेपी के कई ओबीसी नेता सम्मान के लिए संघर्ष करते नजर आए। ओबीसी अब अपनी स्वार्थी राजनीति से अच्छी तरह वाकिफ है और 2022 में सपा के साथ वापस आने के लिए तैयार है।

राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार कुमार पंकज ने कहते हैं कि,

''यादवों पर अखिलेश यादव की पार्टी का होने का ठप्पा लगाया जा चुका है। हालांकि अब बीजेपी भी यादवों में अपनी सेंधमारी करने में जुटी है। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र में नरेंद्र मोदी ने भूपेंद्र यादव को मंत्री भी बनाया है। इसके साथ ही बीजेपी ने यूपी में भी गिरिश यादव को मंत्री बनाया जबकि युवा मोर्चे की कमान भी पहले सुभाष यदुवंश को दी थी। अब उन्हें संगठन में शामिल कर लिया गया है। ये गणित बताती है कि बीजेपी किस तरह माइक्रो मैनेजमेंट के साथ आगे बढ़ रही है और यादवों के भीतर अपनी पैठ बनाने में जुटी हुई है।''

केंद्र में बीजेपी ने भूपेंद्र यादव को बनाया यादव चेहरा

दरअसल, 2010 से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राष्ट्रीय महासचिव, राज्यसभा सांसद और सुप्रीम कोर्ट के वकील भूपेंद्र यादव को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करने को एक भरोसेमंद संगठन आदमी होने के इनाम के रूप में देखा जाता है। एक कट्टर संगठन व्यक्ति, जिसने क्रमशः 2017 और 2020 में प्रभावशाली चुनावी जीत के लिए बिहार और गुजरात में पार्टी का नेतृत्व किया, यादव को श्रम और रोजगार के साथ पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया था। भूपेंद्र यादव 2012 से राज्यसभा में राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, लेकिन वह बिहार और गुजरात के प्रभारी रह चुके हैं। कहा जाता है कि भाजपा यादव को समुदाय के अगले चेहरे के रूप में तैयार कर रही है, जिसकी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अच्छी उपस्थिति है।

भूपेंद्र यादव

यूपी से हरनाथ यादव को राज्यसभा भेजा, गिरिश यादव योगी सरकार में मंत्री

फैजाबाद के विधायक रामचंद्र यादव के नाम के साथ एक यादव चेहरा भी शामिल किया जा सकता है। "भाजपा ने 2017 के चुनावों में 11 यादवों को टिकट दिया था, जिनमें से नौ जीते और एक गिरीश चंद्र यादव को राज्यमंत्री बनाया गया था। हरनाथ सिंह यादव को राज्यसभा भेजा है जबकि सुभाष यादव को पिछले महीने भाजपा युवा मोर्चा का प्रमुख नियुक्त किया गया था। इन कदमों का उद्देश्य क्रमशः सपा और बसपा के यादव और जाटव वोटों को लुभाना है।

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