विशेष: इलाहाबाद हाईकोर्ट के 150 साल पूरे, पढ़िए इसका गौरवशाली इतिहास

बात 1861 की है तब अंग्रेजी हुकूमत भारत पर शासन कर रही थी और ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ इसकी सर्वेसर्वा थीं। उन दिनों सदर अदालतों को समाप्त कर ये सोचा जा रहा था कि इसका विकल्प क्या हो!

इलाहाबाद। भारत और विश्व इतिहास में 17 मार्च 1866 का दिन स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है और हो भी क्यों न क्योंकि इसी दिन अपने बेबाक और ऐतिहासिक फैसलों के लिए प्रसिद्ध इलाहाबाद हाईकोर्ट अस्तित्व में आया था। अंग्रेजी हुकूमत के दरमियान वजूद में आए व देश के सबसे पुराने न्यायालयों में शुमार इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बीते वर्षों में मार्च के महीने में ही अपनी स्थापना की जिसकी 150वीं वर्षगांठ भव्य रूप से मनाई जानी है। जश्न आगामी 2 अप्रैल को होगा जिसकी तैयारियां पूर्ण हो चुकी हैं।

विशेष: इलाहाबाद हाईकोर्ट के 150 साल पूरे, पढ़िए इलरा गौरवशाली इतिहास

लेकिन बहुत ही कम लोग इलाहाबाद उच्च न्यायालय के गौरवशाली इतिहास को जानते होंगे। संगम नगरी की चमक को चार चांद लगता और न्याय की नगरी कहलाने वाला ये इलाहाबाद यूं ही नहीं दुनिया की नजर में रहता है। एक लंबा सफर तय कर बदलाव और न्याय की मिशाल बनकर इस कोर्ट ने खुद को स्थापित किया है। यूं तो इलाहाबाद हाईकोर्ट की स्थापना 1866 में ही हो गई थी। लेकिन शहर के बीचों बीच बनी इलाहाबाद हाई कोर्ट की मौजूदा ऐतिहासिक इमारत सौ साल पहले अस्तित्व में आई। जिसका शताब्दी वर्ष भी मनाया गया। इस इमारत से असाधारण कानूनी सेवाएं किसी शानदार विरासत की तरह संजोई गई हैं। जिस पर आम जनमानस से लेकर कानूनी कर्तव्यों का पालन करने वाले गर्व करते हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट को ये गौरव भी प्राप्त है कि यहां सबसे ज्यादा मुस्लिम न्यायाधीशों ने अपने कानूनी कर्तव्यों का पालन किया है।

विशेष: इलाहाबाद हाईकोर्ट के 150 साल पूरे, पढ़िए इलरा गौरवशाली इतिहास

17 मार्च 1866 का दिन

बात 1861 की है तब अंग्रेजी हुकूमत भारत पर शासन कर रही थी और ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ इसकी सर्वेसर्वा थीं। उन दिनों सदर अदालतों को समाप्त कर बम्बई, कलकत्ता और मद्रास की तीनों प्रेसीडेंसियों के लिए एक-एक न्यायालय के गठन की रणनीति बनी लेकिन भारत के उत्तर भाग में ऐसा कुछ नहीं हो सका था। ब्रिटिश शासन की कानूनी न्याय व्यवस्था के लिए ये रणनीति लागू करना आवश्यक था। जिसके तहत भारत के उत्तरी-पश्चिमी प्रदेशों के लिए एक उच्च न्यायालय के गठन का प्लान तैयार हुआ। उस समय महारानी एलिजाबेथ द्वारा जारी लेटर्स पेटेंट के जरिए हाईकोर्ट की नींव रखने की पहल हुई और इंडियन हाईकोर्ट एक्ट 1861 के तहत 17 मार्च 1866 को अगरा में मौजूदा इलाहाबाद हाईकोर्ट अस्तित्व में आ गया।

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सिर्फ 6 न्यायाधीश और गिनती के बैरिस्टर

आज इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या 160 स्वीकृत है लेकिन अस्तित्व में आने पर यहां न्यायाधीशों की संख्या मात्र 6 रखी गई थी। उस वक्त उत्तरी-पश्चिमी प्रान्तों के लिए स्थापित इस हाईकोर्ट के पहले मुख्य न्यायाधीश बने सर वाल्टर मॉर्गन और उनके साथ पांच और न्यायाधीशों के यहां नियुक्ति मिली। हालांकि वर्तमान समय में इलाहाबाद में न्यायधीशों के लगभग आधे पद खाली पड़े हैं। आज हाईकोर्ट में भले ही वकीलों की बाढ़ हो (17 हजार से भी ज्यादा वकील यहां हैं) लेकिन उस वक्त वकील दर्जन भर के आंकड़े में थे। हालांकि तब मुकदमे बहुत कम थे और सबसे ज्यादा विद्वान बैरिस्टर को ही माना जाता था।

