Nepal Politics: बालेन शाह का खौफ या गिरफ्तारी का डर! नेपाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर, फिर एक होंगे ओली-प्रचंड
Balen Shah Vs Nepal Old Politics: नेपाल की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां पुराने दुश्मन फिर से दोस्त बनने की तैयारी में हैं। सालों तक सत्ता के लिए एक-दूसरे के खिलाफ लड़ने वाले केपी शर्मा ओली और पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' अब फिर साथ आने की कोशिश कर रहे हैं।
वजह सिर्फ सरकार बनाना नहीं, बल्कि बदलता राजनीतिक माहौल, भ्रष्टाचार की जांच, चुनावी हार और युवाओं की बढ़ती नाराजगी भी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह गठबंधन टिकेगा या फिर पहले की तरह कुछ समय बाद टूट जाएगा? आइए समझते हैं पूरा मामला।

कभी दोस्त, कभी दुश्मन... अब फिर साथ आने की तैयारी
नेपाल की राजनीति में ओली और प्रचंड का रिश्ता हमेशा उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 2017 में दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ा और शानदार जीत हासिल की। तय हुआ था कि ढाई-ढाई साल दोनों प्रधानमंत्री बनेंगे, लेकिन सत्ता मिलने के बाद रिश्तों में दरार आ गई। ओली पर आरोप लगा कि उन्होंने प्रचंड को किनारे कर दिया। इसके बाद दोनों अलग हो गए। 2022 में फिर साथ आए, लेकिन यह गठबंधन भी सिर्फ दो महीने चला और प्रचंड ने कांग्रेस के साथ सरकार बना ली।
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जांच और गिरफ्तारी का डर बना सबसे बड़ा कारण
इस बार दोनों नेताओं के करीब आने की सबसे बड़ी वजह भ्रष्टाचार के मामलों में बढ़ती जांच मानी जा रही है। हाल के महीनों में कई बड़े नेताओं की संपत्ति की जांच शुरू हुई है। UML के वरिष्ठ नेता बिष्णु पौडेल की गिरफ्तारी के बाद पार्टी ने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया। वहीं मार्च में केपी शर्मा ओली की गिरफ्तारी ने भी सियासी हलचल बढ़ा दी। माना जा रहा है कि अगर जांच आगे बढ़ी तो कई और बड़े नेताओं पर भी कार्रवाई हो सकती है। यही डर दोनों नेताओं को एक मंच पर ला रहा है।
चुनाव में हार ने बदल दी पूरी रणनीति
मार्च 2026 के चुनावों में दोनों दलों को बड़ा झटका लगा। UML सिर्फ 25 सीटें जीत सकी, जबकि प्रचंड की पार्टी NCP (MC) को सिर्फ 17 सीटें मिलीं। दोनों को समझ आ गया कि अलग-अलग चुनाव लड़ने का नुकसान उन्हें ही हुआ। कम्युनिस्ट वोट कई हिस्सों में बंट गए और दूसरे दलों को फायदा मिल गया। अब 2027 के स्थानीय चुनाव से पहले दोनों चाहते हैं कि वोट बैंक फिर से एकजुट हो, ताकि उनकी राजनीतिक ताकत वापस लौट सके।
Gen-Z की राजनीति ने पुराने नेताओं की बढ़ाई टेंशन
नेपाल में युवाओं के आंदोलन ने राजनीति की दिशा बदल दी है। नई पीढ़ी अब पुराने नेताओं से जवाब मांग रही है और भ्रष्टाचार के खिलाफ खुलकर आवाज उठा रही है। प्रचंड ने इस आंदोलन का समर्थन किया, जबकि ओली ने इसे साजिश बताया था। लेकिन चुनावी नतीजों ने दिखा दिया कि युवाओं का मूड बदल चुका है। अब दोनों नेताओं को डर है कि अगर वे अलग-अलग रहे तो नई राजनीति उन्हें पूरी तरह पीछे छोड़ सकती है। इसलिए कम्युनिस्ट एकता की कोशिश तेज हो गई है।
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एक मंच पर दिखेंगे ओली-प्रचंड, क्या मिलेगा बड़ा संदेश?
28 जून को मदन भंडारी की 75वीं जयंती के कार्यक्रम में ओली और प्रचंड लंबे समय बाद एक साथ मंच साझा करेंगे। इसे सिर्फ श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। इस मंच के जरिए जनता को दिखाने की कोशिश होगी कि कम्युनिस्ट दल फिर एकजुट हो रहे हैं। साथ ही पार्टी कार्यकर्ताओं को भी एकता का संकेत मिलेगा। कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी भी मौजूद रहेंगी। अब सबकी नजर इस बात पर है कि यह नई दोस्ती कितने समय तक टिकती है।












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