लड़ी जा रही है आजादी के नायक "ठाकुर प्यारेलाल सिंह" के सम्मान की लड़ाई , शासन भूला तो किसानों ने दिलाया याद

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रायपुर, 27 जनवरी। पूरे भारत में जब आजादी का अमृत महोत्सव मनाकर गौरवशाली इतिहास को याद किया जा रहा है, ऐसे समय पर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में देश की आजादी के एक नायक के सम्मान में एक अनूठा अभियान चल रहा है। स्वतंत्रता संग्राम सैनानी, छत्तीसगढ़ की महान विभूति ठाकुर प्यारेलाल सिंह के नाम पर रहे शहर के एक मार्ग को सरकार ने भुला दिया, जिसे फिर से स्थापित करने के लिए राज्य आंदोलनकारी छत्तीसगढ़ संयुक्त किसान मोर्चा के नेता सामने आये हैं।

60 साल पहले था

60 साल पहले था "ठाकुर प्यारेलाल सिंह मार्ग" जिसे भुला दिया

छत्तीसगढ़ निर्माण आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे किसान मोर्चा के प्रवक्ता जागेश्वर प्रसाद साहू ने वन इंडिया हिंदी को बताया कि प्रदेश के कई ऐसे स्थान है जहां स्थानीय महान विभूतियों के नाम से स्थान और मार्ग जाने जाते थे, लेकिन समय के साथ प्रशासन की लापरवाही और जनता की उदासीनता के चलते इतिहास को भूला दिया गया। इसलिए मोर्चा के नेताओं ने जनता के साथ मिलकर राज्य के इतिहास पुरुषों के नाम पर रखे गए मार्ग के नामों को फिर से स्थापित करने का संकल्प लिया है।

जागेश्वर प्रसाद ने बताया कि रायपुर शहर के आजाद चौक, हांडीपारा छत्तीसगढ़ी भवन, बढ़ाई पारा, रामसागर पारा, राठौर चौक से तेलघानी चौक तक के विस्तारित मार्ग ठाकुर प्यारेलाल सिंह के नाम पर 60 वर्ष पहले से ही थे, लेकिन शासन-प्रशासन और आम जनता इसे भूल गई, इसलिए नई पीढ़ी को अपने इतिहास और महान विभूतियों के करीब लाने के लिए अभियान चलाया गया है। ऐसे अभियान भविष्य में भी चलाये जाते रहेंगे।

किसानों ने चलाया स्टीकर लगाने का अभियान

किसानों ने चलाया स्टीकर लगाने का अभियान

किसान मोर्चा के नेता वैगेन्द्र सोनबेर ने वन इंडिया हिंदी को बताया कि कुछ दिनों पहले हमें एक बुजुर्ग से यह जानकरी मिली थी कि किसान और मजदूरों के मसीहा, सहकारिता के पुरोधा, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी त्यागमूर्ति के नाम से विख्यात ठाकुर प्यारेलाल सिंह के नाम से रायपुर के आजाद चौक से तेलघानी चौक तक पड़ने वाले मार्ग को करीब 60 दशक पहले सरकारी रिकॉर्ड में ठाकुर प्यारेलाल मार्ग के नाम से जाना जाता था। लेकिन समय बीतने के साथ शहर के इस मार्ग को उसके मूल नाम से पहचाना जाना बंद कर दिया गया।

सोनबेर ने कहा कि गणतंत्र दिवस के दिन से ही राज्य आंदोलनकारी छत्तीसगढ़ संयुक्त किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष अनिल दुबे, दाऊ जी.पी. चंद्राकर, जागेश्वर प्रसाद, इंजीनियर अशोक ताम्रकार के नेतृत्व में हमने पुरे मार्ग में घर-घर, दुकान, होटल, बैंक और कई संस्थानों में ठाकुर प्यारेलाल सिंह मार्ग का स्टीकर लगाने का अभियान शुरू किया है। इस अभियान में शहर के कई नागरिकों ने भी सहयोग किया है।सोनबेर ने कहा कि किसी स्थान की पहचान कायम रहे इसकी जवाबदारी जिला प्रशासन और नगर निगम की होती है, प्रशासन को महापुरुषों की सुध नहीं है इसलिए पुरखों के सम्मान में हमें यह कदम उठाना पड़ा है।

