राजस्थान का एकमात्र त्रिमूर्ति समिद्धेश्वर मंदिर, शिव के साथ होती है ब्रह्मा, विष्णु की भी पूजा
Rajasthan News: क्या आप जानते है कि राजस्थान में एक ऐसा मंदिर है जहां त्रिमूर्ति यानी भगवान ब्रह्मा,विष्णु और महेश की मूर्ति स्थापित है। जहां सावन के इस पवित्र महीने में भक्तों की भीड़ उमड़ी हुई है।
कहा जाता है कि विश्व में भगवान शिव का यह एक मात्र ऐसा मंदिर है जहां सावन के महीने में भक्त शिव के साथ ब्रह्मा, विष्णु की पूजा एक साथ करते है।
मंदिर के जानकार बताते है कि इसके निर्माण से पूर्व कुंडली का निर्माण कराया गया। इतना ही नहीं मंदिर निर्माण के दौरान भी वास्तु दोष का ध्यान रखा गया।

यह विश्व विख्यात मंदिर राजस्थान के चित्तौड़ दुर्ग स्थित समिद्धेश्वर महादेव का है जहां मंदिर मेंं वास्तु एवं शिल्प का बेजोड़ उदाहरण है। यह मंदिर दुर्लभ है लेकिन इस मंदिर की कुंडली बनी होने एवं वास्तु दोष दूर होने की जानकारी नाम मात्र के लोगों है, जो कि अंगुलियों पर गिने जा सके।
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— PURSHOTTAM KUMAR (@pkjoshinews) July 22, 2024
विश्व विख्यात चित्तौड़ दुर्ग पर विजय स्तम्भ के निकट ही समिद्धेश्वर महादेव मंदिर है। इसका निर्माण 11वीं शताब्दी में परमार राजा भोज ने करवाया था।
यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना बताया जाता है। इसमें भगवान शिव की अकेले पूजा नहीं होती है। यहां एक ही पत्थर पर भगवान ब्रह्मा, विष्णु व महेश के त्रिमूर्ति दर्शन हैं, जो एक साथ विश्व में कहीं भी देखने को नहीं मिलते हैं।
इस मंदिर के निर्माण में शिल्पकारों ने वास्तु शास्त्र को ध्यान में रख कर इसका निर्माण करवाया, जिससे कि हजारों सालों तक इस मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचे।
दुर्ग भ्रमण पर आने वाले देश-विदेश के हजारों पर्यटक इस मंदिर में भगवान ब्रह्मा विष्णु व महेश के त्रिमूर्ति विशाल दर्शन देख कर अभिभूति हो जाते हैं।
मंदिर को बनाया तो राजा भोज ने पहली बार वास्तु शास्त्र का उपयोग किया। निर्माण से पहले कुंडली बनाई, जो आज भी मंदिर में लगे शिलालेख में भी दर्ज है। मंदिर निर्माण के शिलालेख भी लगे हैं। इनके बीच ही कुंडली भी लगी हुई है।
साथ ही यह पूरे विश्व का एक मात्र मंदिर है, जिसमें मूर्ति पहले बनाई और मंदिर बाद में बना। इसका कारण यह है कि इस मंदिर में एक ही 9 फीट के विशाल ऊंचे व चौड़े पत्थर पर तीन मूर्तियां है, जिसमें ब्रम्हा, विष्णु व महेश हैं।
मंदिर निर्माण के बाद इतनी बड़ी प्रतिमाएं अंदर स्थापित करना संभव नहीं था। ऐसे में पहले यहां प्रतिमां बनी व बाद में मंदिर। यहां श्रृष्टि के निर्माता ब्रह्मा, पालक विष्णु व विनाश्क महेश की पूजा होती है।
बताया गया कि एक बारगी में कोई देख कर नहीं पहचान सकता कि कौनसी मूर्ति किसकी है। इसमें भगवान के बचपन, जवानी एवं बुढ़ापे की प्रतिमाएं हैं। बचपन का रूप ब्रहमा का है तो जवानी का भगवान विष्णु का व बुढ़ापे का भगवान शिव का। इन प्रतिमाओं को भी इनकी विशेषताओं से पहचानना पड़ता है।
मूर्तिकार ने इसमें अलग-अलग पहचान डाली। भगवान ब्रह्मा के हाथ में कमल का फूल और एक हाथ में शंख है तो भगवान विष्णु की प्रतिमा में सिर पर त्रिपुंड और कान में कुंडल है। गले में नाग नहीं होकर नाग जमीन से आ रहा है। सबसे अंत में भगवान शिव की मूर्ति हैं, जिसमें कि उनके हाथ में खपर तथा गले में नाग है।
बताया जाता है कि 1303 में अलाउद्दिन खिलजी ने चित्तौडगढ़ पर आक्रमण किया था। उस समय मंदिर की बहुत सी प्रतिमाओं को खंडित कर दिया था। बाद में महाराणा कुम्भा के पिता महाराणा मोकल ने 1428 में इसका जीर्णोद्धार कराया। इस मंदिर के निर्माण व व जिर्णोद्धार के दो प्रमाण हैं। इस मंदिर में दो शिलालेख लगे हुए हैं जिसमें से एक जिर्णोद्धार का है।
यहां सावन माह में विशेष आयोजन होते हैं। पूरे एक माह तक अभिषेक किया जाएगा। राज्य सरकार की ओर से भी श्रावण सोमवार को यहां अभिषेक एवं पूजा करवाई जाती है।












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