पाकिस्तान में फिर आएंगे इमरान खान? क्या इस बार देश हो जाएगा कंगाल?
इस्लामाबाद, 18 जुलाईः पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में हुए उपचुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने जोरदार वापसी की है। उपचुनाव के नतीजे को देखने पर साफ पता चलता है कि इमरान की पार्टी ने सत्ताधारी पार्टी को धूल चटा दी है। यहां की 20 में से 18 सीटों पर इमरान की पार्टी ने चुनाव जीत लिए हैं। इससे पहले साल 2018 में पाकिस्तान में आम चुनाव हुए थे। इस चुनाव में भी इमरान खान की पार्टी को इतनी सीटें हासिल नहीं हुई थीं जितनी इस बार पीटीआई ने वहां जीत ली है।

खैबर पख्तून ख्वा से ताल्लुक रखते हैं इमरान
पंजाब में सत्ता हासिल करने के लिए दो सबसे बड़े प्रांत हैं जहां पार्टी को बेहतर प्रदर्शन करना होता है। पंजाब और सिंध। पंजाब प्रांत प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ का क्षेत्र है यहां कई सालों से नवाज शरीफ का परिवार राज करता रहा है। वहीं, पाकिस्तान का दूसरा बड़ा प्रांत सिंध है जहां भुट्टो परिवार का दबदबा रहा है। दुर्भाग्य से इमरान खान इन दोनों ही क्षेत्र से संबंध नहीं रखते हैं। इमरान खान पाकिस्तान के खैबर पख्तून ख्वां इलाके से आते हैं। पिछले बार हुए आम चुनाव में इमरान खान की पार्टी जीती जरूर थी मगर उसे इन दोनों ही प्रांतों में उतनी बड़ी सफलता नहीं मिल पायी।

इमरान खान का वर्चस्व
लेकिन इस बार हुए उप चुनाव में इमरान खान की पार्टी को मिले बंपर समर्थन ने जता दिया है कि इमरान खान ने पूरे पाकिस्तान में अपना वर्चस्व हासिल कर लिया है। जाहिर है कि प्रधानमंत्री पद से हटाए जाने के बाद से इमरान खान पाकिस्तान में और लोकप्रिय हो गए हैं। पद छोड़ने के बाद से ही इमरान खान ने विक्टिम कार्ड खेलना शुरू कर दिया था। इमरान ने खुद को इस्टैब्लिशमेंट के शहीद और इस्लाम के रक्षक के तौर पर पेश किया। वह अवाम को यह जताने में सफल साबित हुए कि पाकिसतान में उन्हें साजिश के तहत सत्ता से बाहर किया गया है। ये चुनाव नतीजे सेना और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के लिए बड़ा झटका हैं।

जल्द चुनाव चाहते हैं इमरान
जानकारों के मुताबिक पंजाब और केंद्र अलग-अलग दलों की सरकार हो तो पाकिस्तान की सत्ता पर नियंत्रण बहुत मुश्किल हो जाता है। इमरान खान चाहते हैं कि जल्द से जल्द आम चुनाव हो। इमरान खान ने अपने प्रचार के दौरान चुनाव आयोग, पुलिस और इशारों ही इशारों में सेना पर उनको हराने की साजिश करने का आरोप लगाया। इस दौरान वह लगातार अमेरिकी साजिश का भी आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान में अमेरिका की मर्जी के बिना पाकिस्तान में एक चपरासी तक नियुक्त नहीं होता।

अमेरिका को पसंद नहीं इमरान
यह जगजाहिर है कि पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका की टुकड़ियों पर पलता रहा है। अमेरिकी पैसों पर भारत के खिलाफ आंतक को हवा देता रहा है। लेकिन जब से भारत से अमेरिका के संबंध बेहतर हुए हैं पाकिस्तान की फंडिंग पर लगाम लगा है। हालांकि आईएमएफ जरूर पाकिस्तान को उबारने का प्रयास कर रहा है मगर इमरान जब सत्ता में थे तब उन्होंने आईएमएफ की शर्त न मानकर कई ऐसे लोकलुभावन फैसले लिए जिसने पाकिस्तान को और गर्त में ढकेल दिया। अमेरिकी मदद भी पाकिस्तान को तभी मिल सकेगी जब इमरान सत्ता से दूर होंगे।

आईएमएफ को भी नहीं भाते इमरान
इमरान के सत्ता में लौटते ही अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष को उनकी वापसी से दिक्कत हो सकती है। शहबाज शरीफ ने जब सत्ता संभाली तो उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए जिनकी वजह से उन्हें जमकर आलोचना का सामना करना पड़ा। शरीफ ने ऊर्जा की कीमतों को बढ़ा दिया और साथ ही कई टैक्सों में भी इजाफा किया। ये सब कुछ शरीफ IMF से 1.2 बिलियन डॉलर का लोन लेने के लिए कर रहे थे। पिछले दिनों पाक सरकार और IMF के बीच हुए एक समझौते ने पाक की कर्ज मिलने की उम्मीदों को बढ़ा दिया था।

पाकिस्तान को कर्ज मिलना होगा मुश्किल
शहबाज हर वो फैसला ले रहे थे जो IMF की शर्तों को पूरा करने के लिए जरूरी थी। देश की लड़खड़ाती इकोनॉमी के लिए IMF सबसे बड़ा सहारा है। शरीफ की सरकार ने वो इच्छा जताई थी जो अर्थव्यवस्था को बहाल करने के लिए जरूरी है। लेकिन इमरान के सत्ता में लौटते ही पाकिस्तान को वह भी बंद हो जाएगा। ऐसे में पााकिस्तान के लिए कर्ज लेना कितना मुश्किल होगा, इसका बस अंदाजा लगाया जा सकता है।

श्रीलंका जैसे बन चुके हैं हालात
पाकिस्तान में ये उपचुनाव ऐसे समय में हुए हैं जब पाक लगभग डेढ़ दशक के सबसे बड़े महंगाई का सामना कर रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार अपने न्यूनतम स्तर पर है। फिलहाल देश पर 8.6 बिलियन डॉलर का कर्ज है देश में श्रीलंका की तरह आर्थिक स्थितियां बन रही हैं। हालांकि पाकिस्तान के अर्थव्यवस्था विशेषज्ञों की मानें तो पाकिस्तान बहुत बड़ा देश है और श्रीलंका जैसे हालात होने मुश्किल हैं। लेकिन वो खुद भी इस स्थिति से वाकिफ हैं कि देश मुश्किलों में हैं। ऐसे में राजनीतिक अस्थिरता के बीच आने वाले दिन क्या होंगे, ये कोई नहीं जानता है।












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