क्या जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद राजस्थान की राजनीति में होगा बदलाव? जानिए सियासी समीकरण
Jagdeep Dhankhar political impact on Rajasthan: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इससे न केवल देश में उपराष्ट्रपति का पद रिक्त हुआ है बल्कि इसे राजस्थान के सियासी समीकरणों में बड़े बदलाव का संकेत भी माना जा रहा है। संसद के मानसून सत्र से पहले स्वास्थ्य कारणों से धनखड़ ने इस्तीफा दे दिया था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनका इस्तीफा मंजूर भी कर लिया।
बता दें कि राजस्थान के शेखावाटी अंचल ने देश को दो उपराष्ट्रपति दिए हैं। भैंरोसिंह शेखावत के बाद जगदीप धनखड़ दूसरे हैं। भाजपा में पहले राजपूत समाज से शेखावत बड़ा चेहरा रहे और जाट समाज से जगदीप धनखड़। दोनों की सियासी पकड़ एक जैसी है। अब जगदीप धनखड़ के इस्तीफे का सियासी असर राजस्थान में भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में भाजपा सरकार पर भी देखने को मिल सकता है।

दरअसल, राजस्थान में विधानसभा की कुल 200 सीटें हैं। जाट समाज से कुल 37 विधायक व 7 सांसद (लोकसभा व राज्यसभा सांसद) हैं। जाट समाज के विधायकों में से 16 भाजपा से, 18 कांग्रेस से, 1 बीएसपी व दो निर्दलीय हैं। इनमें जाट समाज से झाबरसिंह खर्रा, कन्यहैलाल चौधरी, विजय सिंह और सुमित गोदारा तो भजनलाल शर्मा सरकार में मंत्री भी हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, राजस्थान में जाट मतदाता कुल मतदाता आधार का 14 से 15 प्रतिशत हैं। जाट समाज के दिग्गज जगदीप धनखड़ द्वारा उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफे के बाद भाजपा प्रदेश में एक बार फिर से जातीय संतुलन के लिए नए गुणा-भाग देखने को मिल सकते हैं।
राजस्थान में लोकसभा की 25 सीटें हैं। साल 2014 और 2019 के चुनाव में भाजपा ने सभी 25 सीटों पर जीत हासिल की थी, मगर बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा को 11 सीटों का नुकसान झेलना पड़ा है। इन 11 में खासकर छह सीटें जाट बाहुल्य क्षेत्र झुंझुनूं, सीकर, चूरू, नागौर, श्रीगंगानगर व बाड़मेर में गंवाई थीं।
जगदीप धनखड़ राजस्थान के झुंझुनूं जिले के गांव किठाना के रहने वाले हैं। उनके इस्तीफे के बाद किठाना के लोगों ने मीडिया से बातचीत में निराशा जताई और बोले कि वे हमारे लिए हमेशा ही उपराष्ट्रपति रहेंगे। धनखड़ का प्रभाव केवल झुंझुनूं तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य जाट बहुल सीटों पर भी उनका असर रहा है। ऐसे में भाजपा द्वारा इन इलाकों में किसी प्रभावशाली जाट नेता को आगे लाकर सियासी संतुलन साधने की कोशिशें तेज हो सकती हैं।












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