Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

आज ही 1931 में शहीद हुये थे चंद्रशेखर आजाद, पढ़िये कैसे अकेले भिड़े थे अंग्रेजों से

इलाहाबाद। हिंदुस्तान के इतिहास में आज का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। यह दिन उस वीर क्रांतिकारी के जीवन का आखिरी दिन था जिसके नाम से अंग्रेजी हुकूमत के अधिकारी कांप जाया करते थे। हालांकि बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि आज के ही दिन महान क्रांतिकारी पंडित चंद्रशेखर आजाद तिवारी वीरगति को प्राप्त हुए थे। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद में अंग्रेजी फौज से अकेले ही भिड़े आजाद ने अपनी कसम को पूरा करने के लिए उस वक्त खुद पर गोली चलाई जब उनके पिस्टल से सिर्फ एक गोली बची थी। 15 अंग्रेज सिपाहियों को निशाना बनाने के बाद जब आजाद की पिस्टल में आखरी गोली बची थी तब उस गोली को खुद को मार कर देश के प्रति अपना सर्वोच्च बलिदान कर गए थे। वह आखिरी दिन आज भी कई बुजुर्गों को याद हैं और जाने कितनी किताबों में यह घटनाक्रम हमेशा के लिए अमर हो गया है। आइये हम आपको आजाद के उस आखिरी दिन की कहानी से रूबरू कराते हैं और आजादी के नायक वीर योद्धा को श्रद्धांजलि देते हैं।

अल्फ्रेड पार्क चल रहा था विचार विमर्श

अल्फ्रेड पार्क चल रहा था विचार विमर्श

भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद अब उन्हें फांसी दिए जाने की तैयारियां चल रही थी। चंदशेखर आजाद इसे लेकर बहुत ज्यादा परेशान थे। वह जेल तोड़कर भगत सिंह को छुड़ाने की योजना बना चुके थे, लेकिन भगत सिंह जेल से इस तरह बाहर निकलने को तैयार नहीं थे। परेशान चंदशेखर आजाद हर तरह से भगत को की फांसी रोकने का प्रयास कर रहे थे। आजाद अपने साथी सुखदेव आदि के साथ आनंद भवन के नजदीक अल्फ्रेड पार्क में बैठे थे। वहां वह आगामी योजनाओं के विषय पर विचार-विमर्श कर ही रहे थे कि आजाद के अल्फ्रेड पार्क में होने की सूचना अंग्रेजों को दे दी गई। मुखबिरी मिलते ही अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को घेर लिया। अंग्रेजों की कई टुकड़ियां पार्क के अंदर घुस आई जबकि पूरे पार्क को बाहर से भी घेर लिया गया। उस समय किसी का भी पार्क से बचकर निकल पाना मुश्किल था, लेकिन आजाद यूं ही आजाद नहीं बन गए थे । अपनी पिस्टल के दम पर उन्होंने पहले अपने साथियों को पेड़ों की आड़ से बाहर निकाला और खुद अंग्रेजों से अकेले ही भिड़ गए । हाथ में मौजूद पिस्टल और उसमें रही 8 गोलियां खत्म हो गई। आजाद ने अपने पास रखी 8 गोलियों की दूसरी मैगजीन फिर से पिस्टल में लोड कर ली और रुक रुक कर अंग्रेजों को मुंहतोड़ जवाब देते रहे।

