केएल राहुल केवल मुखौटा, किसके इशारे पर हटाये गये कुलदीप ? भारतीय क्रिकेट का भट्ठा बैठा कर मानेंगे ‘मठाधीश’ !
सवाल ये है कि हमेशा कुदीप यादव के साथ ही ऐसा क्यों होता है ? उनके खेलने, नहीं खेलने को लेकर आखिर जंग क्यों छिड़ जाती है ? 2017 में कुलदीप को खिलाने को लेकर कोहली और कुंबले में छिड़ गई थी।

कुलदीप यादव विवाद के बाद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की ईमानदारी पर सवाल उठने लगे हैं। बीसीसीआइ की हालत आखिर डांवाडोल क्यों है ? राजनीतिक कारणों से सौरव गांगुली को अध्यक्ष पद से तो रुखसत कर दिया गया लेकिन क्या रोजर बिन्नी उनसे बेहतर काम कर रहे हैं ? हैरानी की बात ये है कि जो क्रिकेट प्रबंधक क्रांतिकारी नतीजों की बात कर रहे थे आज वे कामचलाऊ व्यवस्था में काम कर रहे हैं। बल्कि कहें तो टीम का भट्ठा बैठा रहे हैं। जिस गेंदबाज (कुलदीप यादव) ने बांग्लादेश में भारत को बॉलिंग और बैटिंग से मैच जिताया उसे अगले टेस्ट से बाहर कर दिया। ऐसा क्यों ? बीसीसीआइ एक स्वायत्त संस्था है लेकिन वह भारत की जनता के प्रति उत्तरदायी है। उसे इस सवाल का जवाब देना होगा। टीम के कोच और कप्तान ये नहीं कह सकते कि कुलदीप टीम की रणनीति के हिसाब से फिट नहीं बैठ रहे थे। उन्हें इसका कारण बताना होगा। 2018 में केन्द्रीय सूचना आयोग ने बीसीसीआइ को RTI के दायरे में ला दिया था।
BCCI कितना पारदर्शी ?
जब केन्द्रीय सूचना आयोग ने बीसीसीआइ पर आरटीइ का शिकंजा कसा था तब बोर्ड से जुड़े कुछ शक्तिशाली लोग तिलमिला गये थे। उन्होंने इसका विरोध किया था। जाहिर है वे अपनी मनमानी के लिए पुरानी व्यवस्था बनाये रखना चाहते थे। 'रणनीति’ के नाम पर वे पक्षपात की गुंजाइश बनाये रखना चाहते थे। लेकिन अब रोजर बिन्नी को बताना होगा कि कुलदीप यादव को बांग्लादेश के खिलाफ दूसरे टेस्ट से बाहर क्यों किया गया ? आखिर अभी टीम कौन चुन रहा है ? कप्तान केएल राहुल, कोच राहुल द्रविड़ या फिर बीसीसीआइ के आका ? टीम इंडिया टी-20 वर्ल्ड कप हार गयी इसलिए चेतन शर्मा वाली चयन समिति को बर्खास्त कर दिया गया। लेकिन आज तक नयी चयन समिति का चयन नहीं हो सका। कहा जा रहा है कि नये चयनकर्ताओं के लिए 27 दिसम्बर से इंटरव्यू होना है। अब सवाल ये है कि जब सेलेक्शन कमेटी अस्तित्व में नहीं है तो टीम का चुनाव कौन कर रहा है ? क्या पर्दे की ओट से कुछ पुराने मठाधीश खेल कर रहे हैं ?
चेतन शर्मा को हटाया तो फिर काम पर क्यों लगाया ?
