राजस्थान में पुलिस ने किसान को पहले आत्महत्या से बचाया, अब सुरक्षा के नाम पर थमा दिया 9.91 लाख का नोटिस
Rajasthan News: राजस्थान के झुंझुनू जिले के नवलगढ़ तहसील के गोठड़ा गांव के निवासी विद्याधर यादव को एक असामान्य और चौंकाने वाली वित्तीय मांग का सामना करना पड़ रहा है। एक लंबी कानूनी और मानसिक लड़ाई के बाद जब उनकी जमीन को एक सीमेंट प्लांट के निर्माण के लिए अधिग्रहित किया गया और उनका घर भी बिना मुआवजे के तोड़ दिया गया। यादव को अब 9.91 लाख रुपए का नोटिस भेजा गया है।
यह राशि 99 पुलिसकर्मियों की तैनाती के खर्च की भरपाई के लिए मांगी गई है। ये पुलिसकर्मी 11 दिसंबर को यादव को आत्महत्या करने से रोकने के लिए उनके गांव में तैनात किए गए थे। यह मामला भूमि अधिग्रहण, मुआवजे की प्रक्रिया और प्रशासनिक निर्णयों के व्यापक प्रभाव को उजागर करता है।

क्या है पूरा मामला
यादव की परेशानियां तब शुरू हुई। जब उनकी जमीन को एक सीमेंट प्लांट के निर्माण के लिए अधिग्रहित कर लिया गया। भूमि के अधिग्रहण के बाद मुआवजा न मिलने पर यादव ने आत्महत्या की धमकी दी। यादव का आरोप है कि बार-बार प्रशासन और सीमेंट कंपनी के अधिकारियों से संपर्क करने के बावजूद उनकी शिकायतें अनसुनी रहीं।
आखिरकार उन्होंने 9 दिसंबर को जिला कलेक्टर को एक ज्ञापन सौंपा। जिसमें अपनी समस्याओं का समाधान न होने पर इच्छामृत्यु की गुहार लगाई। उन्होंने 11 दिसंबर तक का समय मांगा। इस पर प्रशासन ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और आत्महत्या रोकने के लिए पुलिस बल तैनात कर दिया।
पुलिस खर्च का नोटिस
झुंझुनू के पुलिस अधीक्षक शरद चौधरी द्वारा जारी किए गए नोटिस में कहा गया है कि यादव की आत्महत्या की धमकी के बाद पुलिस की व्यापक तैनाती की गई थी। इसमें अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक से लेकर कांस्टेबल तक 99 पुलिसकर्मी, सरकारी वाहन और अन्य संसाधन शामिल थे।
हालांकि यादव का कहना है कि उन्होंने इतनी बड़ी पुलिस तैनाती की कभी मांग नहीं की। उनका ध्यान केवल अपनी जमीन के मुआवजे पर था। उन्होंने इसे अपने खिलाफ एक और अन्याय करार दिया।
विवाद और सवाल
यादव का कहना है कि उनकी मुआवजे की मांगों को अनदेखा कर प्रशासन ने उनके आत्महत्या के प्रयास को रोकने पर अधिक जोर दिया। इसके बावजूद मुआवजे के तौर पर 3.8 करोड़ रुपए दिए जाने के बाद भी उन्हें पुलिस सुरक्षा के खर्च का बोझ उठाने के लिए कहा जा रहा है।
यह घटना कई सवाल खड़े करती है कि प्रशासन और सीमेंट कंपनी ने समय पर यादव की शिकायतों का समाधान क्यों नहीं किया। आत्महत्या रोकने के लिए सुरक्षा तैनाती का वित्तीय बोझ एक सामान्य नागरिक पर डालना क्या न्यायोचित है। भूमि अधिग्रहण और मुआवजे के मामलों में नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं।
संबंधित घटनाएं और प्रशासन की प्रतिक्रिया
इस मामले ने झुंझुनू जिले में भूमि अधिग्रहण के अन्य मामलों पर भी प्रकाश डाला है। इसके अलावा गोठड़ा गांव में यादव के घर को बिना किसी पूर्व सूचना के तोड़े जाने को लेकर भी स्थानीय निवासियों में रोष है। राज्य मंत्री और स्थानीय नेताओं ने इस घटना को गंभीरता से लिया है और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
विद्याधर यादव की कहानी राज्य के भूमि अधिग्रहण और मुआवजे की प्रक्रियाओं की खामियों को उजागर करती है। यह घटना नागरिक अधिकारों, प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन की आवश्यकता को दर्शाती है।
हालांकि मुआवजा मिलने से यादव को कुछ राहत मिली है। लेकिन पुलिस तैनाती के लिए 9.91 लाख रुपए का नोटिस उनकी परेशानियों को और बढ़ा देता है। यह मामला एक बार फिर यह सवाल उठाता है कि संकटग्रस्त नागरिकों की सुरक्षा के लिए प्रशासन द्वारा उठाए गए कदमों का बोझ किस पर डाला जाना चाहिए।
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