छत्तीसगढ़ में जारी है आरक्षण पर रण, CM भूपेश का सवाल,क्या कोई विभाग विधानसभा से बड़ा है?

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राजभवन की तरफ से पूछे गए सवालों पर कहा कि राजभवन के विधिक सलाहकार हैं,उन्हें वह अधिकार उन्हें नहीं हैं।

छत्तीसगढ़ में आरक्षण पर बवाल जारी है। छत्तीसगढ़ विधानसभा से आरक्षण संशोधन संबंधी विधेयकों के पास होने बाद भी यह मसला सुलझा नहीं है,क्योंकि 14 दिन गुजर के बाद भी आरक्षण विधेयक पर राज्यपाल के हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इस मामले में राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने खुलकर नाराजगी ज़ाहिर की है। शुक्रवार को उन्होंने राजभवन की तरफ से पूछे गए सवालों पर कहा कि राजभवन के विधिक सलाहकार हैं,उन्हें वह अधिकार उन्हें नहीं हैं। राज्यपाल को वह गलत सलाह दे रहे हैं। इसे पूर्व राज्यपाल अनुसुईया उईके ने कहा था कि विधानसभा से प्रस्ताव आने पर हस्ताक्षर करूंगी। किसी एक वर्ग के लिए आरक्षण नहीं होता है। काफी नियम होते हैं,क्या सभी राजभवन को पता नहीं हैं? सीएम भूपेश ने सवाल उठाया कि क्या कोई विभाग विधानसभा से बड़ा होता है?

राजभवन में लगा है स्पीकर

राजभवन में लगा है स्पीकर

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ने तीखे अंदाज में कहा कि छत्तीसगढ़ विधानसभा से पारित होने के पश्चात किसी विभाग से जानकारी नहीं ली जाती है। राजभवन का खेल भारतीय जनता पार्टी के लोगों के इशारों पर हो रहा है। राज्यपाल की तरफ से स्टैंड बदलता जा रहा है। वह कहती हैं कि उन्होंने केवल आदिवासियों के बोला था, आरक्षण सभी वर्गों का है।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि एक स्पीकर के जरिए विधानसभा की सारी कार्रवाई राजभवन में ट्रांसमीट की जाती है।अफसर या राज्यपाल वहां बैठकर पूरी कार्रवाई को आसानी से सुन सकते हैं।मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि जब आरक्षण प्रस्ताव पारित हुआ था,तब क्या राजभवन को सारी प्रकिया के बारे में जानकारी नहीं थी? बघेल ने कहा कि राजभवन के अधिकारी भाजपा की कठपुतली की तरह उनके निर्देशों पर काम कर रहे हैं। यह प्रदेश के हित में नहीं है।

राज्यपाल ने पूछे सवाल, फंस गया पेंच

राज्यपाल ने पूछे सवाल, फंस गया पेंच

आरक्षण संशोधन विधेयकों पर छत्तीसगढ़ सरकार में असमंजस कायम है। 14 दिन बाद भी आरक्षण संशोधन विधेयकों पर राज्यपाल अनुसईया उईके ने ना तो हस्ताक्षर किये हैं और ना ही उसे सरकार को लौटाया है,बल्कि राजभवन ने भूपेश बघेल सरकार को 10 सवालों की एक सूची भेजी है। इसमें पूछा गया है कि अनुसूचित जाति और जनजाति को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा मानने का आधार क्या है। अपने सवालों के माध्यम से राजभवन ने कुछ जरूरी कानूनी सवाल उठाये हैं।

भाजपा ने राज्यपाल को ज्ञापन भेजा

भाजपा ने राज्यपाल को ज्ञापन भेजा

इधर आरक्षण के मामले में भाजपा विधायको का कहना है कि कांग्रेस सरकार बिना तैयारी के विधेयक सदन में लाई थी। भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष नवीन मार्कण्डेय व वरिष्ठ नेता विधायक पुन्नूलाल मोहिले की अगुवाई अनुसूचित जाति वर्ग के 16 प्रतिशत आरक्षण को घटाकर 13 प्रतिशत करने के निर्णय के खिलाफ राज्यपाल के पास लिखित शिकायत भेजा है। भाजपा का कहना कि कांग्रेस ने जन घोषणा पत्र में एससी को 16% आरक्षण के वादे किए व अब वह इससे मुकर रही है।

तो क्या फंस गये आरक्षण विधेयक?

तो क्या फंस गये आरक्षण विधेयक?

अब सवाल उठ रहा है कि क्या छत्तीसगढ़ में आरक्षण विधेयक उलझ गये है? इसपर विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव देवेंद्र वर्मा ने अपने एक कथन में कहा है कि यह विधेयक शुरू से ही फंसे हुए थे,क्योंकि आरक्षण में अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत का निर्धारण उच्चतम न्यायालय ने इंदिरा साहनी(मंडल कमीशन) मुकदमा में किया है। इससे पहले महाराष्ट्र में आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से अधिक करने पर महाराष्ट्र के कानून को हाईकोर्ट निरस्त कर चुका है। अभी भी तमिलनाडु, हरियाणा और कर्नाटक की 50 प्रतिशत की सीमा को परीक्षण करने सम्बन्धी याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लम्बित हैं।

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