नमाज पर एफआईआर दर्ज करके रद्द क्यों कर दी यूपी पुलिस ने

प्रतीकात्मक तस्वीर

नई दिल्ली, 01 सितंबर। यूपी के मुरादाबाद जिले में छजलैट थाना क्षेत्र के दूल्हेपुर गांव में गांव के ही चंद्रपाल सिंह और कुछ अन्य लोगों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि एक घर के बाहर मुस्लिम समुदाय के लोग बिना मंजूरी के सामूहिक रूप से नमाज पढ़ रहे हैं. आरोप लगाया कि मुस्लिम समुदाय के लोग गांव में नई परंपरा डाल रहे हैं. इससे पहले यहां कभी सामूहिक तौर पर नमाज नहीं पढ़ी जाती थी. ऐसा करने से सामाजिक सौहार्द भी बिगड़ सकता है.

नमाज पर एफआईआर

गांव में नमाज अदा करने का एक पुराना वीडियो भी वायरल हो रहा था जो इसी साल तीन जून का था. कुछ लोगों ने तब भी पुलिस में शिकायत की थी और पुलिस ने ऐसा ना करने की चेतावनी दी थी. गांव के मुस्लिम समाज के लोगों का दावा है कि तीन जून के बाद कोई सामूहिक नमाज नहीं पढ़ी गई जबकि 24 अगस्त को ऐसी ही शिकायत पर एफआईआर दर्ज हो गई.

यह मामला सुर्खियों में आ गया और सोशल मीडिया पर भी इसकी चर्चा होने लगी. राजनीतिक दलों के लोगों ने भी इस एफआईआर पर आपत्ति जताई और आखिरकार पुलिस ने एफआईआर रद्द कर दिया. मुरादाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हेमंत कुटियाल ने एक बयान जारी करते हुए कहा, "जांच के बाद पाया गया कि आरोप आधारहीन हैं और इसलिए जांच को बंद किया जा रहा है."

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सवाल है कि क्या घर में या घर के परिसर के भीतर सामूहिक रूप से नमाज पढ़ना किसी तरह का अपराध है? अगर ऐसा है या फिर कानून-व्यवस्था में व्यवधान होने की आशंका में एफआईआर दर्ज की गई तो फिर वापस क्यों ली गई और फिर शिकायत करने वाले के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

गांव के चंद्रपाल सिंह और दूसरे लोगों की शिकायत पर जब पुलिस ने एफआईआर दर्ज की तो 29 अगस्त को मुरादाबाद पुलिस ने ट्वीट किया था, "ग्रामवासियों के बीच हुए आपसी समझौते के बाद भी कुछ लोगों ने समाज में शत्रुता, घृणा, वैमनस्यता की भावना पैदा करने के उद्देश्य से सामूहिक रूप से जगह बदल-बदलकर नमाज अदा की. जिस कारण दूसरे पक्ष द्वारा दी गई तहरीर और जांच के आधार पर केस दर्ज किया गया. कानूनी कार्रवाई की जा रही है."

मतलब, पुलिस ने साफ तौर पर कहा कि जांच के आधार पर केस दर्ज किया गया. हालांकि दो दिन बाद ही जब एफआईआर रद्द कर दी, तब इसकी वजह यह बताई गई, "ग्राम दूल्हेपुर में वादी चन्द्रपाल आदि ने सामूहिक नमाज पढ़ने को लेकर थाना छजलैट में मुकदमा पंजीकृत कराया था, विवेचना उपरान्त घटना का प्रमाणित होना नहीं पाया गया. अतः विवेचना को मय जुर्म खारिजा रिपोर्ट समाप्त(एक्सपंज) किया गया है."

