जानिए पुलिसवाली "दीदी" के कारनामे जिससे चोर बन गए चैंपियन
मुंगेर। चोर और पुलिस का बहुत ही गहरा संबंध होता है। सच्चे और ईमानदार पुलिस ऑफिसर की हमेशा से यही कामना होती है कि गुनाह करने वाले चाहे कोई भी हो उसे सही रास्ते पर लाया जा सके। इसके लिए वह निरंतर प्रयास करते रहते हैं। हालांकि कुछ ऐसे भी पुलिस ऑफिसर होते हैं जो अपराधियों को अपना संरक्षण देते हुए अपराध की दुनिया में कदम रखवाते हैं। कई बार इस का खुलासा भी हुआ है और दोषी पुलिस कर्मियों पर कार्यवाही भी की गई है। लेकिन अपराधियों को सही रास्ता दिखाने वाले पुलिस ऑफिसर की देश में अभी भी कमी है। यूं कहें कि सैकड़ों में से एक ही ऐसा पुलिस ऑफिसर होता है जो ऐसा काम करता है।

ऐसी ही एक बिहार की महिला पुलिस रंजीता हैं। जिन्होंने अपनी ईमानदार छवि और फुटबॉल के माध्यम से अपराध की अंधी गलियों में गुमराह होने से बचाते हुए दर्जनों बच्चों की अब तक जिंदगी सवारी है। आइए जानते हैं ईमानदार छवि वाले रंजीता की कहानी।
जानिए पुलिसवाली "दीदी" के कारनामे जिससे चोर बन गए चैंपियन
कल तक जो बच्चे पुलिस को नाको में दम करते हुए अपराध की दुनिया का हिस्सा बन कर चोरी और लूटपाट की घटनाओं को अंजाम देते थे। वह आज पुलिस वाली 'दीदी' रंजीता के बताए हुए तौर तरीके पर चलते हुए मेडल जीतने में सफल हुए हैं। अपराधी छवि वाले बच्चों की छवि बदलने के बारे में खुद रंजीता कहती है कि इसे पूरा करने के लिए उसे एक दो महीने नहीं बल्कि कई साल लग गए। रंजीता का कहना है कि जब भी वह रास्ते से निकलती है तो छोटे बच्चे जो नशा करते हैं उन्हें देखकर उनके मन में सवाल उठता है कि आखिरकार इन का भविष्य क्या होगा।
इन्ही के भविष्य को देखते हुए रंजीता ने बच्चों की जिंदगी संवारने का फैसला लिया। फिर वो सिलसिला शुरू किया जो अब परिणाम देने लगा है। रंजीता ने रास्ते पर भटकते हुए गरीब और नशे के आदी बच्चों को फुटबॉल खेलने तथा खेल खत्म हो जाने के बाद चॉकलेट खिलाने के लिए ग्राउंड में बुलाने लगी। चॉकलेट खाने की लालच में बच्चे रंजीता की बातों में आकर रोजाना ग्राउंड में आने लगे। हालांकि शुरुआती दौर में बच्चे फुटबॉल ग्राउंड में आने के लिए आनाकानी भी करते थे लेकिन धीरे धीरे सब ठीक हो गया।
और रोजाना 4 घंटे तक बच्चों को फुटबॉल खेलने की ट्रेनिंग देने लगी। ट्रेनिंग देने के साथ साथ रंजीता ने इन बच्चों का एडमिशन स्कूल में कराया। और पढ़ाई-लिखाई के बारे में उसे प्रोत्साहित भी करती थी। रंजीता द्वारा की गई यह मेहनत ने रंग लाना शुरु किया और उसके द्वारा ट्रेनिंग दिए हुए बच्चे में से लगभग 3 दर्जन बच्चे अब तक फुटबॉल सीखकर नेशनल चैंपियनशिप में हिस्सा ले चुके हैं।
और कई मेडल भी चुके हैं। वही सड़क पर आवारा भटकते नशे के आदी हुए बच्चे अपनी जिंदगी संवरती देख इन्हें पुलिस वाली दीदी कह कर बुलाने लगे हैं। तो इन बच्चों का कहना है कि अगर दीदी के द्वारा यह सब नहीं किया जाता तो आज भी हम लोग सड़कों पर आवारागर्दी करते नजर आते। और इससे ज्यादा होता तो सलाखों के पीछे रहते लेकिन इस पुलिस वाली दीदी ने हमारी जिंदगी सवार दी।












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