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यूक्रेन में क्यों मर रहे हैं 'रूसी सेना की रीढ़' कर्नल और जनरल

अपने फर्स्ट डिप्टी रक्षा मंत्री वैलरी जेरासिमोव के साथ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (बाएं)

कीव, 24 मार्च। बुधवार को क्रीमिया के शहर सेवास्तोपोल में ब्लैक सी फ्लीट की डिप्टी कमांडर आंद्रेई पालीई के अंतिम संस्करा में सैकड़ों लोग जमा हुए. बंदूकों की सलामी के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई. रूस की दक्षिणी बंदरगाह नोवोरोशिस्क के स्थानीय प्रशासन ने 28 फरवरी को एक बयान जारी कर मेजर जनरल आंद्रेय सुखोवेत्स्की की मौत की पुष्टि की थी. इस बयान में बताया गया था कि मेजर जनरल सुखोवेत्स्की ने सीरिया, अबखाजिया और उत्तरी कॉकेशस में सेवाएं दी थीं.

यूक्रेन के राष्ट्रपति के सलाहकार मिखाइल पोडोलियाक ने रविवार को छह ऐसे रूसी जनरलों के नाम गिनाए, जो 24 फरवरी को यूक्रेन पर हमला किए जाने के बाद मारे जा चुके हैं. यूक्रेन का कहना है कि इनके अलावा दर्जनों कर्नल और अन्य सैन्य अधिकारी इस युद्ध में मारे गए हैं.

सही संख्या नदारद

रूस के रक्षा मंत्रालय ने इन मौतों की पुष्टि नहीं की है. 2 मार्च को उसने बताया था कि यूक्रेन में उसके 498 सैनिक मारे गए हैं. उसके बाद से नया आंकड़ा जारी नहीं किया गया है. यूक्रेन का दावा है कि रूस के 15,600 जवान और अधिकारी यूक्रेन में मारे जा चुके हैं. हालांकि इन दावों की पुष्टि नहीं की जा सकती.

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पोलैंड स्थित सलाहकार संस्था रोखन के निदेशक कोनराड मूजिका का कहना है कि यूक्रेन के दावे सही हो सकते हैं लेकिन असल संख्या इससे ज्यादा नहीं होगी और इन दावों की पुष्टि करने का कोई जरिया नहीं है. उन्होंने कहा, "अगर हम दो जनरलों की भी बात करें तो यह बड़ी बात है. ना सिर्फ हम जनरलों की बात कर रहे हैं बल्कि कर्नल भी मारे गए हैं जो बहुत वरिष्ठ अधिकारी होते हैं."

मूजिका कहते हैं कि इन मौतों से यह संकेत तो मिलता है कि रूस को यूक्रेन की आर्टिलरी के ठिकानों की सही समझ नहीं थी और यूक्रेन को रूस के वरिष्ठ अधिकारियों के ठिकाने का पता लगाने में कामयाबी मिल रही है, जो संभवतया उनके मोबाइल फोन के सिग्नलों के जरिए किया जा रहा है.

कर्नल ज्यादा हैं, कॉरपोरेल कम

मॉस्को स्थित एक वरिष्ठ विदेशी राजनयिक ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, "मेरे लिए जरूरी यह है कि जनरल ही नहीं, कर्नल और उससे ऊपर के रैंक के अधिकारियों की मौत की रिपोर्ट बहुत आ रही हैं, जो कि रूस की सेना की रीढ़ हैं." इस राजनयिक के मुताबिक रूस की सेना बहुत ज्यादा केंद्रित और वर्गीकृत है और उसमें पश्चिमी सेनाओं की तरह अत्याधिक कुशल जूनियर अफसरों की कमी है.

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वह बताते हैं, "कर्नल बहुत ज्यादा हैं और कॉरपोरोल बहुत कम. तो जहां किसी तरह का फैसला लेने की बात होती है, तब वो काम जो पश्चिमी में बहुत कम रैंक के अधिकारी करते हैं वे भी उच्च पदस्थ अधिकारियों तक जाते हैं."

इस राजनयिक का कहना है कि बहुत ज्यादा वर्गीकृत सेना होने के कारण वरिष्ठ अधिकारियों को भी मोर्चे पर जाना पड़ रहा है ताकि वहां फैसले लिए जा सकें या रणनीति में बदलाव आदि किए जा सकें. ऐसी स्थिति में ये अफसर खतरे में पड़ जाते हैं. वह कहते हैं, "केंद्रीकृत कमांड और नियंत्रण, फैलाव की कमी और सुरक्षित संवाद की कमी ने सीनियर अफसरों को उन जगहों पर पहुंचा दिया है जहां उन्हें यूक्रेन के मानवहति ड्रोन आसानी से पहचान कर हमला कर पा रहे हैं."

24 फरवरी को रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण शुरू किया था जिसे पूरा एक महीना हो चुका है. इस दौरान हजारों लोग मारे गए हैं और लाखों की संख्या में विस्थापित हो चुके हैं. कुछ अनुमान बताते हैं कि विस्थापित लोगों की संख्या एक करोड़ को पार कर चुकी है.

वीके/एए (रॉयटर्स)

Source: DW

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