अयोध्या से विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं योगी आदित्यनाथ, जानिए क्या है इसके पीछे की गणित?
उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा प्रदेश में दो उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य व दिनेश शर्मा ने भी शपथ ली है।
लखनऊ। योगी आदित्यनाथ भले ही यूपी के मुख्यमंत्री बन गए हों लेकिन उन्हें इस पद पर बने रहने के लिए विधानसभा चुनाव लड़ना होगा। वो भी 6 माह के अंदर-अंदर। जी हां योगी आदित्यनाथ को छह माह के भीतर विधानसभा या विधान परिषद की सदस्यता हासिल करनी होगी। योगी आदित्यनाथ के पास फिलहाल तो चुनाव लड़ने के अलावा कोई और विकल्प नजर नहीं आ रहा है। वहीं सूत्रों से जो जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक योगी आदित्यनाथ अयोध्या से चुनाव लड़ सकते हैं।

अयोध्या से चुनाव लड़ने के पीछे बड़ा मकसद
हालांकि अभी इस बात की कोई पुष्टि नहीं है लेकिन फिर भी राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि 2019 के चुनाव को लेकर 'मोदी बनारस-योगी अयोध्या' का संदेश भाजपा के पक्ष में माहौल बना सकता है। वैसे तो अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री को स्वयं लेना है कि वह कहां से चुनाव लड़ते है।

लोगों में है जोश, अयोध्या को होगा विकास
अयोध्या से चुनाव लड़ने की सम्भावनाओं को देखते हुए रामनगरी के लोगो में जोश दिखाई देता है। विकास नहीं हो पाया। हालांकि यहां एक कार्यक्रम के दौरान केन्द्रीय मंत्री नितिन गड़करी ने मंच से ऐलान किया था कि अयोध्या के लिए केन्द्र सरकार के बजट में कोई कमी नहीं है।

अयोध्या सरकार की प्राथतिकताओं में से एक
आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान होती ही अयोध्या आने की आहट को लेकर अयोध्या में सड़को व गलियों का निर्माण प्रारम्भ हो गया। अप्रैल के अंतिम सप्ताह में योगी सरकार ने यहां वर्षो से बंद पड़ी रामलीला के मंचन को शुरु करने का आदेश भी जारी कर दिया। सरकार ने अयोध्या में भजन स्थल का निर्माण भी जून 2018 तक पूर्ण करने का आदेश जारी कर दिया। लगातार योजनाओं के क्रियान्वयन से यह लगता है कि अयोध्या सरकार की प्राथमिकताओं में एक है।

सिर्फ योगी ही नहीं इन्हें भी लड़ना होगा चुनाव
उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा प्रदेश में दो उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य व दिनेश शर्मा ने भी शपथ ली है। वर्तमान में केशव प्रसाद मौर्य भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हैं, जबकि दिनेश शर्मा लखनऊ के महापौर हैं। खास बात यह है कि यह तीनों न तो विधायक हैं और न ही विधान परिषद के सदस्य। इसके अलावा मंत्री बनाये गये माहसिन रजा व एक अन्य भी किसी सदन के सदस्य नहीं है। ऐसे में इनके लिए किन्हीं पांच विधायकों को अपनी सीट से इस्तीफा देना होगा। इसके बाद ये ये पांचों नेता चुनाव लड़कर विधानसभा पहुंचेंगे।

क्या कहता है नियम-कानून
किसी भी गैरविधायक मंत्री को शपथ लेने के ६ माह के भीतर सदन की सदस्यता प्राप्त करना अनिवार्य हैं। इसलिए योगी आदित्यनाथ समेत सभी पांच मंत्रियों को अगले छह महीने के भीतर विधानसभा का मेंबर बनना होगा। चूंकि, अगले छह माह तक कोई भी विधान परिषद की सीट खाली नहीं हो रही है, इसलिए इन्हें विधानसभा के रास्ते ही सदन में पहुंचना होगा।

उपचुनाव से सरकार की लोकप्रियता की होगी परीक्षा
भाजपा के फायरब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें गोरखपुर सांसद के पद से इस्तीफा देना होगा। वहीं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य को भी इलाहाबाद के फूलपुर सीट से इस्तीफा देना होगा। इधर, नए डिप्टी सीएम पद लखनऊ के महापौर दिनेश शर्मा को भी अपने पद से इस्तीफा देना होगा। ऐसे में प्रदेश की दो संसदीय सीट और एक महापौर की सीट रिक्त हो जाएगी। फिर पाच विधानसभा सीटों, दो लोकसभा व एक महापौर पद के लिए चुनाव होगा। जाहिर है ६ महीने में पहली बार सरकार की की लोकप्रियता का पैमाना आठ उपचुनावों से होगा।
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