निषाद वोट: संजय निषाद और मुकेश सहनी के चुनावी घमासान से कैसे फायदा उठाएगी भाजपा?

लखनऊ, 9 नवंबर। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में निषाद वोट बैंक की अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद आए दिन बयानबाजी करते रहते हैं लेकिन उनको साथ लेकर चलने के लिए भाजपा मजबूर है। राजनीतिक जानकारों का मानना है, भाजपा ने उत्तर प्रदेश चुनाव में निषाद पार्टी की काट निकालने के लिए बिहार सरकार में मंत्री और विकासशील इंसान पार्टी के मुखिया मुकेश सहनी को उतारा है। निषादों में मछुआरे और नाविक आते हैं जिनमें मांझी, केवट, बिंद, मल्लाह समेत 17 से अधिक उपजातियां हैं। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या में करीब 18 प्रतिशत निषाद हैं। ये नदी किनारे बसते हैं और आजीविका के लिए पानी के स्रोतों पर निर्भर हैं। उत्तर प्रदेश की 150 से ज्यादा सीटों पर जीत-हार तय करने में निषाद वोट बैंक अहम भूमिका में हैं। पूर्वांचल क्षेत्र में निषादों का दबदबा है। मुकेश सहनी बिहार में जदयू-भाजपा गठबंधन का हिस्सा हैं। वे खुद को सन ऑफ मल्लाह कहते हैं। दूसरी तरफ संजय निषाद भी उत्तर प्रदेश में भाजपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ रहे हैं। वे खुद को पॉलिटिकल गॉडफादर ऑफ फिशरमैन कहते हैं। मुकेश सहनी और संजय निषाद दोनों एक ही वोटबैंक के दावेदार हैं और दो राज्यों में भाजपा के सहयोगी हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश चुनाव में मुकेश सहनी और संजय निषाद आमने-सामने हैं। इन दोनों के बीच चुनावी लड़ाई क्या भाजपा को फायदा पहुंचाएगी?

निषाद पार्टी को कमजोर करना चाहती है भाजपा!

निषाद पार्टी को कमजोर करना चाहती है भाजपा!

उत्तर प्रदेश की 20 लोकसभा सीटों और 60 विधानसभा सीटों पर निषाद पार्टी का प्रभाव माना जाता है। भदोही, जौनपुर, आजमगढ़, कुशीनगर, घोसी, देवरिया, बस्ती, डुमरियागंज, सलेमपुर, वाराणसी, बलिया और सुल्तानपुर, खासकर पूर्वांचल के इलाकों में निषाद पार्टी अपने दबदबे का दावा करती है। संजय निषाद अपनी राजनीतिक ताकत के बारे में बताते हुए 2018 में गोरखपुर सीट पर हुए लोकसभा उपचुनाव का हवाला देते हैं। इस सीट पर सपा से गठबंधन कर संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद ने योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में भाजपा उम्मीदवार को मात दी थी। इसके बाद भाजपा ने 2019 लोकसभा चुनाव के लिए निषाद पार्टी को साथ लिया और प्रवीण निषाद फिर से संत कबीर नगर से सांसद बन गए। प्रवीण निषाद मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनना चाहते थे लेकिन मंशा पूरी नहीं हुई। संजय निषाद राज्यसभा में जाना चाहते थे, बाद में यूपी में उप मुख्यमंत्री की दावेदारी भी की थी लेकिन उनकी यह इच्छा भी अधूरी रह गई। भाजपा ने हाल में संजय निषाद को एमएलसी बनाया है लेकिन भाजपा उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से वाकिफ है। संजय निषाद सहयोग देने के बदले भाजपा पर दबाव बनाने की राजनीति लगातार करते रहे हैं। यूपी में निषाद पार्टी का प्रभाव बढ़ने से भाजपा को समस्या है और उसके बारगेनिंग पावर को भी वो कम करना चाहती है। इसमें मुकेश सहनी मददगार हो सकते हैं।

