राजस्थान का सांवलिया सेठ जहां आते है लाखों भक्त, चंदे में चढ़ती करोड़ों की हिस्सेदारी,जानिए रीयल स्टोरी
Rajasthan Temple News: देश की आजादी से लेकर करीब 90 के दशक तक हर गांव में आपने भी अपने बुजुर्गों से एक सेठ की कहानी जरूर सुनी होगी। या तो क्रूर होगा या फिर वो सूदखोर होगा।
यह वहीं सेठ है जो 60 के से लेकर 90 के दशक हर बालीवुड फिल्म में देखा गयाा था। जो जरूरतमंदों को रूपए देकर या तो उनकी जमीन गिरवी रख लेता था या फिर घर और जेवरों को गिरवी रख लेता था। लेकिन आज हम आपकों राजस्थान के एक ऐसे सेठ की रीयल स्टोरी बताएंगे कि आप भी जानकर दांतों तले अंगुली दबा लेंगे।
राजस्थान के इस सेठ की सबसे खास बात यह है कि कभी यह मीरा का गोपाल माना जाता था तो आज दुनिया इसे सेठ के नाम से जानती है।

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राजस्थान सहित कई राज्यों और देशों के चोर से लेकर कारोबारी तक इसे अपने व्यवसाय का पार्टनर बनाते है और इस पार्टनरी में पूरी ईमानदारी के साथ व्यापारी हर महीने इसकों पूरी हिस्सेदारी देकर जाते है।
इस सेठ की चौखट पर प्रदेश से लेकर देश और दुनिया के कई ख्यातनाम हस्तियां अक्सर माथा टेकने नंगे पैर दौड़ी चली आती है। इस सेठ की ओर खास बात यह है कि इस हिस्सेदारी का हर महीने पूरा हिसाब किताब होता है।
अब हाल ही में अब तक की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी की राशि सेठ के खजाने से निकाली गई। जो करीब 19 करोड़ से भी ज्यादा थी। ऐसा नहीं था इसमें सिर्फ कागजों की नगदी थी, इसमें डॉलर भी था तो इसमें दूसरे देशों की करेंसी भी थी।
दरअसल राजस्थान के चितौड़गढ़ से उदयपुर जाने वाले नेशनल हाई पर मात्र 28 किमी दूर भादसोड़ा गांव स्थित है। जहां भगवान श्री कृष्ण का मंदिर स्थापित है। पूरी दुनिया इसे सांवलिया सेठ के नाम से पुकारती है और जानती है।
कहते है कि यह वहीं भगवान श्री कृष्ण है जिनकी मीराबाई गोपाल समझ पूजा किया करती थी। मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो ना कोई देश का यह सुप्रसिद्ध भजन आज भी आपके कानों में सुनाई पड़ता है तो सीधी वहीं मीरा की भगवान श्रीकृष्ण को लेकर भक्ति की तस्वीर उभरती है।
लेकिन द्वापर युग का ग्वाला कृष्ण आज कलयुग में सांवलिया सेठ के नाम से पूरी दुनिया में माना और पूजा जा रहा है। कहते है कि राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थापित सांवलिया सेठ को भक्त अपने छोटे-छोटे कारोबार से लेकर बड़े से बड़े व्यवसाय में अपना पार्टनर यानी हिस्सेदार बनाते है।
चलिए पहले आपकों सांवलिया सेठ के बारे में समझाते है कि आखिर यह कहां स्थित है।
सांवलिया सेठ मंदिर चित्तौड़गढ़ सॆ उदयपुर की ओर राष्ट्रीय राजमार्ग पर 28 किमी दूरी पर भादसोड़ा ग्राम में स्थित है. यह मंदिर चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन से 41 किमी एवं डबोक एयरपोर्ट से मात्र 65 किमी की दूरी पर स्थित है।
प्रसिद्ध सांवलिया सेठ के दर्शन करने हर महीने लाखों भक्तों का सैलाब उमड़ता है। मंडफिया मंदिर कृष्ण धाम के रूप में भी चर्चित है। मंडफिया मंदिर देवस्थान विभाग राजस्थान सरकार के अधीन आता है।
