भारतीय आदिवासियों के समर्थन में दुनियाभर में लगे ‘हसदेव बचाओ’ के नारे

नई दिल्ली, 12 मई। ऑस्ट्रेलिया की सबसे मशहूर जगह यानी सिडनी स्थित ओपेरा हाउस के पास कुछेक एक लोग 'हसदेव बचाओ' के नारे लगा रहे थे. इन लोगों में कई मानवाधिकार संगठनों के कार्यकर्ता शामिल थे जो भारत के हसदेव में अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे आदिवासियों के प्रति समर्थन जाहिर करने आए थे.
प्रदर्शन शामिल मनजोत कौर भारतीय मूल की ऑस्ट्रेलियाई युवा हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में मनजोत ने कहा कि वह पूरी दुनिया के अलग-अलग शहरों में हो रहे ऐसे ही प्रदर्शनों का हिस्सा बनने के लिए ओपेरा हाउस आई हैं. 'स्टॉप अडानी मूवमेंट' की कार्यकर्ता मनजोत कौर ने कहा, "ठीक इस वक्त, जब हम बात कर रहे हैं हसदेव में जंगल काटे जा रहे हैं. हम उन जंगलों को कटने से बचाने के लिए संघर्ष कर रहे आदिवासियों के समर्थन में यहां जमा हुए हैं, ठीक उसी तरह जैसे लंदन, वॉशिंगटन, न्यूयॉर्क, ब्रसेल्स में कार्यकर्ता जमा हुए हैं."

दुनियाभर के इन कार्यकर्ताओं ने अंग्रेजी में 'सेव हसदेव' लिखे पोस्टरों और बैनरों के साथ फोटो खिंचाई और उसे ट्विटर पर पोस्ट किया. सपना साउथ एशियन क्लाइमेट सोसायटी ने कहा, "हसदेव अरण्य वन में 30 गांव खतरे में हैं. आदिवासी समुदाय अपने जल, जंल और जमीन को कोयले की खदानों से बचाने के लिए लड़ रहे हैं. एक दशक से यह लड़ाई चल रही है. हम उनकी इस लड़ाई को और मजबूत करेंगे."
क्या है हसदेव का संघर्ष?
हसदेव अरण्य भारत के सबसे घने जंगलों में से एक है. छत्तीसगढ़ में स्थित इस जंगल में पेड़ काटने के लिए राज्य सरकार ने पिछले महीने ही अंतिम अनुमति जारी की जिसके बाद कटाई का काम शुरू हो गया. हालांकि आदिवासियों के प्रतिरोध और धरने के कारण पिछले हफ्ते यहां पेड़ काटने का काम रोक दिया गया लेकिन ग्रामीणों को डर है कि यह कभी भी दोबारा शुरू हो सकता है.
हसदेव अरण्य में खनन योजना से आदिवासियों के उजड़ने का खतरा
हसदेव के लिये लड़ रहे आदिवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के संगठन 'छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन' ने शिकायत की थी कि राज्य सरकार ने पेड़ काटने से पहले एनटीसीए और नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ को सूचित नहीं किया. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, हसदेव अरण्य के परसा कोल ब्लॉक में 95,000 पेड़ काटे जाने हैं. हालांकि सामाजिक कार्यकर्ताओं का अनुमान है कि कटने वाले पेड़ों की असल संख्या दो लाख से अधिक होगी.
हसदेव में बीस से अधिक जगहों पर कोयला निकालने के लिए खदान बनाने का प्रस्ताव है. यहां से राजस्थान सरकार पहले ही परसा ईस्ट केते बसान (पीईकेबी) खदान से कोयला निकाल रही है. राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड ने अडानी ग्रुप से अनुबंध किया है जो कि इन खानों का डेवलपर और ऑपरेटर (एमडीओ) है.
हसदेव के जंगल वन्य जीवन से भरपूर हैं. वहां बाघों और हाथियों का बसेरा है. वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने पिछले साल अपनी रिपोर्ट में इस क्षेत्र में माइनिंग न करने की चेतावनी दी थी. साल 2010 में तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसे "नो-गो" जोन घोषित किया था.
छह साल में सबसे बुरा बिजली संकट झेल रहा है भारत
पिछले साल अक्टूबर में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने हसदेव अरण्य के परसा कोल ब्लॉक में खनन के लिये अंतिम मंजूरी दे दी थी, जिसके तहत लगभग 1,250 हेक्टेयर क्षेत्रफल में खनन किया जाना है जिसके लिए 841.5 हेक्टेयर वन भूमि पर पेड़ काटे जा रहे हैं. केंद्र की मंजूरी के बाद इस साल अप्रैल में छत्तीसगढ़ सरकार ने भी यहां माइनिंग को हरी झंडी दे दी. ग्रामीणों का आरोप है कि हसदेव में खनन के लिये फर्जी प्रस्ताव के आधार पर ग्राम सभा की अनुमति हासिल की गई.
सरकारों का पक्ष
राजस्थान सरकार का कहना है कि उन्हें पहले से जो पीईकेबी ब्लॉक आवंटित किया गया और उसका कोयला खत्म होने को है. इसलिये उन्हें नई कोयला खदान चाहिए. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसी साल छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से 25 मार्च को मुलाकात की थी.
मुलाकात के बाद गहलोत ने पत्रकारों से कहा कि अगर छत्तीसगढ़ सरकार मदद नहीं करेगी तो राजस्थान में अंधेरा छा जाएगा क्योंकि 4,500 मेगावॉट के पावर प्लांट कोयला न मिलने के कारण बंद हो सकते हैं. गहलोत ने कहा कि पूरा राज्य (राजस्थान) संकट में है और भविष्य के लिये चिंतित है. उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार से इस बारे में जल्दी फैसला करने को कहा.
उधर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने परसा कोल ब्लॉक में माइनिंग को हरी झंडी देने से पहले यह कहा कि राजस्थान सरकार की अर्जी पर नियमों और कानून के हिसाब से ही अमल होगा. बघेल ने कहा कि उनकी सरकार को पर्यावरणीय सरोकारों और माइनिंग क्षेत्र में रह रहे लोगों की फिक्र है. गहलोत से इस मुलाकात के बाद ही बघेल सरकार ने परसा कोल ब्लॉक में माइनिंग की आखिरी स्वीकृति दी.
Source: DW
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