यूपी: इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- हत्या के मामले में आजीवन कारावास होगी न्यूनतम सजा

इलाहाबाद। हत्या जैसे जघन्य अपराध के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। हत्या के मुकदमे में दोष सिद्ध होने के बाद दोषी को न्यूनतम उम्र कैद की सजा दी जा सकेगी। इस बाबत इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मुकदमे को निस्तारित करते हुए कहा कि हत्या के अपराध में आजीवन कारावास की सजा न्यूनतम सजा है। साक्ष्यों के आधार पर अगर आरोप सिद्ध होते हैं तो आजीवन कारावास की सजा निर्धारित की गई है। सजा में बदलाव संबंधी कोई भी न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।

यूपी: इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- हत्या के मामले में आजीवन कारावास होगी न्यूनतम सजा

क्या है मामला

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के छपरौली निवासी अली मोहम्मद की हत्या 29 मई 2005 को हुई थी। मुकदमे के अनुसार अली मोहम्मद ट्यूबवेल पर सोए थे तभी उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। वारदात को अंजाम देते हुए 2 लोगों ने देखा था, जिसके आधार पर स्थानीय थाने में नसीम अहमद ने हत्या का मुकदमा दर्ज कराया था। इस मामले में पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल की, जिसके बाद साक्ष्यों के आधार पर सत्र न्यायालय बागपत ने अली मोहम्मद की हत्या के आरोपी को आजीवन कारावास व पांच सौ रूपए के जुर्माने की सजा सुनाई थी। आरोपी ने अपनी उम्र को आधार बनाकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में सत्र न्यायालय के आदेश जेल से अपील दाखिल कर चैलेंज किया और आजीवन सजा को बदलने की की मांग की। जिस पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया है।

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क्या हुआ हाईकोर्ट में

उम्र कैद की सजा के निर्धारण वाले इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति ओमप्रकाश की खंडपीठ ने शुरू की तो न्यायालय में याचिकाकर्ता की ओर से उम्र की सीमा को देखते हुए आजीवन कारावास की सजा में बदलाव की गुजारिश की गई। हालांकि हाईकोर्ट ने हत्या के मुकदमे में दोष सिद्ध होने पर सत्र न्यायालय द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को सही माना और सजा में किसी तरह का बदलाव करने की गुंजाइश को समाप्त करते हुए सजा को बहाल रखा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी पर ट्यूबवेल पर खेत में सोए व्यक्ति को गोली मारकर हत्या करने का पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों गवाहों के बयानों के आधार पर आरोप साबित हुए हैं। ऐसे में सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई सजा पर हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। हाईकोर्ट ने आदेश की प्रति जेल अधीक्षक को भेजने का निर्देश देते हुए अनुपालन रिपोर्ट मांगी है।

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