9 साल पहले चुनावी रण में PM नरेंद्र मोदी को टक्कर देने उतरा था मुख्तार, अचानक ही बदल दी थी पिच
सियासत से लेकर रियासत का सफर तय करने वाले मुख्तार अंसारी, नामी और रसूखदार परिवार से ताल्लुक रखते हैं। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति से मुख्तार ने शुरुआत की। जेल से बैठकर दो बार चुनाव लड़ा।

Mukhtar Ansari Update: माफिया डॉन अतीक अहमद का चैप्टर होते ही अब मुख्तार अंसारी के काले कारनामे उसी पर भारी पड़ गए हैं। शनिवार को गाजीपुर की MP/MLA कोर्ट ने मुख्तार को 10 साल और उसके भाई अफजाल अंसारी को 4 साल की सजा सुनाई है। यह फैसला कोर्ट ने साल 2007 में हुए यूपी के बहुचर्चित कृष्णानंद राय हत्याकांड और व्यापारी नंदकिशोर रूंगटा अपहरण में दर्ज मुकदमे में सुनवाई के दौरान सुनाया है।
खास बात यह है कि सियासत से लेकर रियासत का सफर तय करने वाले मुख्तार अंसारी, नामी और रसूखदार परिवार से ताल्लुक रखते हैं। आज से करीब 9 साल पहले PM नरेंद्र मोदी को उनके ही संसदीय क्षेत्र से मुख्तार ने चुनावी रण में चुनौती देते की ठानी थी। लेकिन वक़्त का पासा ऐसे पलटा की अचानक ही मुख्तार को अपना फैसला बदलना पड़ा था।
आइए जानते हैं 9 साल पुराना वो किस्सा....?
बात साल 2014 की है। जब लोकसभा चुनाव की तैयारियां जोरों पर थी। सभी राजनीतिक दल अपनी जड़ें मजबूत करने में लगे थे। कांग्रेस, बीजेपी, सपा अपनी बिसात बिछाने में लगे थे। इसी बीच भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने वाराणसी सीट पर प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी को मैदान में उतारा। उधर, कौमी एकता दल के बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी भी इसी सीट पर चुनावी टक्कर देने सामने आए। लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि अचानक ही वाराणसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का मुख्तार ने फैसला बदल लिया।
क्यों बदली थी अचानक मुख्तार ने चुनावी पिच ?
दरअसल, 11 अप्रैल 2014 को कौमी एकता दल की एक बैठक चुनाव से पहले हुई। कौमी एकता दल के अध्यक्ष व बडे भाई अफजाल अंसारी ने मुख्तार के वाराणसी से चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा की। इसके पीछे वजह थी कि मोदी के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष मतदाताओं के वोट बंटने की स्थिति न बन सके। जिसके बाद मुख्तार घोसी सीट से चुनाव लड़े। वहीं, वाराणसी से चुनावी मैदान में मोदी के खिलाफ कांग्रेस से अजय राय और आम आदमी पार्टी से अरविंद केजरीवाल रहे थे।












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