सपा-बसपा के गठबंधन के बाद बदला यूपी का समीकरण, जानिए कैसे भाजपा को मिलेगा फायदा

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    Uttar Pradesh By polls में SP & BSP allaince से ऐसे मिलेगा BJP को फायदा । वनइंडिया हिंदी

    लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए सपा और बसपा लगातार अपनी कोशिश कर रही है। इसी कड़ी में आज बसपा ने सपा को यूपी में होने वाले उपचुनाव में समर्थन देने का ऐलान किया है। दिलचस्प बात यह है कि 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश यादव एक तरफ जहां मायावती को बुआ कहकर उनपर तंज कसते रहे और दूसरी तरफ मायावती अखिलेश को बबुआ कहकर उनका मजाक उड़ाती रही, अब दोनों एक साथ आ गए हैं। लेकिन खास बात यह है कि दोनों के साथ आने के बाद भी गोरखपुर और फूलपुर की सीट पर होने वाले चुनाव में पर कोई खास असर पड़ता नहीं दिख रहा है।

    गोरखपुर में गोरक्षपीठ का दबदबा

    गोरखपुर में गोरक्षपीठ का दबदबा

    दरअसल मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने पहले से ही इस उपचुनाव में अपनी किसी भी तरह की कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि गोरखपुर में गोरक्षपीठ का दबदबा दशकों से है, खुद योगी आदित्यनाथ यहां से लगातार पांच बार सांसद रह चुके हैं, जबकि उनसे पहले यहां के गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजयनाथ और उनके बाद योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैधनाथ यहां सांसद रहे। 1989 के बाद से यहां गोरक्षपीठ का कब्जा है। ऐसे में यह पहली बार है कि जब इस सीट पर गोरक्षपीठ की ओर से कोई उम्मीदवार नहीं उतारा गया है। लेकिन प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए यह सीट काफी अहम है, लिहाजा वह यहां से भाजपा के उम्मीदवार उपेंद्र दत्त शुक्ला को लोकसभा भेजने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। वहीं भाजपा के खिलाफ सपा ने निषाद पार्टी के अध्यक्ष के इंजीनियर बेटे प्रवीण निषाद को मैदान में उतारा है। यहां सपा और निषाद पार्टी मिलकर चुनाव लड़ रही है। गोरखपुर में बड़ी संख्या में निषाद वोटर हैं, ऐसे में सपा कोशिश कर रही है कि वह निषाद वोटर्स को अपनी ओर खींच सके।

    फूलपुर में नूराकुश्ती

    फूलपुर में नूराकुश्ती

    दोनों सीटों पर सबसे बड़ी चुनौती भाजपा के लिए इलाहाबाद की फूलपुर की सीट है, यहां केशव प्रसाद के इस्तीफा देने के बाद सीट को अपने पास बनाए रखना पार्टी बड़ी चुनौती है। भाजपा की ओर से वाराणसी के पूर्व महापौर कौशलेंद्र सिंह पटेल को उम्मीदवार बनाया गया है, जबकि सपा ने नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल को मैदान में उतारा है। जबकि कांग्रेस ने जेएन मिश्रे के बेटे मनीष मिश्रा को टिकट दिया है। लेकिन यहां सीधी लड़ाई सपा और भाजपा के बीच है।

    अतीक ने दिलचस्प की लड़ाई

    अतीक ने दिलचस्प की लड़ाई

    फूलपुर की लड़ाई इसलिए भी दिलचस्प हो गई है क्योंकि यहां अतीक अहमद ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ताल ठोंक दी है। गौर करने वाली बात यह है कि विधानसभा चुनाव के दौरान अतीक अहमद से दूरी बनाई थी, ऐसे में वह यह बिल्कुल नहीं चाहेंगे कि अतीक अहमद लोकसभा पहुंचे। हालांकि अगर बसपा ने उन्हे अपना समर्थन दिया होता तो अतीक लोकसभा पहुंच सकते थे। लेकिन बसपा के सपा को समर्थन के ऐलान के बाद अतीक अहमद अब सपा के लिए मुश्किल बन गए हैं।

    सपा के खफा मुस्लिम समुदाय

    सपा के खफा मुस्लिम समुदाय

    दरअसल फूलपुर का मुस्लिम समुदाय सपा के कार्यकाल से बिल्कुल भी खुश नहीं है। मुस्लिम समुदाय सपा पर यह आरोप लगा रहा है कि सपा उन्हे मुस्लिम वोटर के नाम पर सिर्फ इस्तेमाल किया है। मुस्लिम समुदाय भाजपा के साथ जाने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है, ऐसी स्थिति में अतीक अहमद को मिलने वाले वोट सीधे तौर पर सपा को नुकसान पहुंचाएंगे। जिसके परिणामस्वरूप भाजपा को लाभ मिलेगा। अतीक और सपा के बीच की लड़ाई का सीधा फायदा भाजपा को होता दिख रहा है। फूलपुर में कुर्मी वोटरों को को रिझाने के लिए भाजपा और सपा दोनों ने कुर्मी उम्मीदवार उतारे हैं। ऐसे में अगर कुर्मी वोटों के साथ मुस्लिम वोटों में सेंधमारी होती है तो इसका सीधा नुकसान सपा को होगा और भाजपा को फिर से इस सीट को जीतने में बहुत मुश्किल नहीं होनी चाहिए।

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