राजनेता से 'कथावाचक' बने बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय, कथा के दौरान बताते है IPC की धाराएं
राजनेता से 'कथावाचक' बने बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय, कथा के दौरान बताते है IPC की धाराएं
पटना, जून 25: बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय एक बार फिर चर्चाओं में है। दरअसल, राजनेता बने पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय अब कथावाचक के अवतार में नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर पूर्व डीजीपी का एक पोस्टर भी तेजी से वायरल हुआ है, जिसमें वो कथावाचक की भूमिका में नजर आ रहे हैं। उस बैनर में जहां एक तरफ राधा कृष्ण की तस्वीर लगाई गई है, तो वहीं दूसरी तरफ गुप्तेश्वर पांडेय की तस्वीर लगी है। साथ ही बैनर में यह भी बताया गया है कि इस कथा का प्रसारण ऑनलाइन माध्यम से किया जाएगा। बैनर में लोगों को जूम ऐप के जरिये कथा वाचन के लिए जुड़ने का आमंत्रण दिया गया।

यह पहली बार नहीं है, जब पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय का नाम सुर्खियों में आया हो। इससे पहले भी उनका नाम मीडिया की सुर्खियों में चुका है। बता दें, गुप्तेश्वर पांडेय ने बिहार के डीजीपी रहने के दौरान अपनी नौकरी से वीआरएस ले लिया था। पांडेय ने डीजीपी के पद से इस्तीफा देने के बाद जेडीयू की सदस्यता ले ली थी। हालांकि, विधानसभा चुनाव टिकट नहीं मिला तो वह चुनाव नहीं लड़ सके। अब वो आध्यात्म में लीन दिख रहे हैं। अब वो सनातन धर्म के संत के रूप में परिधान धारण कर कथा सुनाते नजर आ रहे हैं। इस दौरान वो कानून और आइपीसी की धाराएं भी बताते हैं।
पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय से जब मीडिया ने इस नए अवतार के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, 'इन सबकी रूचि तो पहले से थी ही। लोगों ने आग्रह किया, तो कर रहा हूं।' राजनीति के सवाल पर उन्होंने इस बारे में तत्काल कुछ भी बोलने से इनकार किया। सिवाय इसके कि अभी तो यह (धर्म-कर्म) कर रहा हूं।' बता दें कि गुप्तेश्वर पांडेय का जन्म बक्सर ज़िले के एक छोटे से गांव गेरूआ में हुआ था। किसान पिता जगदीश पांडेय और माता गंगाजला देवी के यहां जन्मे गुप्तेश्वर पांडेय के दो भाई और एक बहन हैं। गुप्तेश्वर पांडेय की पत्नी चिंता देवी एक गृहणी हैं और उनके पांच बच्चे हैं जिसमें तीन बेटियां और दो बेटे हैं।
1987 बैच, 26 जिले और 42 एनकाउंटर
गुप्तेश्वर पांडेय 1987 बैच के आईपीएस है और बिहार में अलग-अलग पदों पर 26 जिलों में काम कर चुके हैं। पुलिस में रहते हुए कई जिलों में उन्होंने कम्युनिटी पुलिसिंग के ज़रिए प्रयोग किए। खासतौर पर 1993-94 में बेगूसराय और 1995-96 में जहानाबाद ज़िले में उनकी पोस्टिंग चर्चा में रही। उस वक़्त बेगूसराय बहुत संवेदनशील जिला था और सात से आठ महीनों में 42 अपराधियों के एनकांउटर किए।
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