सामूहिक नमाज पर क्या कहता है कानून

जहां तक सामूहिक नमाज पढ़ने के कथित आरोप के कानूनी पक्ष का सवाल है तो संविधान और कानून हर नागरिक को इसकी इजाजत देते हैं. कानूनी जानकारों का कहना है कि नमाज पढ़ने के मामले में या पूजा-पाठ या अन्य धार्मिक कृत्य के मामले में तो धारा 144 भी असरकारी नहीं होती, यदि वह घर के भीतर की जा रही हो. इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील कमल कृष्ण रॉय इस पूरे मामले पर हैरानी जताते हुए कहते हैं कि एफआईआर दर्ज कैसे हो गई?

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डीडब्ल्यू से बातचीत में कमल कृष्ण रॉय कहते हैं, "मुस्लिम घरों में अक्सर मजलिस होती है जिसमें सैकड़ों लोग इकट्ठा होते हैं. लाउड स्पीकर के जरिए धार्मिक चर्चा होती है. हिन्दुओं के यहां भी अक्सर अखंड रामायण का पाठ होता है. इन सबके लिए इजाजत थोड़े ही ना ली जाती है और ना ही कानूनी रूप से ऐसी कोई बाध्यता है. नमाज तो बहुत ही शांति के साथ होती है केवल अजान में आवाज आती है. यहां तक कि भीड़ को रोकने के लिए भी जो कानून हैं, मसलन- धारा 144, वो सार्वजनिक जगहों के लिए हैं. घरों के लिए नहीं. कानूनी तौर पर यह एफआईआर वैसे भी निरस्त कर दी जाती."

पुलिस की कार्रवाई पर सवाल

डीडब्ल्यू ने मुरादाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक समेत अन्य पुलिस अधिकारियों से यह जानने की कोशिश की क्या इस संबंध में गलत सूचना देने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है, लेकिन कोई जवाब नहीं मिल सका.

भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी और यूपी में कई अहम पदों पर रहे विजय शंकर सिंह कहते हैं, "यह पूरी कार्रवाई कुछ लोगों के दबाव में की गई है. दबाव की वजह से पुलिस को जहां विरोध करना चाहिए वहां नहीं कर पा रहे हैं, जहां नहीं करना चाहिए वहां कर रहे हैं. यह प्रवृत्ति नीचे के अफसरों में कम, ऊपर के लोगों में ज्यादा हो गई है. घर में धार्मिक काम करना कौन सा अपराध है, कीर्तन इत्यादि घरों में नहीं होता क्या, घर में दस-बीस लोग आ गए हैं और नमाज का वक्त हो गया है, लोग पढ़ लिए तो क्या यह अपराध है? मेरी तो समझ में नहीं आ रहा है कि किस अपराध में मुकदमा कायम किया गया, कौन सी शांति भंग की आशंका थी?"

पुलिस ने 24 अगस्त को केस दर्ज करने के बाद यहां तक कहा था कि जिनके घर के बाहर नमाज पढ़ी गई, उन लोगों की गिरफ्तारी की कोशिश जारी है. हालांकि एफआईआर दर्ज होने पर कई लोगों ने मुरादाबाद पुलिस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए. लोकसभा सांसद और एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने ट्विटर पर सवाल किया, "क्या अब नमाज पढ़ने के लिए भी हुकूमत/ पुलिस से इजाजत लेनी होगी? नरेंद्र मोदी को इसका जवाब देना चाहिए. कब तक मुल्क में मुसलमानों के साथ दूसरे दर्जे के शहरी का सुलूक किया जाएगा? समाज में कट्टरता इस हद तक फैल गई है कि अब दूसरों के घरों में नमाज पढ़ने से भी लोगों के जज्बात को ठेस पहुंच जाती है."

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"नमाज पढ़ी ही नहीं गई"

गांव के लोगों के मुताबिक, उन्होंने तीन जून को पुलिस की चेतावनी के बाद सामूहिक नमाज नहीं पढ़ी. एफआईआर में 16 लोगों के नाम दर्ज थे जबकि दस लोग अज्ञात थे. दूल्हेपुर गांव के वाहिद अली का भी नाम एफआईआर में दर्ज था.

