अखिलेश के 'लेटर दांव' के बाद शिवपाल- राजभर के सामने क्या हैं ऑप्शन, जानिए
लखनऊ, 23 जुलाई: उत्तर प्रदेश की सियासत में हर दिन एक नया लेटर बम फूट रहा है। पिछले कुछ दिनों से यूपी की राजधानी लखनऊ में योगी सरकार के तबादलों को लेकर चर्चा थी लेकिन अब सारा ध्यान अखिलेश के उस कदम की ओर चला गया है जो उन्होंने शिवपाल-राजभर के बयानों ने के बाद उठाया है। दरअसल समाजवादी पार्टी ने इन दोनों नेताओं को एक लेटर जारी किया है जिसमें कहा गया है कि दोनों नेता अपनी राह चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। अखिलेश के इस लेटर दांव के बाद अब शिवपाल-राजभर का अगला कदम क्या होगा। सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या शिवपाल की सदस्यता से इस्तीफा देंगे या फिर ओम प्रकाश राजभर गठबंधन से अलग होने का आधिकारिक ऐलान करेंगे।

ओम प्रकाश राजभर के पास क्या बचे हैं ऑप्शन
अखिलेश के इस दांव के बाद एसबीएसपी के चीफ ओम प्रकाश राजभर के पास जो ऑप्शन बचे हैं उसमें एक यह भी है कि चूंकि उनकी एक अपनी पार्टी है और विधानसभा चुनाव के बाद से ही वह बीजेपी के करीब आ गए हैं। बीजेपी की करीबी की वजह से उन्हें वाई श्रेणी की सुरक्षा भी मिली है। वह अपनी पार्टी के विधायकों के साथ आम चुनाव तक एक स्वतंत्र दल के तौर पर रहकर बीजेपी की मदद कर सकते हैं। इसके पीछे की वजह यह भी है कि राजभर और बीजेपी की ट्यूनिंग फिलहाल ठीक हो गई है। इसके संकेत इससे भी मिल रहे हैं कि राजभर ने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान खुद ही कहा था कि उनकी अमित शाह से बात हुई थी। यानी वो बीजेपी के नेताओं के सम्पर्क में हैं।

अब क्या कांग्रेस- मायावती के साथ गठबंधन की संभावना तलाशेंगे
इसके अलावा राजभर के पास ऑप्शन यह भी है कि वो बसपा की मुखिया मायावती के साथ गठबंधन करें। इसके संकेत वह कई बार दे चुके हैं और उन्होंने अखिलेश यादव को भी बसपा के साथ मिलकर गठबंधन बनाने की नसीहत दी थी। इसके बाद ही अखिलेश ने कहा था कि उन्हें किसी की सलाह की जरूरत नहीं है। बसपा में रहकर वो अपने कई समीकरण भी साध सकते हैं। इसके साथ ही उनके लिए एक ऑप्शन कांग्रेस भी हो सकती है लेकिन यूपी में फिलहाल कांग्रेस की जो स्थिति है उसमें ऐसा नहीं लगता कि वो कांग्रेस के साथ जाएंगे।

अखिलेश के चाचा शिवपाल अब कौन सा रास्ता चुनेंगे
राजभर के अलावा अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव के सामने विकल्प बहुत ही समिति हैं। राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान जिस तरह से शिवपाल ने भी सपा से अलग हटकर द्रौपदी मुर्मू के लिए वोटिंग कर बीजेपी के प्रति अपनी वफादारी का सबूत दिया था। लेकिन शिवपाल के सामने चुनौत यह है कि राष्ट्रपति चुनाव के दौरान उनके साथ मिलकर क्रॉस वोटिंग करने वाले 4 विधायक उनके साथ दिखें जिससे उनकी बारगेनिंग पॉवर बढ़ेगी। यदि शिवपाल ऐसा करने में कामयाब होते हैं तो आने वाले दिनों में वह अखिलेश के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं।

आम चुनाव तक अपनी पार्टी को मजूबत करेंगे शिवपाल
शिवपाल के पास दूसरा ऑप्शन यह है कि वो अगले आम चुनाव का इंतजार करें और इस समय का उपयोग वो अपनी पार्टी को और मजबूत करने में लगाएं। बीजेपी को भी यह एहसास है कि शिवपाल अभी यादवों का मसीहा नहीं बन पाए हैं। यादव समाज आज भी अखिलेश यादव को अपना नेता मानता है। जब तक शिवपाल यादव अपने समाज में अपनी स्वीकार्यता नहीं बनाएंगे तब तक वो किसी भी पार्टी से बारगेनिंग करने की स्थिति में नहीं रहेंगे।

राष्ट्रपति चुनाव में शिवपाल-राजभर ने दिया बीजेपी का साथ
देश में हाल ही में सम्पन्न हुए राष्ट्रपति चुनाव में शिवपाल और ओम प्रकाश राजभर ने बीजेपी का साथ दिया था। अखिलेश के साथ मिलकर विधानसभा का चुनाव लड़ने वाले राजभर ने अखिलेश की लाइन से अलग हटकर एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को अपना समर्थन दिया था जिससे अखिलेश काफी नाराज हैं। यही हाल शिवपाल का भी है। शिवपाल ने सपा की लाइन से अलग हटकर खुद तो द्रौपदी मुर्मू को वोट किया ही था सपा के चार विधायकों को भी तोड़ने में कामयाबी हासिल की थी।












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