मंदिर से जुड़े लोग और स्थानीय व्यक्ति बताते है कि पुराने जमाने में सांवलिया सेठ मंदिर की महिमा इतनी फैली कि उनके भक्त वेतन से लेकर व्यापार तक में उन्हें अपना हिस्सेदार बनाने लगे । मान्यता है कि जो भक्त खजाने में जितना दान देते हैं सांवलिया सेठ उससे कई गुना ज्यादा भक्तों को वापस लौटाते हैं। व्यापार जगत में इनकी ख्याति इतनी है कि लोग अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए भगवान सांवलिया सेठ को अपना बिजनेस पार्टनर बना रहे है।
सांवलिया सेठ मंदिर का भंडारा यानी दानपात्र महीने में एक बार खोला जाता है। बताया जाता है कि यह चतुर्दशी को खोला जाता है। इसके बाद अमावस्या का मेला शुरू होता है। होली पर यह डेढ़ माह में और दीपावली पर दो माह में खोला जाता है।
सांवलिया सेठ मंदिर में कई एनआरआई भक्त भी आते हैं। विदेशों से आने वाले भक्त अपनी इनकम में से सांवलिया सेठ का हिस्सा चढ़ाना नहीं भूलते है। इसलिए भंडारे से डॉलर, अमरीकी डॉलर, पाउंड, दिनार, रियॉल आदि के साथ कई देशों की मुद्रा निकलती है।
गुजरात के विश्वप्रसिद्ध अक्षरधाम मंदिर की तर्ज पर पिछले कई बरसों से श्री सांवलिया सेठ मंदिर का नव-निर्माण जारी है। इसमें मुख्य मंदिर के दोनों ओर बरामदों में दीवारों पर बेहद आकर्षक चित्रकारी की गई है।
अक्षरधाम की तरह यहां भी मंदिर के बीच खाली मैदान में संगीतमय फव्वारा लगाया जाएगा। यहां विशेषकर उत्तर-पश्चिमी भारत के राज्य जैसे मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। 1961 से ही इस प्रसिद्ध स्थान पर देवझूलनी एकादशी पर विशाल मेले का आयोजन हो रहा है।
एक किवदंती यह भी
एक मान्यता य़ह भी है कि भगवान श्री सावलिया सेठ का संबंध मीरा बाई से है। किवदंतियों की माने तो सांवलिया सेठ मीरा बाई के वही गिरधर गोपाल है, जिनकी वह पूजा किया करती थी। तत्कालीन समय में संत-महात्माओं की जमात में मीरा बाई इन मूर्तियों के साथ भ्रमणशील रहती थी। दयाराम नामक संत की ऐसी ही एक जमात थी जिनके पास यह मूर्तियां थी।
बताया जाता है की जब औरंगजेब की सेना मंदिरों में तोड़-फोड़ कर रही थी तब मेवाड़ में पहुंचने पर मुगल सैनिकों को इन मूर्तियों के बारे में पता लगा। मुगलों के हाथ लगने से पहले ही संत दयाराम ने प्रभु-प्रेरणा से इन मूर्तियों को बागुंड-भादसौड़ा की छापर में एक वट-वृक्ष के नीचे गड्ढा खोदकर मूर्ति की स्थापना कर दी।
माना जाता है कि साल 1840 में मंडफिया ग्राम निवासी भोलाराम गुर्जर नामक ग्वाले को सपना आया की भादसोड़ा-बागूंड गांव की सीमा के छापर में भगवान की तीन मूर्तिया जमीन मे दबी हुई हैं। जब उस जगह पर खुदाई की गयी तो सपना सही निकला और वहां से एक जैसी तीन मूर्तिया प्रकट हुईं। सभी मूर्तियां बहुत ही मनोहारी थी। देखते ही देखते यह खबर सब तरफ फैल गयी और आस-पास के लोग यहां पहुंचने लगे और यह सिलसिला आज भी लगातार जारी है।
क्या है नानी बाई का मायरा ?
भगवान सांवलिया सेठ के बारे में एक मान्यता यह भी है कि नानी बाई का मायरा भरने के लिए स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने वह रूप धारण किया था।
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