ठाकुर प्यारेलाल के परिजनों ने संभाली हैं यादें

ठाकुर प्यारेलाल के परिजनों ने संभाली हैं यादें

ठाकुर प्यारेलाल सिंह के पौत्र आशीष सिंह ठाकुर ने वन इंडिया हिंदी को बताया कि ठाकुर प्यारेलाल ने अपने जीवनकाल के अंतिम दिन रायपुर में ही बिताये, क्योंकि वह एक स्वतंत्रता संग्राम सैनानी थे, इसलिए रायपुर में लम्बा वक्त गुजारने के बाद भी वह किसी एक स्थान पर नहीं रहे इसलिए उनकी स्मृति में कोई विशेष स्मारक या संग्रहालय नहीं है, लेकिन उनके लिखे साहित्य और जुड़ी वस्तुओं को हमने आज भी संभालकर रखा हुआ है।

किसान नेताओं की तरफ से चलाये जा रहे अभियान के संबंध में उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि महापुरुषों के नाम से रखे गए चौक चौराहों को वैसे ही रहने दिया जाये, केवल ठाकुर प्यारेलाल सिंह मार्ग ही नहीं, अगर जानकरी निकाली जाये तो समय के साथ कई मार्गों के नाम बदल गए हैं, उन्हें वापस उसकी पहचान दिलाना जरुरी है।

ठाकुर प्यारेलाल सिंह का परिचय

ठाकुर प्यारेलाल सिंह का परिचय

ठाकुर प्यारेलाल सिंह भारत के एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और क्रांतिकारी थे। उन्हें छत्तीसगढ़ में श्रमिक आंदोलन के सूत्रधार और सहकारिता आंदोलन के प्रणेता के तौर पर भी जाना जाता है। प्यारेलाल जी का जन्म 21 दिसम्बर 1891 को राजनांदगांव जिले के दैहान ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम दीनदयाल सिंह और माता का नाम नर्मदा देवी था। राजनांदगांव और रायपुर में शुरुवाती पढ़ाई करने के बाद उन्होंने नागपुर और जबलपुर में उच्च शिक्षा प्राप्त की। साल 1916 में वकालत की पढ़ाई करने के बाद वह बंगाल के क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए और क्रांतिकारी साहित्य प्रचार में जुट गए।

1925 के बाद वह रायपुर शहर में रहने लगे, इस दौरान उन्होंने छत्तीसगढ़ में शराब की दुकानों के खिलाफ मुहीम चलाने के अलावा, हिन्दू-मुस्लिम एकता, नमक कानून तोड़ना, दलित उत्थान समेत कई मुद्दों पर अभियान चलाया। आजादी के आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ मुहीम छेड़ने की वजह से उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। एक बार ठाकुर प्यारेलाल सिंह के तेवर कमजोर करने के लिए अंग्रेजो ने उनके घर छापा मारकर सारा उनका सामान कुर्क कर दिया था।

बाद में वह राजनीति में भी सक्रिय हुए, 1937 में रायपुर नगरपालिका के अध्यक्ष चुने गए, 1945 में छत्तीसगढ़ के बुनकरों को एकजुट करने के लिए छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी संघ की स्थापना भी की। उन्होंने आचार्य कृपलानी की किसान मजदूर प्रजा पार्टी का हिस्सा बनकर चुनाव लड़ा और 1952 में रायपुर से विधानसभा विधायक चुने गए। अपने अंतिम दिनों में उन्होंने आचार्य विनोबा भावे के भूदान और सर्वोदय आंदोलन का छत्तीसगढ़ में विस्तार किया। 20 अक्टूबर 1954 को भूदान यात्रा के दौरान अस्वस्थ हो जाने से उनका निधन हो गया। छत्तीसगढ़ सरकार उनके योगदान को याद करते हुए हर साल सहकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वालों को 'ठाकुर प्यारेलाल सिंह सम्मान' देती है।

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