मुकेश सहनी के जरिए संजय निषाद को चुनौती

मुकेश सहनी के जरिए संजय निषाद को चुनौती

उत्तर प्रदेश चुनाव में मुकेश सहनी ने विकासशील इंसान पार्टी के उम्मीदवारों को 165 सीटों पर उतारने का ऐलान किया है। अपने चुनावी अभियान में मुकेश सहनी लगातार संजय निषाद पर हमला बोलते देखते जाते हैं। अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में वाराणसी में पार्टी रैली में आए मुकेश सहनी ने कहा था कि संजय निषाद दुकान चला रहे हैं और टिकट बेचने का काम करते हैं। संजय निषाद भी मुकेश सहनी के चुनाव में उतरने के बाद खतरा महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कुछ दिन पहले प्रयागराज में मुकेश सहनी पर पलटवार करते हुए कहा कि वो निषाद समाज को गुमराह कर रहे हैं और निषादों के आरक्षण पर सिर्फ बयानबाजी करते हैं। मुकेश सहनी ने वाराणसी में कहा था कि अगर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार निषादों को आरक्षण का वादा करे तो साथ दे सकते हैं लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे भाजपा के खिलाफ लड़ेंगे। संजय निषाद भाजपा के साथ चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन इसी सप्ताह उन्होंने आरक्षण को लेकर आंदोलन करने का ऐलान कर दिया था लेकिन भाजपा के यूपी चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान से मुलाकात के बाद उन्होंने आंदोलन को टाल दिया। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि संजय निषाद की इसी तरह की दबाव की राजनीति के दबाव को कम करने के लिए मुकेश सहनी की लॉन्चिंग की गई है।

दोनों की तकरार में भाजपा को क्या होगा फायदा?

दोनों की तकरार में भाजपा को क्या होगा फायदा?

बिहार में भाजपा ने मुकेश सहनी की वीआईपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और अब सरकार में भी है। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने निषाद पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और दोनों ही चुनावी गठबंधन में हैं। इस तरह से भाजपा निषाद समुदाय की दो पार्टियों के साथ है। मुकेश सहनी के चुनाव में उतरने से भाजपा को दो अहम फायदे मिल सकते हैं। एक तरफ निषाद वोट बैंक को यह मैसेज है कि भाजपा निषादों के साथ है। वीआईपी अगर निषाद पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब रहती है तो आगे वो प्रदेश में भाजपा की सहयोगी बन सकती है और निषाद पार्टी का विकल्प भी। भाजपा को दूसरा बड़ा फायदा यह है कि सीटों पर निषाद वोट बैंक बंटने से सपा को नुकसान हो सकता है। सपा और ओम प्रकाश राजभर के बीच गठबंधन है। राजभर भी निषादों के वोट पर दावा करते रहे हैं।

आरक्षण और फूलन देवी के इर्द-गिर्द घूमती है निषादों की राजनीति

आरक्षण और फूलन देवी के इर्द-गिर्द घूमती है निषादों की राजनीति

मुकेश सहनी और संजय निषाद दोनों ही निषादों को आरक्षण देने की मांग लगातार कर रहे हैं। मुकेश सहनी ने अक्टूबर में वाराणसी में आरक्षण जनचेतना रैली की थी। वहीं अब संजय निषाद 21 नवंबर को एससी आरक्षण महारैली का आयोजन कर रहे हैं। निषादों की राजनीति की नायिका हैं चंबल में दस्यु सुंदरी रहीं मल्लाह जाति की फूलन देवी जो बीहड़ से निकलकर संसद तक पहुंची थीं। मुकेश सहनी फूलन देवी की प्रतिमा कई जिलों में लगाने के वादे कर रहे हैं तो दूसरी तरफ संजय निषाद भी फूलन देवी की प्रतिमा स्थापित करने, स्मारक बनाने के वादे करते हैं। फूलन देवी को 1996 में मिर्जापुर से सपा ने टिकट देकर लोकसभा भेजा था। सपा भी निषाद वोट बैंक को रिझाने के लिए फूलन देवी का सहारा लेती है। अब मुकेश सहनी और संजय निषाद के चुनावी मैदान में होने से निषाद वोट बैंक पर सपा की पकड़ कमजोर हो सकती है और इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। हलांकि सपा और बसपा दोनों ने निषादों को आरक्षण देने की कोशिश की थी लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पर स्टे लगा रखा है। योगी सरकार ने भी निषादों की कई उपजातियों को एससी का दर्जा दिया है लेकिन मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है इसलिए फिलहाल आरक्षण नहीं मिला है।

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