Opposition Meet Patna : विपक्षी एकता की कोशिश में क्या नीतीश का होगा चंद्रबाबू जैसा हाल?
Opposition Meet Patna: 2018 में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू विपक्षी एकता के सूत्रधार के रूप में उभरे थे। लेकिन उनके लिए यह कोशिश दुर्भाग्यशाली साबित हुई थी। 2019 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी तेलगू देशम पार्टी की फजीहत हो गयी थी। यहां तक कि उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी भी गंवानी पड़ी थी। क्या नीतीश कुमार के साथ भी कुछ ऐसा ही होने वाला है ? 2023 में नीतीश कुमार विपक्षी एकता के नये कॉर्डिनेटर बने हैं। चंद्रबाबू नायडू की तरह वे भी मुख्यमंत्री हैं। क्या 2024 और 2025 के चुनाव में उनकी पार्टी जदयू को भारी नुकसान होने वाला है ? वैसे तो चुनाव में जनमत ही सर्वोपरी है लेकिन कभी कभी संयोग भी इसमें अहम भूमिका निभाता है।
क्या नीतीश का हस्र भी नायडू की तरह होगा ?
2018 में विपक्षी एकता के जो प्रमुख चेहरे थे उनमें अधिकतर 2023 में भी सक्रिय है। हां, कॉर्डिनेटर बदल गये हैं। चंद्रबाबू नायडू की जगह नीतीश कुमार ने संभाल ली है। 2018 में भी भाजपा को हराने के लिए विपक्षी एकजुटता को अनिवार्य बताया गया था। लेकिन ऐन वक्त सब कुछ बिखर गया। विपक्षी एकता की कोशिश चंद्रबाबू नायडू के लिए दुर्भाग्यशाली साबित हुई। 2019 के लोकसभा चुनाव में
चंद्रबाबू नायडू की शर्मानक हार हुई। उन्होंने 25 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन जीते सिर्फ 3 सीट। नायडू की तेलगू देशम पार्टी को 12 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। वे एक मजबूत मुख्यमंत्री माने जाते थे। लेकिन 2019 के ही विधानसभा चुनाव में नायडू की करारी हार हुई और सत्ता हाथ से फिसल गयी। नायडू ने 175 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें जीत मिली सिर्फ 23 सीट पर। उन्हें 79 सीटों का नुकसान हुआ था।

2018 में नायडू थे, 2023 में नीतीश कुमार
चंद्रबाबू नायडू बी नीतीश कुमार की तरह कई राज्यों में घूमे थे। विपक्षी नेताओं से मुलाकात की थी। ऐसा लग रहा था कि वे एंटी बीजेपी पॉलिटिक्स का बड़ा चेहरा बनने वाले हैं। उनकी पहल पर 10 दिसम्बर 2018 में दिल्ली में 17 विपक्षी दलों की बैठक हुई थी। इसका मकसद था, एक ऐसा विपक्षी मोर्चा बनना जो 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हरा सके। बैठक के पहले एम के स्टालिन ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरावील से मुलाकात की थी। ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू से मिली थीं। संसद भवन के एनेक्सी में ये बैठक हुई थी। बैठक में कांग्रेस की तरफ से पूर्व पीएम मनमोहन सिंह, अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद, एके एंटनी शामिल हुए थे। चंद्रबाबू नायडू तो इस बैठक के कॉडिनेटर ही थे। ममता बनर्जी, अरविंद केजरावाल, फारुक अब्दुल्ला, एम के स्टालिन ने भी इस बैठक में शिरकत की थी। मीटिंग में विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी और आइटी रेड का मुद्दा जोर शोर से उठा था। लेकिन फिर भी विपक्षी दल एक नहीं हुए। 2019 के लोकसभा चुनाव में ये दल अलग अलग लड़े और हारे। भाजपा ने पहले से भी बड़ी जीत दर्ज की।
बैठक से पहले राहुल गांधी का रोड शो
2018 और 2023 में एक अंतर ये है कि इसबार एकता की कोशिश एक साल पहले शुरू हुई है। नीतीश कुमार की पहल पर पटना में विपक्षी एकता के लिए बैठक हुई। अंतर्रविरोध के बावजूद अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी एक साथ बैठक में उपस्थित हुए। हालांकि विपक्ष ने अभी तक किसी नेता को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट नहीं किया है। लेकिन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और विधायक राहुल गांधी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश कर रहे हैं। विपक्षी एकता की इस बैठक को कांग्रेस अपने हक में इस्तेमाल कर रही है। जब शुक्रवार को राहुल गांधी पटना पहुंचे तो राजनीतिक परिदृश्य अचानक कांग्रेस की तरफ मुड़ गया। यहां तक कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह खुद उनका स्वागत करने के लिए एयरपोर्ट पहुंचे। इस बैठक के पहले राहुल गांधी राजनीतिक महफिल लूट ले गये। जब प्रदेश कांग्रेस कार्यालय जाने के दौरान राहुल गांधी का रोड शो निकाला गया तो इसमें कांग्रेस के हजारों का कार्यकर्ता शामिल हुए। क्या राहुल गांधी के इस एक्सपोजर को ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल स्वीकार कर पाएंगे ?
पटना में कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन
अंतर्विरोध के कारण ही 2018 में विपक्षी एकता नहीं हुई थी। ये अंतर्विरोध आज भी कायम है। बल्कि साफ साफ दिख भी रहा है। राहुल गांधी के जरिये कांग्रेस ने न केवल पटना में शक्ति प्रदर्शन किया बल्कि अपना राजनीतिक एजेंडा भी सेट किया। राहुल गांधी ने प्रदेश कांग्रेस कार्यालय परिसर में स्थापित संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव राव अंदेकर की प्रतिमा का अनावरण भी किया। इस तरह कांग्रेस ने अपने पुराने आधार मत को पुनर्जीवित करने के लिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया। अगर कांग्रेस का कद बढ़ता है तो उसे विपक्षी कुनबे में समायोजित करना आसान नहीं होगा। इस मामले में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीति साख दांव पर लगी हुई है। अगर विपक्षी एकता की कोशिश कामयाब हुई तो उनका कद बढ़ जाएगा, अगर नाकामी मिली तो चंद्रबाबू नायडू जैसा हस्र भी हो सकता है।












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