सियासत के माहिर खिलाड़ी शिवपाल को घेरने में जुटे बीजेपी और बीएसपी, जानिए कितना होंगे सफल

लखनऊ, 8 फरवरी: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। सभी दल एक दूसरे को पटकनी देने में जुटे हैं। इस बीच इटावा की जसवंतनगर सीट हमेशा से ही यूपी के लिए हाईप्रोफाइल सीट रही है। यह एक ऐसी सीट है जो कभी पूर्व सीएम मुलायम सिंह यादव और दर्शन यादव के बीच राजनीतिक जंग के लिए जानी जाती थी। लेकिन जैसे जैसे समय बीतता चला गया वैसे वैसे इस सीट पर मुलायम परिवार को एकक्षत्र राज बढ़ता चला गया और यह सीट मुलायम परिवार के लिए अपरोजय साबित हो गई। मुलायम के हटने के बाद इस सीट से उनके छोटे भाई शिवपाल यादव ने कमान संभाली और यादव परिवार की विरासत को अब तक कायम रखा। इस बार भी बदले हुए राजनीतिक माहौल में शिवपाल के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी अपने किले में सेंध लगने से रोकने की है।

शिवपाल यादव

साढ़े तीन दशक से इस सीट पर मुलायम परिवार का कब्जा

साढ़े तीन दशकों से जसवंतनगर सीट पर मुलायम परिवार का कब्जा रहा है। यादव मतदाता बहुल इस सीट से कभी कांग्रेस के बलराम सिंह भी विधायक रहे थे। यादवों के गढ़ में बीजेपी, कांग्रेस और बसपा ने कई बार मुलायम परिवार को अपने चक्रव्यूह में फंसाने की कोशिश की लेकिन नाकामयाबी ही मिली। इस सीट पर छठवीं बार विधायक बनने के लिए उतरे शिवपाल यादव के सामने इस बार कई चुनौतियां हैं। शिवपाल के मुबाकले सपा और बसपा ने नए सुरमाओं को उतारकर किले में सेंध लगाने का प्रयास किया है जबकि पड़ोस की करहल सीट पर बीजेपी ने अखिलेाश के खिलाफ एसपी बघेल को मैदान में उतारा है।

1996 से लगातार विधायक बने रहे शिवपाल

मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई और यूपी की सियासत के छिपे रुस्तम शिवपाल यादव इस सीट से 1996 से ही लगातार विधायक बनते आ रहे हैं। पिछले चुनाव में मोद लहर के बावजूद शिवपाल बीजेपी के उम्मीदवार को 52 हजार मतों से हराया था। हालांकि बाद में सैफई परिवार में आपसी कलह तेज हो गई और सपा में शिवपाल यादव हाशिए पर चले गए। अपनी उपेक्षा से नाराजग शिवपाल यादव ने अलग होकर समाजवादी प्रगतिशील पार्टी का गठन किया गया। पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने कई सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन अब चुनाव से पहले एक बार फिर परिवार में सुलह हो गई है और चाचा-भतीजे एक साथ चुनाव में आ गए हैं।

मुलायम

मुलायम परिवार के लिए अपराजेय रही यह सीट

जसंवतनगर विधानसभा मुलायम सिंह यादव के परिवार के लिए अपराजेय साबित हुई है। मुलाय सिंह यादव पहलवानी से राजनीति के मैदान में माहिर खिलाड़ी बनने की यात्रा का यह सीट साक्षी रही है। 1967 में पहली बार जसवंतनगर सीट से विधायक निर्वाचित हुए। बीच में 69 और 80 में छोड़कर मुलायम सिंह कुल सात बार इस सीट से विधायक रहे। 96 में यह सीट मुलायम सिंह ने अपने छोटे भाई शिवपाल यादव को सौंप दी। इस सीट पर मुलायम सिंह यादव ने जीत का जो सिलसिला शुरू किया था उसे विपक्ष आज तक नहीं तोड़ पाया है।

जातीय समीकरण से ही शिवपाल की घेरेबंदी

जसवंतनगर सीट पर बीजेपी यदि गैर यादव वोट को संगठित करने में सफल रही तो उसका प्रत्याशी यहां शिवपाल यादव को कड़ी टक्कर देने में सफल हो सकती है। प्रसपा और सपा के बीच हुए समझौते के तहत शिवपाल फिर से सपा के चुनाव चिन्ह पर ही चुनाव लड़ रहे हैं। जसवंतनगर से बसपा ने ब्रजेंद्र प्रताप सिंह को टिकट दिया है जबकि कांग्रेस ने यहां से सपा को वॉक ओवर देने का काम किया है। इसके अलावा कांग्रेस ने करहल से भी अखिलेश यादव के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारा है। इस बीच बीजेपी ने युवा और शाक्य समाज के उम्मीदवार विवेक शाक्य को टिकट देकर जसवंतनगर के साथ ही दूसरी सीटों का समीकरण भी साधने की कोशिश की है। इटावा में कई अन्य सीटों पर शाक्य वोट जिताऊ भूमिका में हैं इसलिए बीजेपी का यह अन्य दाव उसे जसवंत नगर के साथ ही अन्य सीटों पर फायदा दिला सकता है।

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