बीजेपी ने कैप्टन को दिए संकेत- अकाली दल वाले फॉर्मूले से नहीं चलेगा काम, इस बार चाहिए ज्यादा सीटें
नई दिल्ली, 27 दिसंबर: पंजाब में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव हैं। इस बार हालात 2017 जैसे नहीं रहे, क्योंकि पिछले साल ही शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने एनडीए से नाता तोड़ लिया था। बीजेपी लंबे वक्त से उसी के भरोसे पंजाब के चुनावी मैदान में उतर रही थी। हालांकि SAD की जगह अब कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ले ली है। सोमवार को उनकी गृहमंत्री अमित शाह और जेपी नड्डा से मुलाकात हुई। साथ ही गठबंधन भी फाइनल हो गया, लेकिन बीजेपी नेता लगातार यही संकेत दे रहे कि अकाली दल वाला फॉर्मूला कैप्टन पर लागू नहीं होगा।

दरअसल नए कृषि कानूनों की वजह से पंजाब में बीजेपी को काफी नुकसान होने की उम्मीद थी। जिस वजह से हाईकमान ने वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र शेखावत को वहां का प्रभारी बनाया। उनकी मौजूदगी में सोमवार को पंजाब लोक कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह और शिरोमणि अकाली दल (संयुक्त) के अध्यक्ष सुखदेव सिंह ढींडसा ने शाह के साथ मुलाकात की। इस दौरान एक समिति के गठन पर सहमति बनी, जिसमें तीनों दलों के दो-दो सदस्य होंगे। ये समिति ही सीट बंटवारे, घोषणा पत्र समेत अन्य मुद्दों पर चर्चा करेगी।
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वैसे भले ही गठबंधन फाइनल हो गया है, लेकिन बीजेपी ने कैप्टन को संकेत देने शुरू कर दिए हैं कि इस बार अकाली दल वाले फॉर्मूले से काम नहीं चलेगा। मामले में पंजाब प्रभारी गजेंद्र शेखावत ने कहा कि ढींडसा और कैप्टन ने अमित शाह की मौजूदगी में साथ लड़ने का फैसला किया है। सीट बंटवारे पर टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी, लेकिन परिस्थितियां वैसी नहीं हैं, जब पहले बीजेपी ने SAD के साथ 23-24 सीटों पर चुनाव लड़ा था। बीजेपी एक राष्ट्रीय पार्टी है, देश और दुनिया में सबसे बड़ी, इसलिए सब कुछ उसी के अनुसार होगा।
क्या मान जाएंगे कैप्टन?
बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा कर रही, तो कैप्टन भी पंजाब में कम नहीं हैं। 1984 के सिख दंगों के बाद उन्हीं की मेहनत का नतीजा रहा कि कांग्रेस कई बार सत्ता में आई। हालांकि इस साल सिद्धू से नाराजगी की वजह से उन्होंने बगावत कर नई पार्टी बना ली, लेकिन अभी पंजाब में उनका रुतबा बरकरार है। ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि क्या वो बीजेपी की ज्यादा सीट लेने वाली बात को मानेंगे या नहीं।












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