Samajwadi Party National Executive: Ramcharitmanas विवाद के बीच क्यों बढ़ा स्वामी प्रसाद मौर्य का कद

Samajwadi Party New Executive: अखिलेश के इस कदम के बाद ये अटकलें लगाईं जाने लगी है कि रामचरित मानस विवाद अभी थमने वाला नहीं है और इसको लेकर यूपी में अभी और सियासी खिचड़ी पकती रहेगी।

अखिलेश

Samajwadi Party New Executive: अगले साल होने वाले आम चुनाव से पहले यूपी की सियासत के करवट ले रही है। पिछले कुछ दिनों से यूपी के में Ramcharitmanas को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। बीएसपी छोड़कर सपा में आए स्वामी प्रसाद मौर्य ने Ramcharitmanas को लेकर विवादित बयान दिया था। उनके बयान में अब ओबीसी महासभा भी उतर पड़ी है। रविवार को लखनऊ में श्रीरामचरित मानस की प्रतियां जलाईं गईं थीं। यूपी की सत्ताधारी बीजेपी स्वामी प्रसाद को लेकर अखिलेश यादव पर निशाना साधने में जुटी थी लेकिन रविवार को अखिलेश ने एक झटके में स्वामी प्रसाद का प्रमोशन कर उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बना दिया। अखिलेश के इस कदम के बाद ये अटकलें लगाईं जाने लगी है कि रामचरित मानस विवाद अभी थमने वाला नहीं है और इसको लेकर यूपी में अभी और सियासी खिचड़ी पकती रहेगी।

Ramcharitmanas पर विवादित बयान के बाद स्वामी प्रसाद को प्रमोशन

Ramcharitmanas पर विवादित बयान के बाद स्वामी प्रसाद को प्रमोशन

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ सहयोगी और एमएलसी स्वामी प्रसाद मौर्य के रामचरितमानस पर विवादित और बार-बार दिए गए बयानों पर चुप्पी तोड़ते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मौर्य के साथ एकजुटता का संकेत दिया और शनिवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर तीखा हमला बोलते हुए कहा, "बीजेपी हमें पिछड़ों और दलितों को शूद्र (अछूत) मानती है।" इस बयान के बाद ही सपा की ओर से जारी की गई सूची में स्वामी प्रसाद मौर्य का कद बढ़ा दिया गया। यानी रामचरित मानस को लेकर जो विवाद उपजा है उसपर अभी और सियासी खिचड़ी पकती रहेगी।

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    अखिलेश यादव का यह बयान स्वामी प्रसाद मौर्य के फोन करने के कुछ घंटे बाद आया था। रविवार को पार्टी कार्यालय में उनकी बैठक एक घंटे से कुछ अधिक समय तक चली थी अखिलेश ने राज्य की राजधानी में एक धार्मिक कार्यक्रम के आयोजन स्थल के बाहर इंतजार कर रहे पत्रकारों से कहा, "भाजपा को हमारे 'उनके' धार्मिक स्थलों पर जाने और संत-महात्माओं (संतों) से आशीर्वाद लेने में समस्या है।" अखिलेश ने स्वामी प्रसाद मौर्य पर उनके रुख पर सीधे सवाल के जवाब में जातिगत जनगणना के मुद्दे को हवा देने की कोशिश की थी।

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    अखिलेश यादव ने रामचरित मानस विवाद के बीच स्वामी प्रसाद को लेकर जो कदम उठाया है, वह सपा की सोची समझी रणनीति है। बीजेपी पहले ही यह आरोप लगा रही थी कि अखिलेश की मंशा के अनुरूप ही स्वामी प्रसाद बयान दे रहे हैं। हालांकि जानकारों का कहना है कि जिस तरह से रविवार को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की लिस्ट जारी हुई उसमें मुस्लिम-यादव समीकरण की जगह दलित-ओबीसी गठजोड़ पर फोकस किया गया है। यानी ओबीसी के अपमान से जुड़े इस मुद्दे को सपा आगे भी तूल देगी ताकि ओबीसी समुदाय के मन में इसको अच्छे से भरा जा सके।

    रामचरित मानस विवाद के पीछे राजनीतिक स्वार्थ

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    इधर, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा है कि केवल राजनीतिक लाभ के लिए इसे उठाया जा रहा है। मायावती अपने एक ट्वीट में कहती हैं कि, राजनीतिक लाभ के लिए नए विवाद पैदा करने की भाजपा की योजना सर्वविदित है, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) भी ऐसा ही कर रही है। संकीर्ण राजनीतिक और चुनावी स्वार्थों के लिए नए-नए विवाद पैदा करने, जातीय और धार्मिक घृणा फैलाने, उन्माद पैदा करने और धर्मांतरण आदि की भाजपा की राजनीतिक पहचान जगजाहिर है। लेकिन रामचरितमानस की आड़ में सपा का वही राजनीतिक रंग है। यह दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है।

    क्या बीजेपी से ओबीसी को छिटकाने की तैयारी में हैं अखिलेश

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    लखनऊ में विद्यांत हिन्दू पीजी कॉलेज में सोशल स्टडीज के प्रोफेसर मनीष हिन्दवी कहते हैं कि दरअसल पूरी लड़ाई अब ओबीसी वोट बैंक को लेकर हो गई है। शायद सपा के मुखिया अखिलेश यादव इस बात को अच्छी तरह से समझ चुके हैं कि जब तक ओबीसी समुदाय पार्टी से नहीं जुड़ेगा तब तक सरकार नहीं बन सकती है। विधानसभा चुनाव में 31 फीसदी वोट पाने के बाद भी वह सरकार नहीं बना पाए क्योंकि ओबीसी वोट बैंक बीजेपी के साथ चला गया था। अखिलेश को इस बात का अहसास हो गया है कि ब्राह्मण समुदाय उनको वोट नहीं देगा इसलिए उन्होंने ओबीसी की तरफ जाने का दांव खेला है।

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