इतिहास रचने की उम्मीद कर रहे हैं मोदी के दोस्त मॉरिसन

ऑस्ट्रेलिया चुनाव के दो नेता, एंथनी अल्बानीजी ऐंड स्कॉट मॉरिसन

कैनबरा, 20 मई। शनिवार को ऑस्ट्रेलिया के लोग अपनी नई केंद्र सरकार चुनने के लिए मतदान करेंगे. पिछले एक हफ्ते से मतदान शुरू हो चुका है क्योंकि ऑस्ट्रेलिया में वोटिंग के लिए तय समय से पहले भी मतदान किया जा सकता है, लिहाजा काफी लोग पोलिंग बूथ पर जाकर मतदान कर भी चुके हैं. फिर भी, यदि किसी से पूछा जाए कि किसकी हवा है तो कोई साफ जवाब देने की स्थिति में नहीं होगा.

सिडनी में रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर एंथनी कहते हैं कि ऐसा उन्होंने पहले कभी नहीं देखा. वह कहते हैं, "कल वोटिंग है और आज तक हमें साफ पता नहीं है कि कौन जीत रहा है. ऐसा पहले नहीं देखा."

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लेखिका मिशेल ग्राटन ने भी एक इंटरव्यू में ऐसी ही बात कही. स्थानीय चैनल एबीसी से बातचीत में मिशेल ग्राटन कहती हैं, "महामारी और दिग्भ्रमित राजनेताओं से तो पूरी तरह थक चुके हैं. और हममें से बहुत से लोग नहीं जानते कि किसे वोट करना है."

बेहद नजदीकी चुनाव

ऑस्ट्रेलिया के इन संघीय चुनावों को हाल के दशकों का सबसे नजदीकी चुनाव माना जा रहा है. और ऐसा तब है जबकि मौजूदा लिबरल-नेशनल गठबंधन तीन बार से सत्ता में है. लिबरल पार्टी के नेता और देश के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन यदि चुनाव जीतते हैं तो यह जीत ऐतिहासिक होगी क्योंकि अब तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी पार्टी की सरकार चार बार लगातार बनी हो.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी दोस्त स्कॉट मॉरिसन ने इतिहास को रच देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. पिछले एक महीने से लगातार प्रचार अभियान में लगे मॉरिसन ने सर्वेक्षणों में लगातार अपनी स्थिति को मजबूत किया है. जब चुनाव का ऐलान हुआ था, तब विपक्ष के नेता और लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार एंथनी अल्बानीजी स्पष्ट बढ़त के साथ मॉरिसन से आगे थे. लेकिन अब दोनों के बीच फासला बहुत कम हो चुका है.

गुरुवार को ऑस्ट्रेलियन फाइनैंशल रिव्यू और इप्सोस के पोल के सर्वे में 36 फीसदी लोग लेबर पार्टी का समर्थन कर रहे थे जबकि 35 प्रतिशत लोगों ने लिबरल-नेशनल गठबंधन का समर्थन किया. पिछले दो हफ्ते में ही यह अंतर पांच अंकों तक घट गया है. ऐसी स्थिति में दोनों ही पक्ष उन लोगों के भरोसे हैं जिन्होंने अब तक भी यह मन नहीं बनाया है कि किसे वोट दिया जाए. इसी वजह से प्रधानमंत्री मॉरिसन ने एक बयान में कहा था कि ज्यादातर मतदाता ऐसे ही हैं और "जब आखिरी धक्का लगेगा" तो चुनाव उनके पक्ष में आ जाएगा.

विपक्ष भी आश्वस्त नहीं

एंथनी अल्बानीजी भी इस बात से सहमत हैं कि चुनाव बहुत नजदीकी हो गया है और वह ऐसा मानकर नहीं चल रहे हैं कि उनकी जीत सुनिश्चित है. मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, "यह पहाड़ चढ़ना है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद सिर्फ तीन बार ऐसा हुआ है कि लेबर ने विपक्ष से चुनाव जीता हो. इसलिए मैं जानता हूं कि सर्वेक्षण में उतार-चढ़ाव हो रहा है."

