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जातिगत जनगणना से BJP को यूपी में कितना फायदा, क्या हो पाएगी ओबीसी-दलित वोटर्स की वापसी?

Caste Census 2025: लंबे समय से जातिगत जनगणना का विरोध करने वाली भारतीय जनता पार्टी ने 30 अप्रैल को केंद्रीय कैबिनेट बैठक में जब जातिगत जनगणना को हरी झंडी मिली तब राजनीतिक खेमे में फुसफुसाहट शुरू हो गई।

हर तरफ मोदी सरकार के इस फैसले पर हैरानी जताई जा रही थी की आखिर क्या कारण रहा की केंद्र को विपक्ष के इस मुद्दे पर अपनी सहमति जतानी पड़ी?

Caste-Census-2025

देखिए इसमें कोई दो राय नहीं है कि जाति जनगणना को मंजूरी देकर भाजपा ने विपक्ष के एक बड़े मुद्दे पर स्ट्राइक किया है। वो भी उस वक्त जब इस साल के अंत में एक बड़े राज्य बिहार में चुनाव होना है लेकिन यहां समझने वाली बात ये है कि केंद्र का ये फैसला उत्तर प्रदेश की राजनीति पर गहरा और लंबे समय के लिए प्रभाव डालेगा।

आईए जानते हैं कि कैसै BJP का जाति सर्वेक्षण का फैसला उत्तर प्रदेश की सियासत में उसके लिए बड़े बदलाव की उम्मीद देता है..

Caste Census 2025: BJP का जाति कार्ड, UP में कितना असरदार

बीजेपी हमेशा से जाति सर्वेक्षण को हिंदू को बांटने वाला मुद्दा बताते आई है। मोदी सरकार का यह निर्णय विशुद्ध रूप से राजनीतिक विवशता और आगामी चुनावों में ओबीसी और अनुसूचित जातियों (एससी) के वोट बैंक को साधने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। ये बात किसी से नहीं छुपी है कि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा की उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला जिसमें BJP को भारी नुकसान उठाना पड़ा था।

दिलचस्प बात यह है कि योगी आदित्यनाथ, जिन्होंने अब जातीय जनगणना के समर्थन में बयान दिया है, कुछ महीने पहले तक इसके प्रखर विरोधी रहे हैं। योगी आदित्यनाथ नें नेटवर्क18 को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि "सामाजिक विभाजन के नाम पर राजनीति करना या जाति, क्षेत्र, भाषा के नाम पर लोगों को बांटना देशद्रोह से कम नहीं है।" इस दौरान उन्होंने कांग्रेस और सपा पर भी समाज को बांटने का आरोप लगाया था।

Caste Census 2025: OBC वोट में सेंध

सीएम योगी हिंदू चेहरे के बड़े नेता के तौर पर देखा जाता है इसके बावजूद भाजपा को यूपी में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। इसका सबसे बड़ा कारण दलित और ओबीसी वोटर्स का पार्टी के प्रति नाराजगी था। भले ही केंद्र के इस फैसले से बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को काफी फायदा मिलेगा लेकिन कहीं न कहीं इसका इस्तेमाल यूपी में ओबीसी वोट बैंक में सेंध मारने के लिए करोगी।

मीडिया रिपोर्टस की मानें तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को भले ही हिंदू चेहरे के रुप में देखा जाता है लेकिन राज्य की राजनीति में उनकी छवि ठाकुरवाद की रही है। अकसर उन पर सामान्य वर्ग की और झुकाव और ओबीसी, अनुसूचित जाति के प्रति उदासीनता का आरोप लगता आया है।

दिलचस्प बात यह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़ा वर्ग अहम भूमिका निभाता है और यही कारण है कि बीजेपी ने केशव प्रसाद मौर्य को उप मुख्यमंत्री के तौर पर रखा। केशव प्रसाद और अपना दल की अनुप्रिया पटेल यूपी में बड़े ओबीसी चेहरा माने जाते हैं। इन दोनों नेताओं ने जाति सर्वेक्षण मुद्दे पर सीएम योगी की विचार से अलग जातिगत जनगणना पर सहमति जताते हुए इसे कराने की मांग करते हैं।

Caste Census 2025: ओबीसी-दलित वर्ग पर BJP की नजर

उत्तर प्रदेश में पिछले साल नवंबर में हुए विधानसभा उपचुनावों में बीजेपी ने चार ओबीसी और एक दलित उम्मीदवार को मौका देकर अपनी छवि सुधारने की कोशिश की और जीत हासिल हुई इसके बावजूद इस वर्ग का BJP से उदासीनता है। पार्टी के लिए ये एक बड़ी चुनौती है कि कैसे ओबीसी -दलित वोट बैंक को शिफ्ट किया जाए।

CSDC के पोल सर्वे के मुताबिक, 2024 में बीजेपी को उत्तर प्रदेश में कुर्मी-कोइरी के वोट में 19 प्रतिशत और अन्य गैर-यादव ओबीसी में 13 प्रतिशत वोटों की गिरावट नुकसानदायक साबित हुआ। इसके अलावा, गैर-जाटव दलितों में भी एनडीए के वोटों में 19 प्रतिशत की कमी आई। इसका परिणाम यह रहा कि 2019 विधानसभा चुनाव में 80 में से 64 सीटें जीतने वाली NDA, 2024 में महज 36 सीटों पर सिमट कर रह गई।

ऐसे में मोदी सरकार का जाति जनगणना का फैसला एक सोची समझी रणनीतिक चाल है जिससे भाजपा जमीनी हकीकत को पहचान रहा है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में पिछड़े वर्ग और दलित वोटों के बिना सत्ता साधना बेहद मुश्किल है और यह सरकार अच्छी तरह जानती है।

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