America Visa Rules: क्यों अब अमेरिका से दूरी बना रहे हैं भारतीय छात्र? सालभर में 30 हजार भारतीयों ने छोड़ा USA

Study in Europe vs USA for Indian students: भारतीय छात्रों के लिए कभी अमेरिका में पढ़ाई करना सबसे बड़ा सपना माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। सख्त वीजा नियम, लंबा इंतजार और पढ़ाई के बाद नौकरी की अनिश्चितता ने हजारों छात्रों का भरोसा कमजोर कर दिया है। यही वजह है कि अब बड़ी संख्या में भारतीय स्टूडेंट्स यूरोप का रुख कर रहे हैं।

जर्मनी, फ्रांस, आयरलैंड और नीदरलैंड जैसे देश कम खर्च, आसान वर्क परमिट और बेहतर करियर ऑप्शन की वजह से नई पसंद बनते जा रहे हैं। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह बदलाव आने वाले वर्षों में ग्लोबल एजुकेशन की दिशा बदल सकता है।

Study in Europe vs USA for Indian

अमेरिका जाने का सपना अब क्यों पड़ रहा फीका?

कुछ साल पहले तक अमेरिका का स्टूडेंट वीजा मिलना करियर की सबसे बड़ी सफलता माना जाता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। वीजा इंटरव्यू के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता है। कई छात्रों का एडमिशन हो जाता है, लेकिन समय पर वीजा नहीं मिलता। इसके अलावा सोशल मीडिया चेकिंग, सख्त इमिग्रेशन पॉलिसी और वीजा रिजेक्ट होने का डर भी बढ़ गया है। लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी कोई गारंटी नहीं होने से छात्र दूसरे देशों को बेहतर ऑप्शन मान रहे हैं।

डिग्री के बाद जॉब मिलना भी आसान नहीं

अमेरिका में पढ़ाई पूरी करने के बाद सबसे बड़ी चुनौती नौकरी की होती है। F-1 वीजा पर पढ़ने वाले छात्रों को OPT के तहत कुछ समय काम करने का मौका मिलता है, लेकिन उसके बाद H-1B वीजा लॉटरी सिस्टम पर निर्भर करता है। अगर वीजा नहीं मिला तो देश छोड़ना पड़ सकता है। कंपनियां भी अब विदेशी छात्रों को स्पॉन्सर करने से बच रही हैं क्योंकि इसमें ज्यादा खर्च और कानूनी प्रक्रिया शामिल होती है। ऐसे में स्टूडेंट्स का भविष्य अनिश्चित हो जाता है।

यूरोप बना नया फेवरेट डेस्टिनेशन

अमेरिका की मुश्किलों के बीच यूरोप भारतीय छात्रों के लिए बड़ा आकर्षण बन गया है। जर्मनी की कई पब्लिक यूनिवर्सिटीज में ट्यूशन फीस लगभग जीरो है। फ्रांस, आयरलैंड और नीदरलैंड भी इंटरनेशनल स्टूडेंट्स को आकर्षित करने के लिए बेहतर सुविधाएं दे रहे हैं। पढ़ाई पूरी होने के बाद 18 से 24 महीने तक जॉब सर्च करने की अनुमति मिलती है। वर्क परमिट और पीआर की प्रक्रिया भी अमेरिका के मुकाबले आसान मानी जाती है। इसलिए छात्र अब यूरोप को ज्यादा सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं।

कम खर्च में बेहतर करियर का मौका

विदेश में पढ़ाई करने वाले ज्यादातर छात्रों के लिए खर्च सबसे बड़ा मुद्दा होता है। अमेरिका में ट्यूशन फीस और रहने का खर्च बहुत ज्यादा है। इसके मुकाबले यूरोप के कई देशों में पढ़ाई सस्ती है और कई यूनिवर्सिटीज में फीस भी नहीं लगती। हेल्थ इंश्योरेंस, ट्रांसपोर्ट और स्टूडेंट बेनिफिट्स भी बेहतर मिलते हैं। पार्ट-टाइम जॉब के ज्यादा मौके होने से छात्र अपनी पढ़ाई का खर्च भी आसानी से मैनेज कर लेते हैं। यही वजह है कि यूरोप का क्रेज लगातार बढ़ रहा है।

अमेरिकी यूनिवर्सिटीज के लिए बढ़ी चिंता

भारतीय छात्र अमेरिकी यूनिवर्सिटीज की इकोनॉमी में बड़ा योगदान देते हैं। हर साल अरबों डॉलर की फीस और दूसरे खर्चों के जरिए वे अमेरिकी एजुकेशन सिस्टम को मजबूत बनाते हैं। लेकिन अब छात्रों की संख्या घटने लगी है। इससे कई यूनिवर्सिटीज को फाइनेंशियल नुकसान उठाना पड़ रहा है। एजुकेशन एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर वीजा नियम आसान नहीं किए गए तो अमेरिका दुनिया के टॉप टैलेंट को हमेशा के लिए यूरोप और दूसरे देशों के हाथों खो सकता है।

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