डीडब्ल्यू से बातचीत में वाहिद अली कहते हैं, "हमारे गांव में ना तो मस्जिद है और ना ही मंदिर है. तीन जून को हम लोगों ने एक घर में नमाज अदा की थी तो गांव में हिन्दू संगठन से संबंधित कुछ लोगों ने आपत्ति जताई थी. उन्होंने पुलिस को भी बुला लिया था. पुलिस ने सामूहिक नमाज पढ़ने से मना कर दिया तो हम लोगों ने तीन जून के बाद सामूहिक नमाज पढ़ी ही नहीं. फिर भी 24 अगस्त को एफआईआर दर्ज करा दी गई."

शिकायत करने वाले चंद्रपाल का भी कहना है कि उनके गांव में मंदिर और मस्जिद दोनों नहीं हैं और गांव में रामलीला भी नहीं होती. उन्हें आपत्ति इस बात से थी कि सामूहिक नमाज पढ़ने से माहौल खराब हो सकता है. गांव में हिन्दुओं और मुसलमानों की आबादी लगभग बराबर है.

राजनीतिक दबाव में पुलिस

इस मामले में सबसे बड़ा जो सवाल उठ रहा है, वो ये कि यूपी पुलिस कई जघन्य मामलों में भी जहां एफआईआर दर्ज करने से बचती है, हीला-हवाली करती है, वो एक ऐसे मामले में बिना किसी जांच के कैसे तुरंत एफआईआर दर्ज कर लेती है, जिसके पीछे कोई मजबूत आधार ही नहीं है. कई साल से सुप्रीम कोर्ट कवर रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर मिश्र कहते हैं कि इस मामले में कानूनी पक्ष कम राजनीतिक पक्ष ज्यादा मजबूत दिख रहा है.

प्रभाकर मिश्र का कहना है, "संज्ञेय अपराध में बाध्यता होती है कि तुरंत एफआईआर दर्ज हो लेकिन गैर संज्ञेय अपराधों में प्रार्थना पत्र लेकर जांच के बाद ही एफआईआर दर्ज करती है. मुरादाबाद में विधिक आधार पर पुलिस ने कोई गलती नहीं की बल्कि अशांति की आशंका में एफआईआर दर्ज करके उसने अच्छा ही किया लेकिन उसे निरस्त करके उसने अपनी विश्वसनीयता और नीयत पर खुद ही सवाल उठवा दिए. यदि सही था तो उसे निरस्त क्यों किया और यदि निरस्त ही करना था तो एफआईआर क्यों दर्ज की."

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प्रभाकर मिश्र का यह भी कहना है, "जिसने शिकायत की, हो सकता है कि उसने दबाव बनाया हो कि वो ऊपर तक शिकायत कर देंगे और उस दबाव में ना सिर्फ स्थानीय पुलिस बल्कि जिले के अधिकारी भी दबाव में आ गए हों. क्योंकि और कोई कारण तो दिख नहीं रहा है."

पुलिस पर राजनीतिक दबाव की बात रिटायर्ड आईपीएस विजय शंकर सिंह भी कहते हैं. उनके मुताबिक, "जो मुझे जानकारी मिली है कि शायद वायरलेस पर मैसेज मिला की भीड़ इकट्ठी हो रही है. जब देखा तो 15-20 लोग नमाज पढ़ रहे थे. लेकिन कुछ लोगों ने शिकायत की तो दबाव में आकर एफआईआर कर दी गई. मुकदमा भीड़ के दबाव में लिख लिया लेकिन पुलिस वाले खुद नहीं लिखना चाह रहे थे, इसीलिए बाद में खारिज कर दिया गया. अब जिसने गलत सूचना दी उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन डर के मारे ये पुलिस वाले उनके खिलाफ कार्रवाई कर नहीं कर सकते क्योंकि उनका ताल्लुक सत्ताधारी पार्टी और उससे जुड़े संगठनों से है."

Source: DW

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