हास्यास्पद बात ये है कि जिस चेतन शर्मा वाली समिति को बर्खास्त किया गया अब उसी से काम भी लिया जा रहा है। चेतन शर्मा, उनके सहयोगी सुनील जोशी और हरविंदर सिंह ने रणजी मैच देख कर अपनी रिव्यू रिपोर्ट बोर्ड को सौंपी। जब उनसे काम लेना ही था तब बड़बड़ी में हटाया क्यों ? जब हटा दिया तो नये लोगों को जिम्मेदारी सौंपी क्यों नहीं? यानी बोर्ड के पास कोई ठोस नीति नहीं थी। बोर्ड की इस राजनीति के कारण भारतीय क्रिकेट का बहुत नुकसान हो चुका है। अगर जयदेव उन्नादकट को टीम में लेना जरूरी था तो क्या इसके लिए कुलदीप को हटना जरूरी था ? कोई दूसरा विक्लप क्यों नहीं सोचा गया ? उस खिलाड़ी को बाहर का रास्ता दिखाया गया जो पहले टेस्ट का मैन ऑफ द मैच था।
कुलदीप के डेब्यू पर ही ठन गयी थी कोहली और कुंबले में
सवाल ये है कि हमेशा कुदीप यादव के साथ ही ऐसा क्यों होता है ? उनके खेलने, नहीं खेलने को लेकर आखिर जंग क्यों छिड़ जाती है ? 2017 में विराट कोहली टीम के कप्तान थे और अनिल कुम्बेल हेड कोच। धर्मशाला में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच तीसरा टेस्ट खेला जाना था। अनिल कुम्बले चाहते थे कि कुलदीप यादव को प्लेइंग इलेवन में शामिल किया जाए। लेकिन विराट कोहली ने इससे इंकार कर दिया था। वे अमित मिश्रा को लेने के पक्ष में थे। संयोग से विरोट कोहली चोट के कारण इस टेस्ट से बार हो गये। अंजिक्य रहाणे कार्यवाहक कप्तान बने। जब रहाणे कप्तान बने तो कुंबले ने कुलदीप को अंतिम एकादश में शामिल कर लिया। विराट कोहली, कुंबले के इस फैसले से बहुत नाराज हुए थे। कोहली तब शक्तिशाली खिलाड़ी थे और कोई उनके फैसले को चुनौती नहीं देता था। लेकिन अनिल कुंबले खुद भारत के सबसे सफल और दुनिया के चौथे सर्वाधिक विकेट लेने वाले खिलाड़ी हैं। वे भला कोहली का रौब क्यों मानते ? उन्होंने पिच के हिसाब से कुलदीप को मौका देना जरूरी समझा। कोहली की कुंबले से लड़ाई, यहीं से शुरू हुई थी।
पहले टेस्ट की पहली पारी में 4 विकेट
कुलदीप ने अनिल कुंबले के चयन के सही साबित कर किया। ये उनका डेब्यू टेस्ट था। इसके बावजूद इस चाइनामैन गेंदबाज ने कलाई की जादूगरी का शानदार नमूना पेश किया। कुलदीप ने वार्नर, हैंड्सकॉम्ब, मैक्सवेल और कमिंस के विकेट लिये थे। पहले मैच की पहली पारी में उन्होंने 23 ओवर गेंदबाजी की थी जिसमें 3 मेडन रखते हुए 68 रन दे कर 4 विकेट लिये थे। दूसरी पारी में कुलदीप को केवल 5 ओवर ही मिले जिसमें उन्हें कोई विकेट नहीं मिला। एक तरह से कहा जाए तो कुलदीप का टेस्ट डेब्यू ही विवादों के साये में हुआ था। उनके खेलने नहीं खेलने के मुद्दे पर कोहली और कुंबले में ठन गयी थी। इस मनमुटाव के कारण भारत को बहुत बड़ा नुकासन उठाना पड़ा था। 2017 में भारत चैम्पियंस ट्रापी के फाइनल में पहुंचा था। मतभेदों की वजह से टीम इंडिया का मनोबल मजबूत नहीं था। फाइनल में पाकिस्तान ने उसे बुरी तरह हरा दिया।
कुलदीप 5 साल में सिर्फ 8 टेस्ट, कितने कांटे बोओगे ?
कुलदीप यादव ने 2017 में टेस्ट डेब्यू किया था। तब से वे टीम में अंदर-बाहर होते रहे हैं। पांच साल में उन्होंने केवल 8 टेस्ट मैच खेलने का मौका मिला। उन्होंने बांग्लादेश के चटगांव टेस्ट में तीसरी बार पांच विकेट लिये थे। लंबे समय के बाद मिले इसे मौके को उन्होंने बखूबी भुनाया था। इस प्रदर्शन ने उनके हौसले को आसमान पहुंचा दिया था। वे नये जोश के साथ आगे बढ़ना चाहते थे। लेकिन क्रिकेट प्रबंधन से जुड़े कुछ लोगों ने कुलदीप के हौसले को आसमान से जमीन पर गिरा दिया। केएल राहुल कार्यवाहक कप्तान हैं। खुद उनका ही फॉर्म लड़खड़ाया हुआ है। वे इतना बड़ा फैसला नहीं ले सकते। उन्हें मुखौटा बना कर कुछ 'महारथियों’ ने मनमर्जी चलायी है। इनकी पहचान होनी चाहिए क्यों कि ऐसे लोग ही भारतीय क्रिकेट को रसातल में ले जा रहे हैं।
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