सीकर के राधेश्याम खेमका को मरणोपरांत पद्म विभूषण पुरस्कार, पत्तल में करते थे भोजन, कुल्हड़ में पीते पानी
सीकर, 29 जनवरी। भारत सरकार ने वर्ष 2022 में जिन लोगों को देश के दूसरे सबसे बड़े सिविल सम्मान पद्म विभूषण अलंकरण से सम्मानित किया है, उसमें राधेश्याम खेमका भी शामिल हैं। खेमका मूलरूप से राजस्थान के सीकर जिले के फतेहपुर कस्बे से हैं।

वाराणसी में रहता है खेमका परिवार
यहां उनकी पैतृक हवेली और नोहरा है। उनका परिवार फतेहपुर में अपनी कुलदेवी खेमका शक्ति मंदिर में पूजा अर्चना के लिए आते रहते हैं। करीब 90 वर्ष पूर्व राधेश्याम खेमका के पिता सीताराम खेमका व्यापार के सिलसिले में बिहार के मुंगेर गये थे। उसके बाद में खेमका परिवार वाराणसी चला गया। तब से उनका परिवार वाराणसी में ही रहता है।

राधेश्याम खेमका का जीवन परिचय
बिहार के मंगुेर में सीताराम खेमका के घर 1935 में राधेश्याम खेमका का जन्म हुआ। सन 1956 में खेमका परिवार बनारस स्थानातरित हो गया। बनारस से ही राधेश्याम खेमका ने काशी हिंदू विश्वविधालय से संस्कृत में एमए एवं साहित्य रत्न की उपाधियां ग्रहण की।

सन 1982 में कल्याण का संपादन किया
वन इंडिया हिंदी से बातचीत में राधेश्याम खेमका के भतीजे कृष्ण कुमार खेमका ने बताया कि राधेश्याम खेमका के पिता सीताराम खेमका बेहद धार्मिक विचारधारा के व्यक्ति थे। सन 1982 में राधेश्याम खेमका प्रसिद्ध धार्मिक एवं साहित्यिक संस्था गीता प्रेस के सर्म्पक में आए और 1983 में पहली बार कल्याण पत्रिका का संपादन किया। जीवनपर्यन्त सन 2021 तक आखिरी सांस तक वे कल्याण के संपादक रहे। वे गीता प्रेस के अध्यक्ष भी थे।

राधेश्याम खेमका की साहित्यिक जीवन यात्रा
राधेश्याम खेमका भले ही कल्याण के संपादक रहे पर गीता प्रेस के अध्यक्ष के रूप में गीताप्रेस से प्रकाशित होने वाली अनेक पुस्तकों के विचार उन्हीं का था। खासकर कर्मकाण्ड व संस्कारों से संबंधित पुस्तकों का सुझाव भी उन्हीं का था, जिसमें नित्य कर्म पूजा प्रकाश, अंत्यकर्म, श्राद्ध प्रकाश, गया श्राद्ध पद्धति, त्रिपंडी श्राद्ध प्रकाश, संस्कार प्रकाश, गुरूड पुराण, सारोद्धार पद्धति आदि शामिल है।

कल्याण के 460 से अधिक अंकों का संपादन
कल्याण के 38 वर्ष के संपादकीय कार्यकाल में उन्होंने 460 से अधिक अंकों का संपादन किया। इसके अलावा उनके कार्यकाल में अन्यान्य महापुराणों व कर्मकाण्ड के दुर्लभ ग्रन्थों के प्रामाणिक संस्करण भी प्रकाशित हुए। गीता प्रेस द्वारा अब तक श्रीमद भागवत गीता की चार मिलियन प्रतियां प्रकाशित की जा चुकी हैं।
पत्तल में खाते थे और कुल्हड़ में पीते थे पानी
राधेश्याम खेमका पूरी तरह से धार्मिक एवं सात्विक प्रवृति के थे। वह स्टील या लोहे के बर्तन में कभी भी भोजन नहीं करते थे। गीता प्रेस आते तो वहां पत्तल में खाना खाते और कुल्हड़ में पानी पीते थे। इतना ही नहीं उन्होंने कभी भी चर्म वस्तुओं का उपयोग नहीं किया। जूते भी कपड़े या रबड़ के पहनते थे।
अनेक संतों से था उनका निकट का परिचय
राधेश्याम खेमका का देश के अनेक संतों से गहरा और निकट का संबंध था, जिनमें स्वामी करपात्रीजी, शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती, पुरी शंकराचार्य स्वामी निरजंनदेव तीर्थ,संत रामसुखदास,कथावाचक रामचन्द्र डोगरे आदि प्रमुख हैं।

फतेहपुर में खेमका की पुस्तैनी हवेली
राधेश्याम खेमका के मित्र जगदीश गोयनका और नंदकिशोर बोचीवाल ने बताया कि फतेहपुर के परशुराम भवन के पास उनकी पैतृक हवेली और नोहरा है। राधेश्याम खेमका और उनके परिवार का यहां निरतंर आना जाना रहा है। कस्बे में ही उनकी कुलदेवी खेमका सती मंदिर है, जहां उनका परिवार जात-जडूले, परोजन, शादी की धोक देने आता रहता है। गत अप्रेल में ही उनके भतीजे कृष्ण कुमार खेमका तथा अन्य परिजन फतेहपुर आये थे।
कृष्ण कुमार ग्रहण करेंगे पद्म्र विभूषण पुरस्कार
भारत सरकार ने साहित्य और शिक्षा के लिए देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक अलंकरण राधेश्याम खेमका को मरणोपरांत दिया है। खेमका का 3 अप्रेल 2021 को निधन हो गया था। उनके भतीजे कृष्णकुमार खेमका ने बताया कि वे यह सम्मान ग्रहण करने के लिए दिल्ली जाएंगे।












Click it and Unblock the Notifications