क्या करारी हार के बावजूद सपा के सुल्तान बने रहेंगे टीपू?
अखिलेश जब 2012 में मुख्यमंत्री बने तो उस समय समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव थे। उनके नेतृत्व में पार्टी को बड़ी जीत मिली और मुख्यमंत्री का पद अखिलेश यादव को प्लेट में सजा-सजाया मिल गया।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों के बाद यूपी के सीएम रहे अखिलेश यादव के भविष्य को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। क्या अभी भी वो पार्टी के सुल्तान बने रहेंगे? ये सवाल इसलिए क्योंकि जब समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव थे, जिस समय उन्होंने प्रदेश में सत्ता संभाली तो ये माना जाता था कि प्रदेश में यादव राज है। उस कानून व्यवस्था को लेकर भले ही सवाल खड़े किए जाते रहे हों, विपक्ष ने गुंडाराज का आरोप मढ़ा हो लेकिन मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में कहीं न कहीं दबंगई का असर नजर आता था।
क्या पार्टी की छवि बदलने की कोशिश ही अखिलेश के हार की वजह है?
अखिलेश जब प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने पार्टी की इसी बनी बनाई छवि को तोड़ने की कोशिश की। उन्होंने पुरानी राजनीति को छोड़कर नई इबारत रचने की योजना बनाई। जाति पर निर्भरता को छोड़कर विकास और किए गए कार्यों को आगे बढ़ाने की कवायद शुरू की। हालांकि यूपी चुनाव 2017 के नतीजों ने कहीं न कहीं उनकी रणनीति को झटका दे दिया।

अब क्या होगा अखिलेश का अगला दांव?
यूपी चुनाव 2017 का फैसला 43 साल के इस युवा के नेतृत्व क्षमता पर कई संदेह खड़े कर रहा है। जिस तरह से उन्होंने पार्टी का नेतृत्व किया, चुनाव के दौरान अपने फैसले लिए, कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन किया, इन फैसलों के जरिए उन्होंने ये सोचा था कि पार्टी की नई छवि बनाकर इसे आगे लेकर जाएंगे। हालांकि अब नतीजों के बाद उनके सामने चुनौतियों का नया अंबार खड़ा कर दिया है। इसमें पार्टी के नेतृत्व से लेकर इसे एकजुट रखने की कवायद तक शामिल है। ऐसा इसलिए क्योंकि उनके चाचा शिवपाल यादव लगातार उनके खिलाफ मोर्चा संभाले हुए हैं। पार्टी की हार को एक बार फिर से वो अपने लिए भुनाने की कोशिश करेंगे, माना जा रहा है कि वो इसे अखिलेश के घमंड के तौर प्रायोजित करेंगे और भतीजे को घेरने की कोशिश करेंगे।

पार्टी को एकजुट रखना होगा बड़ी चुनौती
यूपी चुनाव में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी ने प्रदर्शन किया, प्रदेश की दोनों बड़ी सियासी पार्टियां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को कहीं पीछे छोड़ दिया। यूपी चुनाव के बाद अब अखिलेश यादव को एक राजनेता के तौर पर खुद को स्थापित करने की कवायद का समय मिलेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि अखिलेश जब 2012 में मुख्यमंत्री बने तो उस समय समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव थे। उनके नेतृत्व में पार्टी को बड़ी जीत मिली और मुख्यमंत्री का पद अखिलेश यादव को प्लेट में सजा-सजाया मिल गया। अब अखिलेश यादव खुद ही पार्टी के मुखिया हैं। उनके सामने बीजेपी जैसी बड़ी चुनौती है। साथ ही बीएसपी की चुनौती भी है। अब उन्हें इनसे निपटने के लिए अपनी खास रणनीति बनानी कवायद में जुटना होगा।

कांग्रेस के गठबंधन से हुआ नुकसान
अखिलेश यादव का कांग्रेस से गठबंधन का फैसला कहीं न कहीं उनकी रणनीतिक चूक को दर्शाता है। अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव ने इस फैसले का सीधे तौर पर विरोध किया था। साथ ही उनके चाचा शिवपाल यादव ने भी नाराजगी जताई थी। समाजवादी पार्टी के नेता रविदास मेहरोत्रा ने चुनाव के बाद ही इस फैसले को लेकर अपना विरोध जताया। उन्होंने कहा कि हम चुनाव जीत जाते अगर कांग्रेस साथ नहीं होती। हमें अपने उम्मीदवार खड़े करना चाहिए था।

कैसे निपटेंगे इन चुनौतियों से?
फिलहाल अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी के लिए नया राजनीतिक एजेंडा खड़ा किया है। उन्होंने अपने पिता की तरह जाति आधारित राजनीति से अलग हटकर विकास और कांग्रेस पार्टी से गठबंधन की रणनीति पर काम किया। उन्होंने अपनी पत्नी डिंपल को भी चुनाव मैदान में स्टार कैंपेनर की तरह उतारा। भले ही उनके पिता एंटी कांग्रेस रहें हों, सोशल इंजीनियरिंग को साधने में जुटे रहे हों, लेकिन उन्होंने वोट के लिए परिवार की महिला सदस्यों को चुनाव प्रचार में नहीं उतरने दिया। ऐसे में अब अखिलेश यादव के सामने नई चुनौतियां हैं। उन्हें जहां खुद को साबित करना है वहीं 2019 के चुनाव से ठीक पहले बीजेपी के दौर से मुकाबला करते हुए पार्टी को मजबूत करना है। फिलहाल वो ये सब कैसे करेंगे देखना दिलचस्प होगा?












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