Punjab में 75 साल में सिर्फ तीन हिंदू CM, क्या है इसकी वजह? फिर एक एक्ट ने कैसे बदली सूबे की सियासत
Punjab Politics: पंजाब में साल 2027 होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपनी-अपनी कमर कस ली है। आम आदमी पार्टी (AAP) सत्ता बचाने की कोशिश में है, कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए मेहनत कर रही है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने साफ कर दिया है कि वह इस बार किसी की जूनियर पार्टनर बनकर चुनाव नहीं लड़ेगी।
अकाली दल से अलग होने के बाद भाजपा पंजाब में अपने दम पर राजनीतिक ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रही है। ऐसे चुनावी माहौल में पंजाब की राजनीति से जुड़े कई पुराने किस्से और आंकड़े चर्चा में हैं।

किस्सा कुर्सी दा' में हम बात करेंगे इन्हीं में से एक दिलचस्प तथ्य कि कैसे आजादी के बाद से अब तक पंजाब को सिर्फ तीन हिंदू मुख्यमंत्री ही मिले हैं।
आजादी के बाद पहला मुख्यमंत्री भी हिंदू नेता थे
15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ, तब पंजाब के पहले मुख्यमंत्री गोपी चंद भार्गव बने थे। वे कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता थे और पंजाब की राजनीति में उनका बड़ा प्रभाव माना जाता था।लदिलचस्प बात यह है कि आजादी के बाद मुख्यमंत्री पद संभालने वाले पहले नेता हिंदू थे, लेकिन उसके बाद पंजाब की राजनीति में ऐसा बदलाव आया कि अगले 75 वर्षों में केवल तीन हिंदू नेता ही मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच सके।
2. भीम सेन सच्चर (दो बार संभाली कमान)
कांग्रेस के दूसरे बड़े हिंदू चेहरे भीम सेन सच्चर थे। उन्होंने पहली बार 13 अप्रैल 1949 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन उनका यह पहला कार्यकाल महज 188 दिनों का ही रहा। इसके बाद साल 1952 में वे दोबारा पंजाब के मुख्यमंत्री बने और इस बार उन्होंने 3 साल 281 दिनों तक सफलतापूर्वक सरकार चलाई।
3. कॉमरेड राम किशन (पंजाब के आखिरी हिंदू सीएम)
पंजाब के तीसरे हिंदू मुख्यमंत्री के रूप में कॉमरेड राम किशन ने 7 जुलाई 1964 को सत्ता की बागडोर संभाली थी। वे इस सर्वोच्च पद पर 1 साल 363 दिन यानी करीब दो साल तक रहे।
1966 में क्या बदला? क्यों थम गया हिंदू मुख्यमंत्रियों का दौर?
पंजाब के राजनीतिक इतिहास को समझने के लिए 1966 का पंजाब पुनर्गठन अधिनियम (Punjab Reorganisation Act) बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। केंद्र सरकार ने 1966 में पंजाब का पुनर्गठन किया। इसके तहत हरियाणा को अलग राज्य बनाया गया। साथ ही पंजाब के कुछ क्षेत्रों को हिमाचल प्रदेश में शामिल कर दिया गया।
हरियाणा का जन्म: पंजाब के हिंदी भाषी क्षेत्रों को अलग करके 'हरियाणा' के रूप में एक नया राज्य बनाया गया।
हिमाचल को मिला हिस्सा: पंजाब के कुछ पहाड़ी इलाकों को पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में शामिल कर दिया गया।
इस बंटवारे के बाद पंजाब मुख्य रूप से एक पंजाबी भाषी और सिख बहुल राज्य बन गया। उसके बाद पंजाब का सामाजिक और राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गया।
पिछले 56 साल से पंजाब को नहीं मिला कोई हिंदू मुख्यमंत्री
साल 1966 में हुए इस ऐतिहासिक विभाजन के बाद से लेकर आज 56 साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन पंजाब की सत्ता पर फिर कभी कोई हिंदू नेता मुख्यमंत्री के रूप में नहीं बैठ पाया। बंटवारे के बाद से पंजाब की राजनीति का यह अलिखित नियम (Unwritten Rule) बन गया कि वहां मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सिर्फ सिख चेहरा ही बैठेगा, चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो।
यही वजह है कि आज जब बीजेपी पंजाब में अकेले चुनाव लड़ने जा रही है, तो वह राज्य के बड़े हिंदू वोट बैंक (जो मुख्य रूप से शहरी इलाकों में है) को साधने की कोशिश कर रही है। अब देखना यह होगा कि क्या अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में यह पुराना इतिहास कोई नया मोड़ लेता है, या पंजाब की कुर्सी का यह पुराना समीकरण आगे भी यूं ही जारी रहता है।














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