Jaipur Bomb Blast: कौन हैं जयपुर ब्लास्ट के आरोपियों को बिना फीस लिए फांसी से बचाने वाले 18 वकील?
jaipur bomb blast accused: जयपुर बम ब्लास्ट के चार आरोपियों की फांसी की सजा टल जाने में न केवल पुलिस की लापरवाही सामने आई बल्कि हाई कोर्ट में वकीलों के ग्रुप प्रोजेक्ट-39A के कानूनी दांव-पेंच भी काम आए।

Jaipur Bomb Blast in Hindi: राजस्थान की राजधानी जयपुर में सात बम ब्लास्ट करने के चार आरोपियों की फांसी की सजा उच्च न्यायालय से रद्द होने के मामले में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। जयपुर बम धमाके के आरोपियों को फांसी बचाने के पीछे 18 वकीलों की ऐसी विशेष फौज थी, जिसने बतौर फीस एक पैसा भी नहीं लिया।
जयपुर को दहलाने वालों की फांसी टालने वाले वकील आखिर कौन थे? किसने इनकी कानूनी लड़ाई का खर्च उठाया और क्यों राजस्थान आतंकवाद विरोधी दस्ते (ATS) की जांच इन वकीलों के सामने फेल हो गई? इन सारे सवालों के जवाब भास्कर की एक पड़ताल में मिले हैं।
NLU की वकीलों का ग्रुप है प्रोजेक्ट-39ए
बता दें कि जयपुर बम धमाके के आरोपियों को फांसी से बचाने वाले 18 वकीलों की फौज के पीछे नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एनएलयू) के वकीलों का ग्रुप प्रोजेक्ट-39ए है। प्रोजेक्ट-39ए की टीम किसी कोर्ट द्वारा फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद देशभर में 80 फीसदी मामलों में वकील मुहैया करवाती है।
जयपुर बम ब्लास्ट में 18 वकील कौन हैं?
खास बात यह इन वकीलों ने जयपुर बम ब्लास्ट के आरोपियों का पूरा केस बिना फीस लिए लड़ा। केस लड़ने वालों में रजत, विभोर जैन, निशांत व्यास, मुजाहिद अहमद समेत 18 वकील शामिल हैं। इन्हें वकालत का पांच से सात साल का अनुभव है। फिर भी कानूनी दांव-पेंच से राजस्थान एटीएस की जांच के सभी तथ्यों को तथ्यहीन साबित कर दिया है।
क्या है ग्रुप प्रोजेक्ट-39ए?
दरअसल, कोई भी लोअर कोर्ट किसी आरेापी को फांसी की सजा सुना देती है। उसके बाद आरोपी के परिजनों को विधिक सेवा कानून के तहत प्रदेश सरकार की ओर से न्याय मित्र मुहैया करवाए जाते हैं। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी का प्रोजेक्ट-39ए भारतीय संविधान के अनुच्छेद-39ए से प्रेरित है। 39ए मतलब सभी का समान मानवाधिकार साधन। प्रोजेक्ट-39ए ग्रुप देश में आर्थिक व सामाजिक बाधाओं को दूर कर समान न्याय व समान मूल्यों की पैरवी करता है। जयपुर बम ब्लास्ट के आरोपियों को फांसी सजा सुनाए जाने के बाद उनके परिजनों ने राजस्थान सरकार की ओर से मुहैया करवाए न्याय मित्रों की बजाय एनएलयू के ग्रुप प्रोजेक्ट-39ए को चुना और इससे केस लड़ने का आग्रह किया। यह ग्रुप जेलों में कैदियों के मानसिक स्वास्थ्य व फांसी पर नए सिरे से पैरवी करता है।
ग्रुप प्रोजेक्ट-39ए के वकील ने क्या कहा?
जयपुर बम ब्लास्ट के चार आरोपियों के फांसी की सजा से बचने के बाद कमजोर जांच को लेकर राजस्थान पुलिस की खूब किरकिरी हो रही है। इधर, मीडिया से बातचीत में ग्रुप प्रोजेक्ट-39ए के एक वकील ने कहा कि बचाव पक्ष जयपुर बम ब्लास्ट से इनकार नहीं करता, लेकिन जांच एजेंसी ने जिन्हें अपराधी माना, उन पर अपराध का मकसद व आपराधिक षड़यंत्र साबित नहीं कर पाई। एजेंसी यह भी नहीं पता कर सकी कि जयपुर बम ब्लास्ट 2008 किसने किए?
ग्रुप प्रोजेक्ट-39ए ने ऐसे फेल की एटीएस जांच
जयपुर बम ब्लास्ट केस में दूसरे दिन दो न्यूज एजेंसियों को एक ईमेल मिला था, जिसमें जयपुर बम धमाकों की जिम्मेदारी इंडियन मुजाहिदीन ने ली थी। मेल के आधार पर जांच एजेंसी ने कैफे के कम्प्यूटर व रजिस्टर जब्त नहीं किए। न्यूज एजेंसियों को मिले मेल की ऑरिजनल कॉपी बी बजाय वर्ड फाइल पेश की गई। साबित नहीं हो सका कि मेल शाहबाज ने किया। कोर्ट में 65बी सर्टिफिकेट भी नहीं दिया, जिससे मेल की वैधता साबित होती। मीडिया हाउस के संपादक व तत्कालीन एीजी जैन की गवाही नहीं करवाई।
क्या है जयपुर बम ब्लास्ट केस?
14 साल पहले 13 मई 2008 की शाम करीब साढ़े सात बजे जयपुर शहर में खंदा माणक चौक, बड़ी चौपड़, छोटी चौपड़, त्रिपोलिया बाजार, चांदपोल बाजार व जोहरी बाजार में बम धमाके हुए। जयपुर परकोटे में महज 12 मिनट के अंतराल में हुए इन बम धमाकों में 73 लोगों की मौत हो गई थी। 186 लोग घायल हुए थे। विशेष कोर्ट ने जयपुर बम धमाको के चार आरापियों सैफुर्रहमान, मोहम्मद सरवर आजमी, मोहम्मद सैफ उर्फ करीऑन व मोहम्मद सलमान को 20 दिसम्बर 2019 को फांसी की सजा सुनाई थी।
AAG राजेंद्र यादव 48 दिन पैरवी के लिए ही नहीं गए।
जयपुर ब्लास्ट के चार दोषियों के राजस्थान हाई कोर्ट से बरी होने पर राजस्थान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला लिया। साथ ही उस अतिरिक्त महाधिवक्ता (एएजी) राजेंद्र यादव की सेवाएं भी समाप्त कर दी गई, जो इस मामले में पेश होने के लिए नियुक्त किए गए थे। चार दोषियों की फांसी टलने के बाद के बाद सामने आया कि एएजी राजेंद्र यादव 48 दिन पैरवी के लिए गए ही नहीं। जयपुर बम धमाका केस की राजस्थान हाईकोर्ट में प्रभवी पैरवी करने में विफल रहने पर अतिरिक्त महाधिवक्ता की सेवाएं समाप्त की गई हैं।
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