Shahdol के जिस पकरिया गांव में आ रहे PM MODI, कैसा है उसका इतिहास, जानिए?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शहडोल जिले के दौरे पर आ हैं, जहां वे विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होंगे। प्रधानमंत्री राष्ट्रीय स्तर पर सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन की लाँचिंग और पीवीसी आयुष्मान कार्डों के वितरण का शुभारंभ करेंगे। साथ ही स्व-सहायता समूह की लखपति दीदियों, ग्राम फुटबाल क्लब के खिलाड़ियों एवं जनजातीय मुखियाओं से भी चर्चा करेंगे।
शहडोल जिले जनजाति बाहुल्य ग्राम पकरिया में विशेष चहल-पहल देखने को मिल रही है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 27 जून को पकरिया ग्राम में आगमन हो रहा है। पकरिया ग्राम के सरोज बाई का कहना है कि प्रधानमंत्री का हमारे गांव पकरिया में आना ग्रामवासियों के लिए सौभाग्य की बात है। हमारे गांव के लिए 27 जून का दिन ऐतिहासिक दिन होगा। हम सब ग्राम वासी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के स्वागत के लिए आतुर हैं।

कुछ ऐसा है पकरिया गांव
पकरिया गांव में लगभग 4700 लोग निवास करते हैं। जिसमें से लगभग 2200 लोग मतदान करते हैं। गांव में लगभग 700 घर जनजातीय समाज के हैं। जिनमें गोड़ समाज के 250, बैगा समाज के 255, कोल समाज के 200, पनिका समाज के 10 तथा अन्य समाज के लोग निवास करते हैं। पकरिया गांव में 3 टोला है, जिसमें जल्दी टोला, समदा टोला एवं सरकारी टोला है। गांव में गोण्ड जनजाति समूह में करमा, सैला, भड़ौनी, बिरहा, कहरवा, ददरिया, सुआ आदि नृत्य-शैलियाँ प्रचलित हैं। गोण्ड समुदाय के 'सजनी' गीत-नृत्य की भाव-मुद्राएँ चमत्कृत करती हैं। इनका दीवाली नृत्य भी अनूठा होता है।
ये व्यंजन है बेहद प्रसिद्ध
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पकरिया गांव आकर शहडोल जिले के स्थानीय जनजातीय, संस्कृति एवं परंपराओं से अवगत होंगे। यह दिन शहडोल के लिए बहुत ही ऐतिहासिक दिन होगा। ऐसा पहली बार होगा जब प्रधानमंत्री देसी अंदाज में जनजातीय समुदाय के साथ जमीन पर बैठकर कोदो भात- कुटकी खीर ग्रहण करेंगे। पकरिया गांव के जनजातियों का विशेष भोजन कोदो, कुटकी, ज्वार, बाजरा, साँवा, क्का, चना, पिसी, चावल आदि अनाज जनजाति समुदायों के भोजन में शामिल हैं। महुए का उपयोग खाद्य और मदिरा के लिये किया जाता है।आजीविका के लिये प्रमुख वनोपज के रूप में भी इसका संग्रहण सभी जनजातियाँ करती हैं। बैगा,भारिया और सहरिया जनजातियों के लोगों को वनौषधियों का परंपरागत रूप से विशेष ज्ञान है। बैगा कुछ वर्ष पूर्व तक बेवर खेती करते रहे हैं।
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