अगर एक बार मिल जाए समय में वापस लौटने का मौका! सानिया ने बताया किस मैच का नतीजा चाहेंगी बदलना

सानिया मिर्जा ने खोले करियर से जुड़े कई राज, टेनिस जिंदगी का अहम हिस्सा रहा पर जिंदगी नहीं, मन में हार का डर नहीं था पर हार ने प्रभावित किया

Sania Mirza

Sania Mirza Career: टेनिस से संन्यास लेने के बाद भी ये खेल सानिया मिर्जा के जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू रहेगा, लेकिन जैसा की कोहली भी कह चुके हैं कि जिंदगी हमेशा खेल से बड़ी होती है और परिवार तो सबसे बड़ा। इसी तर्ज पर सानिया का कहना है कि उन्होंने भी खेल को सब कुछ नहीं माना और इससे उन्हें हर बार कोर्ट पर कदम रखने पर अपने आक्रामक खेल को दिखाने की आजादी मिली। सानिया ने कहा कि उनके दिल में हार का कभी डर नहीं था क्योंकि इससे खिलाड़ी डिफेंसिव हो जाता है।

मन में हारने का डर ना होना जीत भी दिला देता है

मन में हारने का डर ना होना जीत भी दिला देता है

सानिया ने पीटीआई को दिये इंटरव्यू में कहा, ''जिस चीज ने मुझे इतना आक्रामक बनाया वह था मेरे मन में हारने का डर ना होना। मेरे लिए, टेनिस हमेशा से था और हमेशा मेरे जीवन का एक बहुत, बहुत बड़ा महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, लेकिन यह मेरा पूरा जीवन नहीं है। और इसी मानसिकता के साथ मैं हमेशा खेली। मुझे लगता है कि बहुत से लोग हार के डर से डिफेंसिव हो जाते हैं।"

लेकिन ऐसा भी नहीं कि हार ने सानिया पर फर्क नहीं डाला लेकिन वे जानती थी कि मैं अगले हफ्ते फिर से वापसी कर लूंगी। ये मानसिकता थी। वे कहती हैं, हार ने मुझे कुछ पल प्रभावित किया, लेकिन मुझे हमेशा से पता था कि यह दुनिया का अंत नहीं था। यह सिर्फ एक टेनिस हारना था।"

फोरहैंड का खेल हमेशा खतरनाक रहा-

फोरहैंड का खेल हमेशा खतरनाक रहा-

सानिया ने अपने फोरहैंड के गजब के इस्तेमाल से ऐसे कोणों से गेंद को खेला जिसने लगभग दो दशक लंबे करियर में बहुत सफलता दिलाई जिसमें उन्होंने तीन महिला डबल्स ग्रैंड स्लैम ट्राफियां और इतने ही मिक्सड डबलस् खिताब जीते।

सानिया कहती हैं फोरहैंड की ताकत उनको गिफ्ट में भी मिली और उस पर काम भी बहुत किया। सानिया कहती हैं, "मुझे लगता है कि यह दोनों का मिक्स था। शॉट को भ्रामक बनाने में बहुत काम किया गया था, जहां लोग इसे पढ़ नहीं पाते थे। कोर्ट में अलग-अलग कोणों पर लगातार गेंद को हिट करने के लिए रिपीटिशन किए गए। मेरे लिए रिपीटिशन ही सबसे अहम साबित हुए। यही प्रैक्टिस थी।

सिंगल्स को छोड़कर आसान रास्ता चुना?

सिंगल्स को छोड़कर आसान रास्ता चुना?

सानिया ने वेस्टर्न ग्रिप के साथ शुरुआत की, लेकिन कोचों की सलाह पर उन्होंने इसे सेमी-वेस्टर्न ग्रिप में बदल दिया। कहीं इस ग्रिप के चलते बाद में उनको कलाई की दर्दनाक चोट तो नहीं लगी जिसने उन्हें सिंगल से हटने पर मजबूर कर दिया। इस पर मिर्जा कहती हैं, "मैं वास्तव में नहीं जानती। मेरा जोड़ बहुत मूवमेंट रखता है तो ऐसा उस कारण भी हो सकता है। इसका कारण मैं नहीं जानती।

चोट के बाद सानिया ने वापसी तो की लेकिन सिंगल्स खेलना बंद कर दिया। या डबल्स खेले या मिक्सड डबल्स। ऐसे में राय ये भी है कि उन्होंने सिंगल्स को छोड़कर आसान रास्ता चुना। वे इस पर कहती हैं, "मैं इस पर प्रतिक्रिया नहीं करती, मुझे वास्तव में परवाह नहीं है कि लोग क्या कहते हैं।"

कोई फर्क नहीं पड़ता लोग क्या कहते हैं

कोई फर्क नहीं पड़ता लोग क्या कहते हैं

सानिया ने कहा कि डबल्स में उनके प्रदर्शन की वजह से उनकी सिंगल्स सफलता फीकी पड़ जाती है। डबल्स ना होते तो वे इतना नाम कहां कमा पाती। उन्होंने कहा, मैं डबल्स के लिए बहुत आभारी हूं। मेरा सिंगल करियर बहुत अच्छा रहा जहां मैं टॉप-30 में थी। फिर मैं डबल्स में चली गई क्योंकि तीन सर्जरी के बाद मेरा शरीर सिंगल्स झेलने में सक्षम नहीं था और यह एक सही निर्णय था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग क्या कहते हैं। सफलता डबल्स में ज्यादा दिखती है क्योंकि मैं डबल्स में नंबर एक थी।"

सबसे ज्यादा मजबूत और कमजोरी कब महसूस किया?

सबसे ज्यादा मजबूत और कमजोरी कब महसूस किया?

सानिया को सबसे ज्यादा ताकत और कमजोरी कब महसूस हुई? "मैंने सबसे कमजोर तब महसूस किया जब 2008 के ओलंपिक के दौरान मेरी कलाई में वास्तव में गंभीर चोट लगी थी। मैं बहुत सारी मानसिक समस्याओं से गुजरी था। मैं डिप्रेशन में थी। यह नहीं पता था कि क्या मैं फिर से खेल पाऊंगी। मेरा मन बहुत कमजोर महसूस कर रहा था।"

"और जहां मैंने सबसे मजबूत महसूस किया वो 2014 के अंत से 2016 के मध्य तक का समय था। मेरे खेल जीवन के लगभग दो साल अविश्वसनीय थे।"

अगर समय में वापस लौटकर दोबारा खेलने को मिल जाए

अगर समय में वापस लौटकर दोबारा खेलने को मिल जाए

सानिया के पास राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों जैसे मल्टी इवेंट में पदक हैं, लेकिन एक ओलंपिक पदक नहीं मिला। वह 2016 में सबसे करीब आईं, जब उन्होंने और रोहन बोपन्ना ने कांस्य प्ले-ऑफ में प्रतिस्पर्धा की, लेकिन राडेक स्टेपनेक और लूसी ह्रदसेका की चेक जोड़ी से हार गईं।

अंत में सानिया का कहना है, "मैंने जो कुछ भी हासिल किया है, उससे मैं बहुत संतुष्ट हूं। चार ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करना अद्भुत रहा है। लेकिन अगर मुझे समय में वापस लौटकर दोबारा खेलने को मिल जाए तो कांस्य पदक का वो मैच होगा या फिर उससे पहले का मुकाबला जब हम सेमीफाइनल में थे।

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