जिन्हें ब्रॉन्ज की भी नहीं थी आस उन्हें कैसे मिल गया गोल्ड? नदीम ने विपरीत परिस्थितियों में ऐसे पाई विजय

Arshad Nadeem: अरशद नदीम की कहानी संघर्षों से भरी रही है और पाकिस्तान जैसे देश में ये संघर्ष और भी ज्यादा बढ़ जाते हैं। अलग-अलग तरह की बाधाओं के बाद भी नदीम ने 32 साल बाद पाकिस्तान को पहला ओलंपिक मेडल दिलाया है और वो भी गोल्ड के रूप में। जैवलिन थ्रो फाइनल में उनके 92.7 मीटर थ्रो के पीछे की कहानी बहुत कुछ बयां करती है।

दान के पैसे से होती थी ट्रेनिंग
दरअसल, जब नदीम ने अपना भाला फेंक करियर शुरू किया, तो कथित तौर पर उनके पास सीमित वित्तीय संसाधन थे, और उस समय के हालात देखने के बाद उनसे ब्रॉन्ज की भी उम्मीद करना मुश्किल था। नदीम के पिता मुहम्मद अशरफ ने बताया कि, 'लोगों को पता ही नहीं है कि अरशद आज इस मुकाम पर कैसे पहुंचा। कैसे उसके साथी ग्रामीण और रिश्तेदार पैसे दान करते थे ताकि वह शुरुआती दिनों में ट्रेनिंग और इवेंट के लिए दूसरे शहरों में जा सके।'

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इवेंट में जाने के भी नहीं होते थे पैसे
नदीम के पिता मुहम्मद अशरफ ने बताया कि लोगों ने नदीम की ट्रेनिंग के लिए पैसे इकट्ठे किए। समुदाय का यह सहयोग नदीम के लिए बहुत महत्वपूर्ण था, क्योंकि शुरुआती दिनों में उसके पास यात्रा और दूसरे शहरों में प्रशिक्षण के लिए ज़रूरी पैसे नहीं थे।

हालात ऐसे की ब्रॉन्ज की भी नहीं थी आस
पाकिस्तान के पंजाब के खानेवाल गांव में पले-बढ़े नदीम के परिवार को एक समय पर भारी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। उनके पिता मजदूरी करते थे, जो अपने सात बच्चों के बड़े परिवार का भरण-पोषण करने के लिए संघर्ष करते थे। उनके बड़े भाई शाहिद अज़ीम के अनुसार, वे साल में केवल एक बार ईद-उल-अज़हा के दौरान ही मीट खरीद पाते थे।

नदीम ने क्रिकेट से एथलीट पर पहुंचा दिया देश का ध्यान
कोहनी, घुटने और पीठ की समस्याओं सहित कई चुनौतियों का सामना करने के बावजूद नदीम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा, और करियर में आगे बढ़ते गए। एक समय ऐसा आया, जब वह पाकिस्तान में क्रिकेट से एथलेटिक्स पर लोगों का ध्यान केंद्रित करने में सफल हो गए।

विपरीत परिस्थितियों पर विजय पाने का प्रमाण
नदीम की यात्रा विपरीत परिस्थितियों पर विजय पाने का प्रमाण है। अन्य देशों में एथलीटों को मिलने वाली बड़ी-बड़ी सुविधाओं और गैजेट्स की कमी के बावजूद, उन्होंने अपने करियर में महत्वपूर्ण प्रगति की है। इस साल की शुरुआत में, जब नदीम ने प्रशिक्षण के लिए एक नए भाले की अपील की, तो नीरज चोपड़ा ने सोशल मीडिया पर उनका सपोर्ट किया, जिसमें दोनों एथलीटों के बीच खेल भावना को उजागर किया गया।

नदीम ने पाकिस्तान को दिलाया तीसरा ओलंपिक मेडल
नदीम ने 27 वर्ष की आयु में गुरुवार को पाकिस्तान के लिए पहला स्वर्ण पदक हासिल किया। यह उपलब्धि देश का तीसरा ओलंपिक पदक है, इससे पहले उसने रोम 1960 में कुश्ती में और सियोल 1988 में मुक्केबाजी में पदक जीता था।

नदीम ने लगातार किया अच्छा प्रदर्शन
नदीम लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछले साल उन्होंने विश्व चैंपियनशिप में रजत पदक और कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में 90.18 मीटर थ्रो करके स्वर्ण पदक जीता था। कोहनी, घुटने और पीठ की समस्याओं से जूझने के बावजूद उन्होंने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है।

सात एथलीट में सिर्फ नदीम को मिली सफलता
पाकिस्तान ने पेरिस ओलंपिक में सात एथलीट भेजे थे, लेकिन केवल नदीम ही अपने इवेंट में फाइनल के लिए क्वालिफाई कर पाए। फाइनल के लिए उनके क्वालिफाई करने पर उनके गांव में जश्न मनाया गया, जहां उनके परिवार और साथी ग्रामीणों ने गर्व और खुशी व्यक्त की।

अरशद नदीम की कहानी सिर्फ़ पदक जीतने की नहीं है; यह दृढ़ता और सामुदायिक समर्थन की कहानी है। उनकी सफलता ने पाकिस्तान में एथलेटिक्स की ओर ध्यान आकर्षित किया है, जो कि मुख्य रूप से क्रिकेट पर केंद्रित देश है।किस हालात और विपरीत परिस्थिति में नदीम ने यह मुक़ाम हासिल किया।

इस वीडियो में नदीम ने संघर्ष के दिनों को दिखाया गया है-

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