भारत-पाक सिंधु जल समझौता: दोनों देशों की अब हो रही बैठक, जानिए क्या है यह, क्यों टूटने की मांग उठीं?
भारत-पाकिस्तान का सिंधु जल समझौता: दोनों देशों की अब हो रही बैठक, आखिर क्या है यह, क्यों टूटने की मांग उठीं?
अमृतसर। हिंदुस्तान के बंटवारे से गठित पाकिस्तान के साथ आपसी रिश्ते अब तक खराब हैं। बरसों तक वो सैन्य-सत्ता केंद्र में रहा और आतंकवाद को पनाह दी। इसी के चलते 70 साल से ज्यादा बीत जाने के बाद भी भारत से उसकी नहीं बनती। दोनों देशों के बीच बहुत से समझौते हुए, लेकिन उनकी बुनियाद कमजोर साबित हुई। हालांकि, एक अहम समझौता आजतक कायम है और अभी उसकी बैठक भी हो रही है। यह समझौता है- भारत-पाकिस्तान का सिंधु जल समझौता।

भारत-पाकिस्तान सिंधु जल समझौते की मीटिंग
हां जी, सिंधु जल समझौता भारत-पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे को लेकर हुआ था। उसकी आए साल बैठक होतीं, जिसमें दोनों मुल्क एक-दूसरे को पानी का हिसाब देते रहे हैं। हालांकि, भारत में आतंकी हमलों के बाद सरकार पर दवाब बढ़ जाता और इस समझौते को तोड़ने की बात होने लगती थीं। बहरहाल, अब भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सिंधु घाटी जल समझौते को लेकर दोनों मुल्कों के स्थायी सिंधु घाटी जल आयोग की बैठक हो रही है।

3 नदी का पानी भारत और 3 का पाक को मिलेगा
अधिकारियों के मुताबिक, सिंधु घाटी जल समझौते को लेकर भारत पाकिस्तान की बैठक 3 मार्च तक चलेगी और इसमें हिस्सा लेने के लिए भारतीय अधिकारियों की 10 सदस्यीय टीम अटारी बार्डर के रास्ते सरहद पार गई है। टीम की अगुवाई केंद्रीय जल आयोग, द सेंट्रल विद्युत अथारिटी, द नेशनल हाइड्रोलिक पावर कार्पोरेशन एंड मिनिस्ट्री अॉफ एक्सटर्नल अफेयर्स के एडवाइजर प्रदीप कुमार सक्सेना कर रहे हैं। उनका कहना है कि, 3 मार्च तक चलने वाली इस बैठक में समझौते के तहत, पूर्वी हिस्से भारत की तीनों नदियों रावी, ब्यास और सतलुज तथा पश्चिमी हिस्से सिंधु, चेनाब और झेलम के जल के मसलों पर चर्चा होनी है।

आखिर क्या है सिंधु जल समझौता?
सिन्धु जल समझौता, नदियों के जल के वितरण के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच हुई एक संधि है। दोनों मुल्कों के बीच हुए इस समझौते की विश्व बैंक (तत्कालीन 'पुनर्निर्माण और विकास हेतु अंतरराष्ट्रीय बैंक') ने मध्यस्थता की थी। इस संधि पर कराची में 19 सितंबर, 1960 को भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के अनुसार, 3 "पूर्वी" नदियों - ब्यास, रावी और सतलुज - का नियंत्रण भारत को, और 3 "पश्चिमी" नदियों - सिंधु, चिनाब और झेलम - का नियंत्रण पाकिस्तान को दिया गया। जो आज तक चला आ रहा है।

क्या-क्या होता है इस समझौते के तहत?
सीधा-सा तो यह पानी के बंटवारे का समझौता है। मगर, जानकार कहते हैं कि भारत-पाक के हर प्रकार के असहमति और विवादों का निपटारा इस संधि के ढांचे के भीतर प्रदत्त कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से किया गया है। इस समझौते के प्रावधानों के अनुसार सिंधु नदी के कुल पानी का 20% का उपयोग भारत कर सकता है। सिंधु बहुत बड़ी नदी है और उसका 80% पानी पाकिस्तान को मिलना भारत के लिए ठीक नहीं है। जिस समय यह संधि हुई थी उस समय पाकिस्तान के साथ भारत का कोई भी युद्ध नहीं हुआ था हालाँकि, ये संधि हुई और इसमें ज्यादातर विवादास्पद वे प्रावधान थे जिनके अनुसार जल का वितरण किस प्रकार किया जाएगा, यह निश्चित होना था, क्योंकि पाक के नियंत्रण वाली नदियों का प्रवाह पहले भारत से होकर आता है, और समझौतेनुसार भारत को उनका उपयोग सिंचाई, परिवहन और बिजली उत्पादन के लिए करने की अनुमति है।

दोनों में यह समझौता हुआ ही क्यों?
हजारों साल तक एक छत्रछाया में रहे दो मुल्कों में बंटवारे के बाद यह संधि पाकिस्तान के इस डर का परिणाम थी कि नदियों का आधार (बेसिन) भारत में होने के कारण कहीं युद्ध आदि की स्थिति में उसे सूखे और अकाल आदि का सामना न करना पड़े। क्योंकि, भारत और पाकिस्तान के बीच शुरू से ही कश्मीर मुद्दे को लेकर तनाव बना हुआ है। यदि मुश्किल वक्त में भारत नदियों का प्रवाह रोक लेता तो पाकिस्तान वैसे ही हथियार डाल देता। इसलिए, पाकिस्तान ने वैश्विक शक्तियों की मदद से 1960 में भारत के साथ सिंधु जल समझौते पर साइन किए। उस दौरान सिंधु और अन्य नदियों पर भारत द्वारा परियोजनाओं के निर्माण के लिए सटीक नियम निश्चित किए गए। उससे ज्यादा पानी का भारत इस्तेमाल नहीं कर सकता। अब चाहे दोनों देशों में किसी भी भी बात पर ठन जाए, लेकिन समझौते के तहत भारत से जाने वाला पानी भरपूर तरीके से पाकिस्तान को मिलता रहेगा।

समझौता तोड़ने की मांग उठीं, लेकिन कायम
2019 में जब पाकिस्तानी साजिशकर्ताओं ने पुलवामा में भीषण आतंकी हमला करवाया था तो भारत में पंजाब सरकार ने सिंधु समझौते को अपने लिए नुकसानदेह बताया था। कई प्रोजेक्ट्स से जुड़े अधिकारियों और सरकारी सलाहकारों ने इस समझौते और दोनों देशों के बीच के तनाव को ध्यान में रख कर इस समझौते के टूटने की बात कही, क्योंकि वर्तमान परिस्थिति इतनी तनावपूर्ण है कि यह समझौता रद्द हो सकता है क्योंकि जो परिस्थिति 1960 में थी वो अब नही रही है। हालांकि, इस समझौते को तोड़ना आसान नहीं है। 2019 के बाद से बहुत तनातनी होने पर और व्यापार ठप होने के बावजूद भारत-पाकिस्तान में यह संधि कायम रही। अब इस पर बैठक भी हो रही है।
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