बिरयानी नहीं पकाने पर चाकू मारने के लिये कौन जिम्मेदार

खाना पकाने के काम से महिलाओं को नहीं मिली आजादी

नई दिल्ली, 16 सितंबर। महिला पत्रिकाओं में पहले व्यंजनों वाला विशेष पन्ना दिखता था, शायद अब भी होता हो. शीर्षक कुछ इस तरह होते थे, 'करवाचौथ पर पति के लिए बनाएं मखाना कटलेट, चाटते रह जाएंगे उंगलियां.' तेजी से बदलती दुनिया में यह सोच अब भी नहीं बदली कि अच्छा खाना पकाना, टेबल सजाना पुरुषों को रिझाने, उनसे तारीफ पाने का आसान रास्ता है और 'कर्तव्य' भी. औरतें चांद भले छू लें लेकिन ये एक्स्ट्रा स्किल जरूर होनी चाहिए.

6 सितंबर को खबर आई कि महाराष्ट्र के लातूर जिले में बिरयानी नहीं बनाने पर एक व्यक्ति ने नशे की हालत में कथित तौर पर पत्नी को चाकू मार दिया. हमले में महिला गंभीर रूप से घायल हो गयी.

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पति मालिक है, बराबर का जीवनसाथी नहीं?

21वीं सदी में ये घटना चौंकाती हैं. हालांकि इससे पहले भी ऐसी घटनाएं रिपोर्ट की गई हैं जब महज खाना नहीं बनाने पर महिला पर जानलेवा हमला किया गया. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे- 2021 (एनएफएचएस) के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि कम से कम 40% महिलाओं ने कुछ परिस्थितियों में औरतों पर पति के हिंसा को उचित ठहराया है. इन परिस्थितियों में महिलाओं ने 7 वजहें गिनाईं, जिसमें एक था अच्छा खाना ना बनाना.

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ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेन एसोसिएशन की महासचिव मीना तिवारी कहती हैं, ''महिलाओं पर घरेलू हिंसा इस सदी में भी एक क्रूर सच्चाई बनी हुई है. हमारे समाज में महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वो पति को मालिक समझे, बराबर का जीवनसाथी नहीं. इसलिए पति को खुश रखना, उसका ख्याल रखना खासकर उसकी पसंद का खाना बनाना उसका कर्तव्य बताया जाता है. अगर वह 'कर्तव्य' पूरा नहीं करती तो पति उस पर रहम करे, पीटे या तलाक दे दे, ये पति का अधिकार समझा जाता है. पुरुषों के दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है..ये कथन और चलन गुलाम मानसिकता है.''

खाना बनाना और बच्चे पालना आज भी औरतों की ही जिम्मेदारी समझी जाती है

पुरुषों के दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है.. इस कहावत का ऑरिजिन अमेरिकी लोकतंत्र के शुरुआती दिनों में मिलता है. अमेरिकी नेता जॉन एडम्स ने एक खत में यह बात लिखी थी. हालांकि, बाद में अलग-अलग भाषा के लेखकों ने इसी तरह के कहावतों का इस्तेमाल अलग-अलग तरीके से किया. उदाहरण के तौर पर, मिस मुलॉक "जॉन हैलिफैक्स, जेंटलमैन" में लिखती हैं, "एक अंग्रेज के दिल का रास्ता पेट से होकर जाता था.." यह बात इतनी हल्की नहीं रह जाती जब महाराष्ट्र जैसी घटनाएं सामने आयें.

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महिलाओं के घर के काम की गिनती नहीं

ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेन एसोसिएशन की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जगमति सांगवान कहती हैं, ''महिला-पुरुष के काम और भूमिका को लेकर पितृसत्तात्मक ताकतों की पैठ गहरी और पिछड़ी है. उसके मुताबिक खाना पकाना ही महिला का मुख्य कर्तव्य है. इसके मूल में यह भावना है कि आदमी कर्ता है और महिला उसकी सेवा-पानी के लिए है. उनके घरेलू काम को प्रोडक्टिव एक्टिविटी नहीं माना जाता.''

