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पूर्वोत्तर में पत्रकारों के खिलाफ बात-बेबात दर्ज ना करें मामलेः एनएचआरसी

Provided by Deutsche Welle

नई दिल्ली, 21 दिसंबर। आयोग की ओर से मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की जन-सुनवाई के लिए असम की राजधानी गुवाहाटी में दो-दिवसीय शिविर का आयोजन किया गया था. इसमें कुल 19 मामलों की सुनवाई के बाद उनका निपटारा किया गया.

आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने असम में मुठभेड़ के नाम पर होने वाली हत्याओं की भी कड़ी आलोचना की है. बीती मई में बीजेपी सरकार के सत्ता में लौटने के बाद अब तक मुठभेड़ या पुलिस हिरासत में कम से कम 32 लोगों की मौत हो चुकी है.

जन-सुनवाई

आयोग की ओर से गुवाहाटी में आयोजित दो-दिवसीय जन-सुनवाई शिविर के दौरान इलाके में मानवाधिकार उल्लंघन की कुल 19 घटनाओं की सुनवाई कर उनका निपटारा किया. इनमें से त्रिपुरा के दस, मेघालय के छह और मिजोरम के तीन मामले शामिल थे.

आयोग ने सुनवाई के बाद त्रिपुरा में सुरक्षा बल के जवानों द्वारा एक नाबालिग युवती से बलात्कार के मामले में सात लाख रुपए का मुआवजा देने का निर्देश दिया. इसी तरह मिजोरम में पुलिस हिरासत में मौत के एक मामले में भी इतना ही मुआवजा दिया गया. आयोग ने मेघालय में अवैध कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूरों की मौत के दो मामलों में भी परिजनों को पांच-पांच लाख रुपए मुआवजा देने का निर्देश दिया.

शिविर का उद्घाटन आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरुण मिश्र ने किया. इसमें आयोग के सदस्य न्यायमूर्ति एम. एम. कुमार और राजीव जैन व महासचिव बिंबाधर प्रधान के अलावा आयोग और संबंधित राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे.

आयोग वर्ष 2007 से देश के विभिन्न राज्यों में शिविर बैठक और सार्वजनिक जन-सुनवाई का आयोजन कर रहा है और अब तक 40 से अधिक ऐसी बैठकें और सुनवाइयां कर चुका है, जिनका उद्देश्य जमीनी स्तर पर मामलों का त्वरित निपटान करना और मानवाधिकारों के बारे में जागरूकता पैदा करना है.

बढ़ रही है वर्दी की हिंसा

शिविर के समापन के मौके पर पत्रकारों से बातचीत में आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरुण मिश्र ने कहा, "यह आम राय नहीं बनाई जा सकती कि सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्पा) लागू होने की वजह से मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है. अधिनियम लागू करने या वापस लेने की जरूरत की समीक्षा सरकार करेगी. हालांकि आयोग हिरासत में होने वाली मौतों को बेहद गंभीरता से लेता है और वह इनका स्वत: संज्ञान ले सकता है."

इस महीने की शुरुआत में नागालैंड के मोन जिले में सुरक्षा बल के जवानों की फायरिंग में 14 बेकसूर लोग मारे गए थे. न्यायमूर्ति मिश्र ने बताया कि मानवाधिकार आयोग ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लिया है और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है क्योंकि राज्य में आयोग की कोई इकाई नहीं है.

इस घटना के बाद विभिन्न छात्र संगठन और राजनीतिक दल सेना को असीमित अधिकार देने वाला कानून अफस्पा हटाने की मांग कर रहे हैं. पूर्वोत्तर में असम, नागालैंड, मणिपुर (इंफाल नगर परिषद क्षेत्र छोड़कर) और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में अफस्पा लागू है. कानून सुरक्षा बलों को कहीं भी कार्रवाई करने और बिना वॉरंट के किसी को भी गिरफ्तार करने का अधिकार देता है.

इस साल मई से असम में हुई पुलिस मुठभेड़ों के बारे में पूछे जाने पर एनएचआरसी अध्यक्ष का कहना था, "सभ्य समाज में फर्जी मुठभेड़ों के लिए कोई जगह नहीं है. यह बर्बर है और इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती. कानून को अपना काम करना चाहिए."

उन्होंने कहा कि आयोग यह यह नहीं कह सकता कि सभी मुठभेड़ फर्जी हैं. कुछ फर्जी हो सकती हैं लेकिन ऐसे तमाम मामलों के गुण-दोष की जांच की जाती है. न्यायमूर्ति मिश्र ने बताया, "ऐसे मामलों में एनएचआरसी तीन पहलुओं पर गौर करता है- पीड़ित या उसके परिवार के लिए मुआवजा, आपराधिक मामले दर्ज होना और आरोपी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करना."

पत्रकारों के खिलाफ मामले

आयोग के सदस्य न्यायमूर्ति एम. एम. कुमार ने इसी दौरान त्रिपुरा, मिजोरम और मेघालय के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों के साथ एक बैठक में उनको निर्देश दिया कि पत्रकारों के खिलाफ छोटी-छोटी बातों पर भी मामले दर्ज नहीं किए जाएं.

त्रिपुरा के पत्रकार संगठन 'असेंबली ऑफ जर्नलिस्ट' की ओर से सनित देबरॉय ने आयोग से शिकायत की थी कि पत्रकारों के खिलाफ बात-बेबात मामले दर्ज किए जा रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया था कि त्रिपुरा में बिप्लब देव की नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के सत्ता में आने के बाद से दर्जनों पत्रकारों पर हमले हुए हैं और अखबारों के कार्यालयों में तोड़-फोड़ की कई घटनाएं हुई हैं.

न्यायमूर्ति कुमार ने बताया, "आयोग ऐसे मामलों को गंभीरता से लेता है. इसलिए संबंधित अधिकारियों को इससे बचने का निर्देश दिया गया है. हमने उनसे ऐसे मामलों में और ज्यादा धैर्य और सहनशीलता का परिचय देने को कहा है. पत्रकारों को अपने विचार व्यक्त करने की आजादी होनी चाहिए."

असम, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम और मणिपुर जैसे राज्यों में बीते दो वर्षों में पत्रकारों पर राजद्रोह लगाने के कई मामले सामने आ चुके हैं. सबसे ताजा मामले में त्रिपुरा हिंसा की कवरेज के लिए पहुंची दो महिला पत्रकारों समृद्धि सकुनिया और स्वर्णा झा को पुलिस ने आपराधिक साजिश रचने और दो समुदायों में दुश्मनी बढ़ाने समेत कई आरोपों में गिरफ्तार कर लिया था.

Source: DW

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