पंजाब के चुनावी रण में किसानों की पार्टी की एंट्री से कैसे बनेंगे समीकरण, किसे होगा नुकसान ?

पंजाब विधानसभा चुनाव के रण में अब किसानों के पार्टी की भी एंट्री होने जा रही है। कृषि कानून वापस होने के बाद किसान आंदोलन स्थगित तो ज़रूर हो गया लेकिन किसानों की लड़ाई अभी बाक़ी है।

चंडीगढ़,29 दिसंबर 2021। पंजाब विधानसभा चुनाव के रण में अब किसानों के पार्टी की भी एंट्री होने जा रही है। कृषि कानून वापस होने के बाद किसान आंदोलन स्थगित तो ज़रूर हो गया लेकिन किसानों की लड़ाई अभी बाक़ी है। किसानों के मुद्दों को देखते हुए अब 22 किसान संगठन साथ आते हुए चुनावी रण में कूदने की तैयारी कर रहे हैं। किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी और बलवीर सिंह राजेवाल चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। पहले पंजाब में चुनाव त्रीकोणीय माना जा रहा था लेकिन चढ़ूनी की पार्टी के बाद अब चुनावी रण में चौथे प्रतिद्वंदी की एंट्री के तौर पर देखी जा रही है।

सियासी समीकरण बदलने की तैयारी में किसान

सियासी समीकरण बदलने की तैयारी में किसान

पंजाब के चुनावी रण में किसानों की पार्टी को किसानों का साथ कितना मिलेगा यह तो वक़्त ही बताएगा, लेकिन जिस तरह से किसानों ने लम्बी लड़ाई लड़ते हुए कृषि कानूनों को वापस कराया है। इससे पंजाब में सियासी समीकरण बदलते हुए नज़र आ रहे हैं। पंजाब में कई जगह किसानों के चुनावी रण में उतरने के फ़ैसले का स्वागत किया जा रहा है और उनकी पार्टी को समर्थन भी मिल रहा है। जनता के द्वारा मिल रहे समर्थन से किसानों में एक नई उम्मीद जगी है। किसानों का कहना है कि अभी तक किसी भी सियासी पार्टी ने उनके लिए कुछ भी नहीं किया है। इसलिए चढ़ूनी की नई पार्टी से उम्मीद है कि वह पंजाब के किसानों के हक़ में फ़ैसले लेगी। एमएसपी से लेकर महंगाई तक हर मुद्दे का उनकी पार्टी हल करेगी।

राजनीतिक दलों की बढ़ी परेशानी

राजनीतिक दलों की बढ़ी परेशानी

पंजाब के चुनावी रण में किसानों की पार्टी की एंट्री के बाद किसानों में आशा की किरण जगी है तो वहीं पंजाब के दूसरे सियासी दलों के माथे पर चिंता की लकीर खिंच गई है। अब किसानों की पार्टी से लड़ना सभी दल के लिए चुनौती साबित हो रही है क्योंकि कोई भी पार्टी ना तो किसानों के खिलाफ़ बयानबाज़ी कर पा रही है और ना ही उनका समर्थन कर पा रही हैं। सियासी दल अगर किसानों को लेकर विरोध या समर्थन को लेकर कुछ भी प्रतिक्रिया देते हैं तो इसका सीधा असर आगामी विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है। वहीं आम आदमी पार्टी के नेता राधव चड्ढा किसानों की पार्टी के मुद्दे पर अकसर यही बयान देते हुए नज़र आते हैं कि आम आदमी पार्टी तो हमेशा से किसानों के लिए खड़ी रही है हमेशा किसानों का ही साथ दिया है।

भाजपा को हो सकता है नुकसान

भाजपा को हो सकता है नुकसान

सियासी जानकारों की मानें तो कृषि कानूनों की वजह से किसानों ने एक साल तक संघर्ष किया। केनद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार की वजह से किसानों को आंदोवन करना पड़ा। भाजपा की वजह से किसानों काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा इसलिए किसान कभी भी उसे (भाजपा को) वोट नहीं देगी। लोकतंत्र में हर इंसान को चुनाव लड़ने का अधिकार है इसलिए किसान अगर अपने हक के लिए चुनावी मैदान में उतर रहे हैं तो उनका स्वागत करना चाहिए ना कि उनके विरोध में सियासत होनी चाहिए। वहीं दूसरी ओर सियासी जानकारों का यह भी मानना है कि भारतीय जनता पार्टी ने जो कृषि कानूनों को वापस लिया है तो वह इसका सियासी फ़ायदा ज़रूर लेने की कोशिश करेगी। हालांकि यह माना जा रहा है कि चुनावी रण में किसानों की पार्टी की एंट्री से सबसे ज़्यादा नुकसान भाजपा को ही होने वाला है।


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