Sarthak Naam Abhiyan: राजस्थान सरकार का यू-टर्न, क्यों वापस लेना पड़ा बच्चों के नाम बदलने वाला अभियान?

Sarthak Naam Abhiyan: राजस्थान में स्कूली बच्चों के नाम सुधारने और उन्हें 'सार्थक' पहचान देने के उद्देश्य से शुरू किया गया 'सार्थक नाम अभियान' (Sarthak Naam Abhiyan) महज एक सप्ताह के भीतर ही विवादों की भेंट चढ़ गया। प्रदेश की भजनलाल सरकार ने व्यापक जन-विरोध और सोशल मीडिया पर उड़ रहे मजाक के बाद इस अभियान को तत्काल प्रभाव से वापस लेने का निर्णय लिया है।

शिक्षा विभाग के इस कदम का प्राथमिक उद्देश्य बच्चों को भविष्य में होने वाली संभावित शर्मिंदगी से बचाना था, लेकिन विभाग द्वारा प्रस्तावित नामों की सूची ने ही विवाद का बवंडर खड़ा कर दिया। सरकार ने अब स्पष्ट किया है कि बच्चों के नामकरण का पूर्ण अधिकार और स्वतंत्रता केवल माता-पिता और अभिभावकों के पास ही रहेगी, इसमें प्रशासन का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।

Sarthak Naam Abhiyan

विवाद की जड़ बनी 2950 नामों की अजीब सूची

शिक्षा विभाग ने 14 अप्रैल को छात्र-छात्राओं के लिए 2950 नामों की एक ड्राफ्ट सूची जारी की थी। विभाग का तर्क था कि अक्सर ग्रामीण या पिछड़े क्षेत्रों में बच्चों के ऐसे नाम रख दिए जाते हैं जिनका अर्थ नकारात्मक होता है। हालांकि, जब यह सूची सार्वजनिक हुई, तो इसमें शामिल नामों ने सबको हैरान कर दिया।

  • लड़कियों के लिए प्रस्तावित नाम: सूची में भिक्षा, भयंकर, कलयुगी और कैकेयी जैसे नाम शामिल थे, जिन्हें समाज में नकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है।
  • लड़कों के लिए प्रस्तावित नाम: लड़कों की श्रेणी में उग्र सिंह, थाना सिंह और बेचरादास जैसे नाम दिए गए थे, जिन पर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया हुई।
  • स्थान और उपनाम: रोचक बात यह है कि सूची में चतुर्वेदी, यादव और रावत जैसे सरनेम के साथ-साथ बीकानेर, केदारनाथ और गंगोत्री जैसे भौगोलिक स्थानों को भी नाम के विकल्प के तौर पर पेश किया गया था।

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सोशल मीडिया पर नाराजगी, सरकार ने दिया स्पष्टीकरण

शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के कार्यालय ने सोमवार को अभियान रद्द होने की आधिकारिक पुष्टि की। विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, जो सूची वायरल हुई वह केवल एक शुरुआती ड्राफ्ट थी, जिसे फीडबैक के लिए तैयार किया गया था। लेकिन जनता ने इसे बच्चों पर थोपे जाने वाले असहज नामों के रूप में देखा।

सोशल मीडिया पर लोगों ने तंज कसते हुए कहा कि ऐसे नाम बच्चों को आत्मविश्वास देने के बजाय हंसी का पात्र बना सकते हैं। विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा कि शिक्षा विभाग को नामों की सूची बनाने के बजाय स्कूलों की जर्जर इमारतों, शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। फिलहाल, मंत्री कार्यालय ने यह साफ नहीं किया है कि भविष्य में इस अभियान को नए स्वरूप में लाया जाएगा या इसे पूरी तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

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