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यूपी की छपरौली सीट: जहां ना कोई लहर काम करती है ना हवा, 85 साल से कायम है चौधरी चरण सिंह परिवार का वर्चस्व

लखनऊ, 13 जनवरी: उत्तर प्रदेश में इस समय विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, जिसके लिए सभी राजनीतिक दल कमर कसे हुए हैं। यूपी में देश की सबसे ज्यादा विधानसभा सीटें हैं और सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री इसी सूबे से हुए हैं। ऐसे में राज्य में कई ऐसे परिवार हैं, जिनका राजनीति में तगड़ा दबदबा रहा है। बड़े नेताओं का अपनी सीटों पर प्रभाव कोई नई बात भी नहीं है लेकिन बागपत जिले की छपरौली सीट का जिस तरह का रिकॉर्ड रहा है। वो उत्तर प्रदेश तो क्या देश में अपनी तरह का अनोखा है।

85 साल बाप-बेटे का दबदबा

85 साल बाप-बेटे का दबदबा

उत्तर प्रदेश का बागपत जिला राजधानी दिल्ली और हरियाणा से मिलता हुआ है। जिले में तीन विधानसभा सीटें हैं लेकिन इनमें छपरौली सीट का राजनीतिक इतिहास और महत्व बहुत खास है। इस सीट पर अंग्रेजों के शासन से ही चौधरी चरण सिंह का वर्चस्व शुरू हुआ जो आज भी कायम है। साल 1937 से लेकर 2017 तक 80 साल में यहां हमेशा चौधरी चरण सिंह परिवार ने जिसको कैंडिडेट बनाया, वही जीता है। यहां ना कोई लहर काम करती है और ना ही किसी हवा में इस सीट का रुख बदलता है।

1937 में पहली बार चरण सिंह लड़े थे चुनाव

1937 में पहली बार चरण सिंह लड़े थे चुनाव

किसान मसीहा कहे जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह ने अंग्रेजी शासन में अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था। करीब 35 साल की उम्र में 1937 में उन्होंने छपरौली विधानसभा से चुनाव लड़ा और पहली बार विधायक बने। देश की आजादी के बाद भी वो यहां से लड़ते रहे और 1977 तक लगातार 30 साल इस सीट से विधायक रहे।

चरण सिंह पहले कांग्रेस में रहे फिर उन्होंने अपनी पार्टी भारतीय क्रान्ति दल बनाई। जनता दल के साथ भी चरण सिंह रहे। छपरौली के मतदाताओं को कभी इससे फर्क नहीं पड़ा कि चरण सिंह किस पार्टी में हैं। जिसको भी उनकी ओर से समर्थन या टिकट दिया गया, उसे छपरौली की जनता ने विधायक बनाकर भेज दिया।

अजित सिंह और सरोज भी बनीं छपरौली से विधायक

अजित सिंह और सरोज भी बनीं छपरौली से विधायक

छपरौली से चौधरी चरण सिंह की बेटी सरोज 1985 और बेटे अजित सिंह भी 1991 में विधायक रहे। चौधरी चरण सिंह की मौत के बाद अजित सिंह को उनकी सियासी विरायत मिली तो उनके साथ भी छपरौली के लोग उसी तरह खड़े रहे। अजित सिंह ने राष्ट्रीय लोकदल बनाई तो छपरौली ने राष्ट्रीय लोकदल को साथ दिया। 2002 से 2017 तक यहां लगातार रालोद का कैंडिडेट जीता है।

अब जयंत के कंधों पर जिम्मेदारी

अब जयंत के कंधों पर जिम्मेदारी

2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की जबरदस्त लहर देखने को मिली थी। प्रदेशभर में 300 से ज्यादा सीटें भाजपा ने जीती थी, तब भी रालोद ने छपरौली सीट पर अपना कब्जा जमाए रहा रखा था। मई 2021 को अजित सिंह का निधन हो जाने के बाद अब रालोद की जिम्मेदारी उनके बेटे जयंत चौधरी के कंधों पर आ टिकी है। ऐसे में चरण सिंह और अजित सिंह के साथ 80 साल के राजनीतिक सफर के बाद अब छपरौली जयंत चौधरी के साथ कैसे खड़ी होती है, ये इस चुनाव में देखना दिलचस्प होगा।

पढ़ें- यूपी चुनाव: कांग्रेस ने जारी की कांग्रेस उम्मीदवारों की पहली लिस्ट, उन्नाव गैंगरेप पीड़िता की मां को टिकट

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