कैसे बनी लखनऊ खंडपीठ

देश की आजादी की लड़ाई में हुए काकोरी कांड में ऐतिहासिक मुकदमें का निर्णय अवध चीफ कोर्ट लखनऊ में ही दिया गया था। फिलहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का बनना भी बहुत दिलचस्प रहा। क्योंकि हाईकोर्ट की बेंच लखनऊ में कभी स्थापित ही नहीं की गई थी। दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट की स्थापना से पहले 1856 में ही अवध कोर्ट लखनऊ अस्तित्व में आ चुका था। इसे 1925 में चीफ कोर्ट ऑफ अवध के नाम से जाना जाने लगा। लेकिन 1948 में हाईकोर्ट ने एक अमलगमेशन ऑर्डर पारित किया। जिसके चलते इसे इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच के रूप में स्वीकृति मिल गई। बता दें कि 25 फरवरी 1948 को यूपी विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित कर राज्यपाल द्वारा गवर्नर जनरल को ये अनुरोध किया की अवध चीफ कोर्ट लखनऊ और इलाहाबाद हाई कोर्ट को मिलाकर एक कर दिया जाए। इसका परिणाम ये हुआ की लखनऊ और इलाहाबाद के दोनों (प्रमुख व उच्च) न्यायालयों को 'इलाहाबाद उच्च न्यायालय' नाम से जाना जाने लगा और इसका सारा कामकाज इलाहाबाद से चलने लगा। हां इतना जरूर हुआ की हाई कोर्ट की एक स्थाई बेंच लखनऊ में बनी रहने दी गई जिससे सरकारी काम में व्यवधान न हो।

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अभिलेखों में दर्ज आंकड़े बताते हैं कि अवध कोर्ट ज्यूडीशियल कमिश्नर के अधीन थी और 12 जिलों के मामले यहां निस्तारित होते थे। आंकड़े ये भी बताते हैं कि 1916 में अवध चीफ कोर्ट की वर्तमान बिल्डिंग सिर्फ 15 लाख रुपए की लागत से बनी थी और 27 नवंबर 1916 से इस बिल्डिंग में कोर्ट बैठने लगी। बाद में 26 जुलाई 1948 से अवध चीफ कोर्ट भी इससे जुड़ गई और जैसा कि हमने आपको बताया कि यही चीफ कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के तौर पर जानी जाने लगी।

1869 में मिला नाम 'इलाहाबाद हाईकोर्ट'

सन् 1869 में हाईकोर्ट को आगरा से इलाहाबाद स्थानान्तरित कर दिया गया। यहां हाईकोर्ट की कोई खुद की इमारत तो थी नहीं इसलिए 1916 तक राजस्व परिषद की बिल्डिंग में ही कोर्ट चलता रहा। 11 मार्च 1919 को पूरक लेटर्स पेटेंट के द्वारा इस हाईकोर्ट का नाम बदल कर 'इलाहाबाद उच्च न्यायालय' (हाईकोर्ट ऑफ जूडीकेचर ऐट इलाहाबाद) रख दिया गया और इसके बाद से आज तक हम इसे इसी नाम से जानते हैं। न्यायालय में इलेक्ट्रॉनिक डिजिटल डिस्प्ले और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा भी उपलब्ध है। यहां की सुरक्षा व्यवस्था बहुत कड़ी रखी जाती है।

ये रहे खास न्यायाधीश

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों का भी सुनहरा इतिहास रहा है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की अपने स्थापना वर्ष 1866 में मुख्य न्यायाधीश वॉल्टर मॉर्गन की नियुक्ति से लेकर वर्तमान न्यायाधीश डीबी भोसले तक 46 न्यायविदों ने इस पद की गरिमा बढ़ाई और आम जनता को न्याय दिलाने में मदद की लेकिन उनमें से कुछ रोचक आंकड़े रहे।

1, 1866-71 - सर वॉल्टर मॉर्गन (हाईकोर्ट के पहले चीफ जस्टिस)

2, 1947-55 - चीफ जस्टिस विधु भूषण मलिक (आजादी के दौरान)

3, 14 मई 1948 - जस्टिस शंभूनाथ सेठ (आजादी के बाद पहली नियुक्ति)

4, 1955-61 - सर ओएच मूथम (अंतिम ब्रिटिश जज)

5, 1966 - जस्टिस सैयद महमूद (मात्र 32 वर्ष में जज बने)

6, 1932-37 - चीफ जस्टिस सर शाह मोहम्मद सुलेमा

7, 1887 - जस्टिस सैयद महमूद (पहले भारतीय जज)


पहनते थे घोड़े के बाल और नायलॉन का विग

इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी जज घोड़े के बाल और नायलॉन से बना विग पहनते थे। जज सामने से खुला केप कॉलर और लूज स्लीव वाला लाल रंग का गाउन पहनते थे। इसके अंदर काला वेस्ट कोट और नी लेंथ ट्राउजर और लंबे मोजे पहने जाते थे। हालांकि अब हटा दिया गया है।

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दान में मिला था फव्वारा

इलाहाबाद उच्च न्यायालय परिसर में लगा पानी का फव्वारा (वॉटर फाउंटेन) लोगों को आकर्षित करता है और यहां की खूबसूरती बढ़ता है। लेकिन ये बहुत कम लोग जानते होंगे कि ये दान में मिला हुआ है। दरअसल वर्तमान इमारत का निर्माण आगरा लोहामंडी के खान साहिब निजामुद्दीन ने कराया। इसके बाद उन्होंने फव्वारा दान स्वरूप प्रदान किया। वर्ष 2000 तक उत्तराखंड भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधीन था लेकिन उसी वर्ष उत्तराखंड राज्य के रूप में अस्तित्व में आया और अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के कार्यक्षेत्र से उत्तराखंड के तेरह जिले निकल गए हैं।

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