ऑस्ट्रेलियन फाइनैंशल रिव्यू अखबार के मुताबिक लेबर पार्टी के अंदरूनी सर्वेक्षण के मुताबिक वह 52-48 के अनुपात से आगे चल रहे हैं, जबकि सत्तारूढ़ गठबंधन 49-51 के अनुपात से खुद को पीछे मान रहा है. लिबरल पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन की छवि है, जो पिछले कुछ समय में खराब हुई है. यदि सिर्फ प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की बात करें तो इप्सोस के सर्वे में स्कॉट मॉरिसन के साथ 39 प्रतिशत लोग हैं जबकि विपक्षी अल्बानीजी के साथ 42 प्रतिशत लोगों समर्थन है.

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एंथनी अल्बानीजी की इस छवि को और मजबूती मिली जब पार्टी में उनकी प्रतिद्वन्द्वी और विरोधी मानी जाती रहीं पूर्व प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने उनके समर्थन का ऐलान किया. गिलार्ड ने कहा कि अल्बानीजी 40 साल से भी ज्यादा समय से उनके दोस्त हैं और प्रधानमंत्री बनने को तैयार हैं.

गिलार्ड ने कहा, "40 साल से ज्यादा लंबी दोस्ती ने मुझे जो अधिकार दिया है, उस अधिकार से मैं कह सकती हूं कि एल्बो प्रधानमंत्री बनने को तैयार हैं. वह एक शानदार प्रधानमंत्री होंगे."

मुद्दा-विहीन चुनाव

बहुत से जानकार यह मानते हैं कि 2022 का ऑस्ट्रेलिया का चुनाव एक मुद्दा विहीन चुनाव है क्योंकि दोनों ही मुख्य दलों के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. ग्रीन पार्टी के सीनेट सीट के उम्मीदवार डेविड शूब्रिज कहते हैं कि दोनों दल एक जैसे हैं और निर्दलीय व ग्रीन पार्टी ही मुद्दों में फर्क तय करेंगे.

एक कार्यक्रम में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए शूब्रिज ने कहा, "लेबर और गठबंधन दोनों ने पिछले तीन साल में 35 लाख डॉलर की डोनेशन बड़े कॉरपोरेट घरानों से ली है, जो जीवाश्म ईंधन में व्यापार करते हैं. और यही वजह है कि वे कोयले के खिलाफ नहीं बोलते हैं, जलवायु परिवर्तन की नीति पर नहीं बोलते हैं. हम बोलते हैं."

लेखक इयान वेरेंडर भी कहते हैं कि दोनों मुख्य दलों के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. इसी हफ्ते की शुरुआत में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "चुनाव को एक हफ्ते से भी कम समय बचा है और दोनों मुख्य पार्टियां एक ऐसी लड़ाई लड़ रही हैं जिनमें दांव पर कुछ भी नहीं है."

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अपने भाषणों और बहसों में दोनों नेताओं और पार्टियों ने अर्थव्यवस्था पर खासा जोर दिया है लेकिन वे एक-दूसरे से बहुत ज्यादा अलग कुछ पेश नहीं कर पाए हैं. दोनों ही नेता बेहतर अर्थव्यवस्था, छोटे व्यापारियों के लिए ज्यादा सुविधाएं, ज्यादा रोजगार आदि कि बातें करते रहे हैं जो कमोबेश एक जैसी हैं. यहां तक कि दोनों ने जो वादे किए हैं वे भी एक जैसे ही हैं. मसलन, भारतीय समुदाय के लिए लिबरल पार्टी ने धार्मिक संस्थाओं को पांच लाख डॉलर देने का वादा किया तो लेबर पार्टी ने भी वही वादा कर दिया. लेबर पार्टी ने लिटल इंडिया नाम से सिडनी में एक भारतीय व्यापारिक क्षेत्र बनाने का वादा किया तो लिबरल पार्टी ने भी उसे दोहरा दिया.

ऐसे में लोगों के सामने चुनाव बहुत मुश्किल हो गया है और बड़ी संख्या में मतदाताओं ने फैसला आखिरी पलों के लिए छोड़ रखा है. लेबर पार्टी को एक ही बात का भरोसा है, जो लिबरल पार्टी का डर है. सिडनी के सॉफ्टवेयर इंजीनियर एंथनी टिंक कहते हैं, "अगर हम वही प्रधानमंत्री दोबारा चुनते हैं तो बहुत बहुत अन-ऑस्ट्रेलियन होगा. अब तक हमने ऐसा किया तो नहीं है."

Source: DW

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