15 अंग्रेस सिपाहियों को बना था निशाना

15 अंग्रेस सिपाहियों को बना था निशाना

चंद्रशेखर आजाद ने जितनी भी गोलियां चलाई हर बार अचूक निशाने पर लगी और कोई न कोई वर्दीधारी मारा गया। दहशत के कारण अंग्रेज भी पेड़ों की आड़ में छुप चुके थे। एक अकेले क्रांतिकारी के सामने सैकड़ों अंग्रेज सिपाहियों की टोली बौनी साबित हो रही थी। चंदशेखर आजाद ने 15 वर्दीधारियों को अपना निशाना बना लिया था, लेकिन अब उनकी गोलियां खत्म होने वाली थी। चंदशेखर आजाद ने अपनी पिस्टल चेक की तो अब सिर्फ एक गोली बची हुई थी। वह चाहते तो एक और अंग्रेज अधिकारी को गोली मार सकते थे, लेकिन उन्होंने कसम खाई थी कि जीते जी उन्हें कोई भी अंग्रेज हाथ नहीं लगा सकेगा। इस कसम को पूरी करने के लिए आखिरकार उस महान योद्धा ने वह फैसला लिया जिसे जिससे वह हमेशा के लिए आजाद हो गए। 27 फरवरी 1931 का वह दिन आजाद के लिये अंतिम दिन बन गया। चंदशेखर आजाद ने पिस्टल की आखिरी गोली अपनी कनपटी पर चला दी और वहीं पेड़ के नीचे हमेशा के लिए शांत होकर अमर हो गए।

'आजाद' नाम से डरते थे अंग्रेज

'आजाद' नाम से डरते थे अंग्रेज

आजाद की ओर से गोलियां चलनी बंद हुई और लगभग आधे घंटे तक जब एक भी गोली नहीं चली तो अंग्रेज सिपाही धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे, लेकिन आजाद का खौफ इस तरह था कि एक एक कदम आगे बढ़ने वाले सिपाही जमीन पर रेंगते हुए अब आजाद की ओर बढ रहे थे । आजाद के मृत शरीर पर जब अंग्रेजों की नजर पड़ी तो उन्होंने राहत की सांस ली , लेकिन अंग्रेजो के अंदर चंद्रशेखर आजाद का भय इतना था कि किसी को भी उनके मृत शरीर के पास जाने तक की हिम्मत नहीं थी। उनके मृत शरीर पर भी गोलियाँ चलाई गयी और जब अंग्रेज आश्वस्त हुये तब आजाद की मृत्यु की पुष्टि हुई। यह आज भी कयी किताबों में लिखा है कि आजाद की मुखबिरी एक बड़े नेता ने की थी और यह राज आज भी भारत सरकार के पास सुरक्षित फाइलों में दफन है।

चंद्रशेखर आजाद का परिचय

चंद्रशेखर आजाद का परिचय

चंद्रशेखर आज़ाद का पूरा नाम चंद्रशेखर तिवारी था, इनका नाम 23 जुलाई, 1906 को उत्‍तर प्रदेश के उन्‍नाव जिले के बदरका गांव में 1906 में हुआ था लेकिन इनका पूरा बचपन एमपी में बीता। 1922 में चंद्रशेखर की मुलाकात राम प्रसाद बिस्मिल से हुई और चंद्रशेखर क्रांतिकारी बन गये। चंद्रशेखर आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन क्रांतिकारी दल का पुनर्गठन किया और भगवतीचरण वोहरा, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि के साथ अंग्रेजी हुकूमत में दहशत फैला दी। आजाद के नाम से अंग्रेजी हुकूमत में इतनी दहशत थी कि पुलिस की एक्का दुक्का टुकड़ी सूचना मिलने के बाद छापेमारी में भी दहशत खाती थी। 17 जनवरी 1931 को आजाद पर इनाम की घोषणा कर दी गयी। 27 फरवरी 1931 को वह इलाहाबाद में अंग्रेजों के साथ मुठभेड़ के दौरान वीरगति को प्राप्त हुए थे।

साथियों से क्या कहते थे आजाद

साथियों से क्या कहते थे आजाद

"गिरफ़्तार होकर अदालत में हाथ बांध बंदरिया का नाच मुझे नहीं नाचना है। मेरी पिस्तौल में आठ गोली हैं और आठ की दूसरी मैगजीन भी है। पन्द्रह दुश्मन पर चलाऊंगा और सोलहवीं खुद पर !" "लेकिन जीते जी अंग्रेजों के हाथ नहीं आउंगा। जिंदा रहते हुये अंग्रेज मुझे हाथ भी नहीं लगा पायेंगे आजाद हूं और आजाद रहूंगा "- चंद्रशेखर आज़ाद !

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+