उत्तर प्रदेश: केजरीवाल की चुनाव लड़ने की घोषणा पर भाजपा आक्रामक क्यों?
AAP and BJP in political fray of UP लखनऊ। दिल्ली के मुख्यमंत्री, आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने यूपी विधान सभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर एक गुगली फेंकी। उनकी इस घोषणा के बाद राज्य सरकार के मंत्री, विधायक और पार्टी पदाधिकारी फ्रंट फुट पर आकर खेल रहे हैं। संभव है कि भाजपा अपने इस आक्रामक रुख से कुछ सकारात्मक देख रही हो लेकिन इसका फायदा असल में केजरीवाल को मिलेगा। केजरीवाल के आने से विपक्षी पार्टियों को चिंता होनी चाहिए लेकिन वे सबके सब मौन हैं और भाजपा आक्रामक। देखना रोचक होगा कि केजरीवाल विधान सभा चुनाव में लड़कर क्या गुल खिलाते हैं?

भाजपा ने आप के खिलाफ खोला मोर्चा
बीते मंगलवार को केजरीवाल ने इस आशय की घोषणा की| आनन-फानन राज्य सरकार के मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस करके दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी पर तीखा हमला बोला। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ने यहां तक कह दिया कि दो करोड़ की दिल्ली संभल नहीं पा रही है, आ रहे हैं 24 करोड़ का यूपी संभालने। एक और मंत्री मोहसिन रजा भी हमलावर दिखे| इसके बाद बीते तीन दिनों में अनेक भाजपा नेता अपने-अपने तरीके से हमला जारी रखे हुए हैं। भाजपा की ओर से दिल्ली बनाम यूपी के विकास को लेकर बहस की चुनौती दी गयी है। जवाब में आम आदमी पार्टी भी सामने खड़ी दिख रही है। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया 22 दिसंबर को लखनऊ पहुंच रहे हैं| उन्होंने ट्विटर पर लिखा है कि भाजपा सरकार बता दे कि किससे, कब और कहां बहस करनी है।

भाजपा की प्रतिक्रिया से आप को फायदा!
सभी को पता है कि दोनों ही दलों की यह जुगलबंदी सोशल मीडिया और मीडिया के माध्यम से चल रही है| संभव है कि मनीष सिसौदिया 22 दिसंबर को लखनऊ आयें तो भी कोई बहस नहीं होनी है। यह बात सिसौदिया भी जानते हैं इसीलिए उन्होंने ट्विटर पर ही अनुरोध किया है कि कृपया अपनी बात से भाजपा पलट न जाए। जो भी हो सिसौदिया 22 दिसम्बर को आते हैं तो निश्चित मीडिया का ध्यान खींचेंगे। जानकार मानते हैं कि भाजपा अगर हमलावर न होती तो संभव था कि मनीष सिसौदिया आते और लौट जाते। कोई जानता और कोई नहीं भी जान पाता। पर, अब हालात उलट हैं। सरकार को शायद अंदाजा नहीं था।

बहुत पहले से चल रही है यूपी में आप की तैयारी
यूं भी, केजरीवाल ने भले ही तीन दिन पहले 2022 का विधान सभा चुनाव लड़ने की घोषणा की हो लेकिन उनके भरोसेमंद साथी, राज्य सभा सदस्य, सुल्तानपुर निवासी संजय सिंह की बीते कुछ महीने में बढ़ी सक्रियता चुनावी तैयारियों का ही हिस्सा है। वे लगातार सरकार के साथ ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर हमलावर हैं। जातिवादी होने से लेकर ब्राह्मण विरोधी होने तक के आरोप संजय लगातार लगाते रहे हैं। यूपी में जमीन तलाशना संजय सिंह के सपने का हिस्सा है। उन्होंने अपने सपने से केजरीवाल और सिसौदिया को जोड़ लिया है। अब सब तैयार हैं। सभी को पता है कि किसी भी दल को राष्ट्रीय राजनीति में रहने के लिए यूपी में जगह बनानी होगी। पंजाब, गोवा, हरियाणा के बाद यूपी में पूरे दमखम से आने को तैयार केजरीवाल, मनीष, संजय को पता है कि यहां की जमीन इतनी आसान नहीं है। भौगोलिक तौर पर राज्य बहुत बड़ा है। यह राज्य आज भी जातियों में खंड-खंड बंटा हुआ है। यहां वोटों के ध्रुवीकरण का प्रयास हर दल करता है। कोई कामयाब होता है तो कोई नाकामयाब लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में किसी भी दल के लिए एक-एक वोट मायने रखता है।

भाजपा को यूपी में टक्कर देगा कौन?
सब लोग मानते हैं कि भाजपा यूपी में आज बहुत मजबूत स्थिति में है। कोई भी दल इस स्थिति में खुद को नहीं पा रहा है जो बंद कमरे में अकेले भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़कर जीतने का दम भरता हो। सार्वजनिक रूप से तो हर दल यही कहता है कि अगली सरकार हमारी ही बनेगी। बुधवार को जब ओमप्रकाश राजभर और ओवैसी ने मिलकर चुनाव लड़ने की घोषणा की तो जरूर राजभर ने इस सच को स्वीकार किया कि भाजपा बहुत मजबूत स्थिति में है और उससे अकेले लड़ने की स्थिति में सपा, बसपा, कांग्रेस या कोई और भी नहीं है। भाजपा को रोकने के लिए समान विचारधारा वाले सभी दलों को एकजुट होकर चुनाव लड़ना होगा। इसी इसी इरादे से उन्होंने छोटे-छोटे दलों का एक मोर्चा बनाया है। बकौल राजभर वे 2022 में हर हाल में भाजपा को रोकने को कटिबद्ध हैं।

जल्दबाजी में भाजपा ने कर दी गलती!
यह बात सही है कि भाजपा हरदम चुनावी मोड में रहती है और नेतृत्व छोटे-छोटे चुनावों को भी बड़े चुनाव की तरह पूरी गंभीरता से लेता है। भाजपा को यह भी पता है कि केजरीवाल यूपी में कुछ ख़ास नहीं कर पाएंगे, बावजूद इसके केजरीवाल की ओर फेंकी गुगली पर इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों आई? इसे समझने में फ़िलहाल राजनीतिक विश्लेषक भी फेल हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का नहीं, नेताओं की त्वरित टिप्पणियां हैं। अगर इसे सच भी मान लिया जाए तो भी यह गुगली पार्टी को सकारात्मक परिणाम नहीं देने वाली लगती। विश्लेषक इसे जल्दबाजी में लिया गया फैसला बताते हैं।
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