महाराष्ट्र की घटना पर उनका कहना है, "समाज में इन बर्बर अपराधों के लिए स्वीकार्यता है. यहां तक कि पुलिस थानों में भी घरेलू हिंसा को घर का मामला कहकर निपटाने की बात कह दी जाती है. हिंसा को परंपरा के आवरण में ढंकने की कोशिश की जाती है. बड़ी वजह ये है कि नीति निर्माताओं ने भी कभी महिला समानता को गंभीर मुद्दे के तौर पर नहीं लिया. महिलाओं को संपत्ति का अधिकार नहीं मिला है, ना ही फैसलों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की गई. जरूरत है कि महिलाओं के दावे को एक व्यक्ति के तौर पर समाज के अंदर, देश के अंदर, हर स्तर पर पुख्ता तरीके से पेश और असर्ट किया जाए ताकि पितृसत्ता को हर स्तर पर पीछे धकेला जाए.''

खाना बनाने वाले ज्यादातर पुरुष या तो पेशेवर हैं या फिर यह काम शौकिया या मजबूरी में करते हैं

महिलाओं और रसोई का रिश्ता नहीं बदला?

उत्तरी कैरोलाइना के हिस्ट्री म्यूजियम में व्यवस्थित की गई 18वीं सदी की रसोईघर पर एक लेख 'वेन डिनर वाजंट क्विक एंड ईजी' में बताया गया है कि कैसे सदियों पहले महिलाओं की जीवनशैली किचन, मसालों, बागों में उगाती सब्जियों के इर्द-गिर्द घूमती थी.

लेख में बताया गया है कि खाना बनाने के लिए औरतों को क्या-क्या करना होता था. महिलाएं उठने के साथ चूल्हे में आग जलातीं. खाने की कच्ची चीजों को सूखाकर या नमक रगड़कर संरक्षित किया जाता. यहां तक कि खाने को अलग-अलग स्वाद देने के लिए अलग-अलग तरह की लकड़ियों को चूल्हे में झोंका जाता. सदियां बीत गईं लेकिन आज भी रसोई को लेकर उनकी भूमिका नहीं बदली है.

खाना पका कर ही मिलता है सम्मान

मॉडर्न होते परिवेश ने स्त्री को घर से बाहर निकाला, पुरुषों के साथ आर्थिक जिम्मेदारी बांटने की आजादी दी लेकिन समाज की नजरों में कुशल महिला अब भी वही है जो खाना बना सके और अच्छा खाना बना सके. बदलते वक्त के साथ घर-बाहर की जिम्मेदारी बराबरी के साथ निभाने वाले जोड़ों में भी महिलाओं पर ये बात नैतिक जिम्मेदारी की तरह चिपकी रह गई.

ऐसा नहीं की पुरुष किचन में नहीं घुसते, पकाते-तलते नहीं हैं, लेकिन वो दिन परिवार में त्योहार सरीखा लगता है. उनके बनाये खाने में नमक-मिर्च घट-बढ़ जाए तो कहा जाता है कि कभी-कभार किचन में काम करने पर ये छोटी-मोटी नुक्सें नजरअंदाज कर दी जाएं. दूसरी तरफ औरतों के हाथों तैयार जायके का लुत्फ उठाना पुरुषों की डेली रूटीन का हिस्सा बना दिया गया है.

पुरुष हो या महिला अच्छे खाने का स्वाद दोनों की जीभ पर समान ही लगता है, इसलिए ये कहना गलत है कि सिर्फ पुरुषों के दिल का रास्ता ही पेट से होकर जाता है. हालांकि, स्वास्थ्य के लिहाज से देखें तो दिल का रिश्ता वाकई पेट से होता है. अच्छा खाना दिल को स्वस्थ तो बनाता है लेकिन इसका जेंडर से कोई लेना-देना नहीं.

Source: DW

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